Sri Bhajana Rahasya (13): Symptoms of a Devotee at the Stage of Bhava
41:26This audio is included in the following series of lectures:
Topics
- Meaning of jata-rati-bhakta.
- Explanation of anubhava & asta-sattvika-bhavas from Bhakti-rasamṛta-sindhu.
- Explanation of the Sriman Mahaprabhu's statement 'na ham vipro na ca narapati'
- Each living entity is actually a servant of the transcendental Sri Krsnacandra.
- Vidhimarga and ragamarga.
- As a practitioner, follow in the footsteps of Srila Rupa Gosvami and Srila Raghunatha dasa Gosvami
- Five types of sadhana in raganuga-bhakti.
Transcript
श्रीभजनरहस्य (13) : भाव की अवस्था में स्थित भक्त के लक्षण
[श्रील भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराज ने 26 नवम्बर 2004 को गोवर्धन में यह हरिकथा कही थी।
नोट: इस प्रतिलेखन में निम्नलिखित सम्पादकीय योगदान हैं: कुछ स्थानों पर भाषा को थोड़ा सम्पादित किया गया है, समाप्ति-नोट्स (endnotes) जोड़े गये हैं और विषय-वस्तु के प्रवाह और बोधगम्यता को सुविधाजनक बनाने के लिए वर्गाकार कोष्ठकों (square brackets) में अतिरिक्त पाठ सम्मिलित किया गया है। इसका शाब्दिक-प्रतिलेखन शीघ्र ही उपलब्ध होगा।
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[0:00-5:05 तक गिरिधारी पण्डा का आदर-सम्मान एवं मङ्गलाचरण]
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: षष्ठयाम में साधक भक्तों की—साधकों की क्या अवस्था होती है—इसको श्रील भक्तिविनोद ठाकुरजी ने व्यक्त किया है। मैंने इसकी व्याख्या की है।
What are the symptoms of a Jāta-rati-bhakta, how do they [perform] kīrtana, and serve? I have explained all this what Śrīla Bhaktivinoda Ṭhākura has told, specially…
क्षान्तिरव्यर्थकालत्वं विरक्तिर्मानशून्यता।
आशाबन्धः समुत्कण्ठा नामगाने सदा रुचिः।।
आसक्तिस्तद्गुणाख्याने प्रीतिस्तद्वसतिस्थले।
इत्यादयोऽनुभावाः स्युर्जातभावांकुरे जने॥
-श्रीभक्तिरसामृतसिन्धु (1.3.25-26)
[क्षान्ति (क्षमा), अव्यर्थकालत्व अर्थात् ऐसा यत्न जिससे कि कृष्णसेवा के अतिरिक्त समय व्यर्थ न हो, विरक्ति अर्थात् कृष्णेतर वस्तुओं से वैराग्य, मानशून्यता अर्थात् अपना सम्मान न चाहना, आशाबन्ध अर्थात् भगवत् प्राप्ति की दृढ़ आशा तथा साधन में उत्कण्ठा, सर्वदा कृष्णनाम-संकीर्तन में रुचि, कृष्ण की लीला कथाओं के वर्णन में आसक्ति और कृष्ण की लीला-स्थलियों में प्रीति— ये छह प्रकारके अनुभाव भावांकुर होनेपर मनुष्य के स्वभाव में दिखायी देते हैं।] GVP
इस सबकी हमने व्याख्या की। विशेषकर प्रगाढ़ भावावस्था उपस्थित होने पर साधकों के भीतर में जो अनुभाव उत्पन्न होते हैं, वे भक्तिरसामृतसिन्धु में दिये गये हैं—
नृत्यं विलुठितं गीतं क्रोशनं तनुमोटनम्।
हुंकारो जृम्भणं श्वासभूमा लोकानपेक्षिता।
लालास्रावोऽट्टहासश्च घूर्णा हिक्कादयोऽपि च॥
-श्रीभक्तिरसामृतसिन्धु (2.2.2)
[अन्तःकरण के भावों को प्रकट करनेवाले बाहरी विकारों को अनुभाव कहते हैं; जैसे—नृत्य, विलुंठन (भूमिपर लोटना), गान, जोर से चिल्लाना, अङ्गों का मरोड़न, हुंकार, जम्भाई, दीर्घ-श्वास, लोकापेक्षा त्याग, लार टपकना, जोर से हँसना, चक्कर आना और हिचकी।] GVP
जब रति उत्पन्न हो जाती है, उस समय साधकों के हृदय में—अन्तःकरण में जो भाव होते हैं, उन भावों को बाहर में प्रकाश करनेवाली ये सब चीज़ें हैं—अनुभाव। इसलिये उनको अनुभाव [कहते हैं।] अनुभाव—‘अनु’ माने हृदय में जो भाव होगा, उसके पीछे से उस भाव को व्यक्त करनेवाली ऊपर से शारीरिक जो क्रियाएँ हैं, उनको अनुभाव कहते हैं।
जैसे जब मन आनन्द में नृत्य करने लगता है, तो शरीर भी नृत्य करने लगता है। यदि वह [मन] भूमि पर लोटपोट होने लगता है, तो उसका शरीर भी भूमि पर लोटपोट करने लगता है। जब आत्मा गान करने लगती है, तो वह भी ज़ोर से गान करने लगता है। ज़ोर से चिल्लाना। अङ्गों का मरोड़न अर्थात् अङ्गों में अंगड़ाई आने लगती है। हुंकार— महाप्रभु हुंकार करते थे। जम्भाई, दीर्घ श्वास अर्थात् लम्बे श्वास। लोकापेक्षा त्याग—लोग क्या कहेंगे, क्या नहीं कहेंगे, इसकी अपेक्षा नहीं करते। लार टपकना। ज़ोर से हँसना—बिना कारण के ही। ऐसा प्रतीत होता है कि बिना कारण हँस रहे हैं, किन्तु ऐसा नहीं है। [भाव के उदय होने पर साधक ने] मधुमङ्गल की कोई लीला देखी, कृष्ण की बाल्य-लीलाओं को देखा तो उसको देखकर बाहर से हँसता है। लोग कहते हैं कि ये पागल है। चक्कर आना और हिचकी।
नृत्य, गड़ागड़ि, गीत, चीत्कार हुंकार।
तनु फोले हाई उठे श्वास वार वार॥
लोकापेक्षा छाड़े, लालास्राव अट्टहास।
हिक्का घूर्णा बाह्य अनुभाव सुप्रकाश॥
ये [सब अनुभाव हैं।]
यही नहीं [भाव के अष्ट-सात्विक विकार हैं—] स्तम्भ, स्वेद, रोमाञ्च, स्वरभेद, वेपथु अर्थात् कम्प, वैवर्ण्य अर्थात् शरीर का विविध तरह का रङ्ग हो जाना, [अश्रु], प्रलय अर्थात् मूर्च्छा। [प्रलय का अर्थ] मृत्यु नहीं, वहाँ पर केवल मूर्च्छा।
“इत्यष्टौ सात्विकाः स्मृताः” [#1]— इनको सात्विक भाव कहते हैं। ये उस समय (भाव अवस्था में) धूमायित रूप में आयेंगे। बहुत स्पष्टरूप से नहीं आयेंगे, धूमायित रूप में आयेंगे। और पूर्ण रूप में कब आयेंगे? प्रेम, स्नेह, मान, प्रणय, राग, अनुराग और भाव जहाँ ऊपर उठता जायेगा, वहाँ और प्रज्ज्वलित से प्रज्ज्वलित रूप में ये विकार आयेंगे। हम लोगों के जीवन का उद्देश्य तो यही है। इसको ध्यान में रखकर प्रारम्भ से ही हम भजन करेंगे।
[10:23-14:23 तक किसी भक्त द्वारा अंग्रेजी भाषा में अनुवाद…]
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: यदि भाव या रति हृदय में आ जाती है, प्रकटित होती है, उस समय सांसारिक सब परिचय भूल जाता है—
नाहं विप्रो न च नरपतिर्नापि वैश्यो न शूद्रो
नाहं वर्णी न च गृहपतिर्नो वनस्थो यतिर्वा।
किन्तु प्रोद्यन्निखिलपरमानन्दपूर्णामृताब्धे-
र्गोपीभर्तुः पदकमलयोर्दासदासानुदासः॥
-पद्यावली (63)
[मैं ब्राह्मण नहीं हूँ, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र या वर्णी नहीं तथा ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यासी भी नहीं हूँ। मैं स्वतः प्रकाशमान निखिल परमानन्द स्वरूप पूर्णामृतसिन्धु गोपियों के भर्ता श्रीश्रीराधावल्लभ के चरणों के जो दास वैष्णव हैं, उनके दासों का भी अनुदास हूँ।] GVP
बस यही भाव रहता है। अब संसार में उसका कोई शत्रु, मित्र नहीं रहता। सब समय अन्तर में यह स्फूर्ति होती है—‘मैं ब्राह्मण नहीं, क्षत्रिय नहीं, शूद्र या वर्णी नहीं।’ वह यह नहीं समझता कि मैं ब्राह्मण हूँ [अथवा नहीं हूँ,] क्षत्रिय हूँ [अथवा नहीं हूँ।] उसको बस वही— गोपीभाव छोड़कर—‘आन भाव न रहिबे’—और कोई भाव नहीं रहता। दूसरे [लोग] जो उसके लक्षण देखते हैं, वे बता रहे हैं कि वह [व्यक्ति स्वयं] अपने को ब्राह्मण नहीं समझता। आया समझ में कि मैंने क्या कहा? नहीं आया? मैंने कहा कि वह नहीं सोचेगा कि मैं ब्राह्मण हूँ अथवा ब्राह्मण नहीं हूँ, क्षत्रिय हूँ—ये सब नहीं। ये तटस्थ भाववाला कह रहा है। महाप्रभुजी तटस्थ भाव से [यह श्लोक] कह रहे हैं।
उसको तो केवल एक ही चीज़ स्फूर्ति है—दास-भाव [वाले] में दास्य-भाव, सख्य-रस में सख्य-रस, वात्सल्य में वात्सल्य, मधुर में मधुर—‘आन भाव न रहिबे।’ मधुर-रस वालों को गोपी-भाव के अतिरिक्त और कोई दूसरा भाव ही नहीं रहता। इसलिये तटस्थरूप में ये लक्षण बतलाये गये हैं।
मैं स्वतः प्रकाशमान निखिल परमानन्द-स्वरूप, पूर्णामृतसिन्धु-स्वरूप, गोपियों के जो भर्ता—श्रीराधावल्लभ हैं, उनके चरणों के दास का दास का दास का अनुदास का अनुदास हूँ—बस यही [भाव रहता है।] मैं दासी हूँ—यही भाव [रहता है।]
एकला ईश्वर कृष्ण, आर सब भृत्य।
यारे यैछे नाचाय, से तैछे करे नृत्य॥
-श्रीचैतन्यचरितामृत आदिलीला (5.142)
[एकमात्र श्रीकृष्ण ही ईश्वर हैं और सब उनके दास हैं। वे जिसको जिस प्रकार नचाते हैं, वह उसी प्रकार नृत्य करता है।] IGVP
कृष्ण के अतिरिक्त [अन्य कोई ईश्वर नहीं है। सब उनके दास हैं।] यहाँ तक कि बलदेवजी भी, माँ यशोदा, नन्दबाबा भी किसी-न-किसी प्रकार से उनके दास-दासी हैं। वे अपने-अपने रस से सेवा कर रहे हैं, किन्तु सभी सेवक हैं। बलदेवजी भी, जो कृष्ण के अभिन्न अङ्ग हैं, उनका भी कृष्ण के प्रति दास-अभिमान है।
जीव मायाबद्ध होकर इस नश्वर—जड़ देहाभिमान में स्वयं का स्त्री, पुरुष और नाना प्रकार से परिचय देते हैं। कलियुग-पावनावतारी गौरसुन्दर ने कलिहत मानवों को अपने मुखारविन्द से उपदेश दिया है— हम लोग ब्राह्मण, क्षत्रिय इत्यादि नहीं हैं, संन्यासी भी नहीं हैं, कुछ भी नहीं हैं। बस गोपियों के भर्ता [श्रीकृष्ण के चरणकमलों के दास के दास के दासानुदास हैं—] “गोपीभर्तुः पदकमलयोर्दासदासानुदासः।”
जीव मायाबद्ध होने के कारण पूर्वजन्मों की वासना और संस्कारों के क्रम से नवीन शरीर धारण करता है तथा किसी-न-किसी वर्ण और आश्रम में जन्म लेता है। मृत्यु के पश्चात् अपने कर्मों का फल भोग करता है और वैसी ही गति लाभ करता रहता है, यही कर्मचक्र कहलाता है—जन्म और मृत्यु का अनन्त चक्र (Endless chain of birth and death.) जीव को अपने शुद्ध स्वरूप की अनुभूति सद्गुरु का चरणाश्रयकर, पूर्व-पूर्व महाजनों द्वारा आचरित भजन-पथ का अवलम्बन करने से होती है। यदि भजन-पथ का अवलम्बन करेगा, [तभी अपने शुद्ध स्वरूप की अनुभूति होगी।] और यदि ऐसा नहीं करके ऊपर से हरिनाम भी करता है, सब कुछ करता है किन्तु बाहरी वस्तुओं में लगा हुआ है, तब तो वह [पुनः पुनः] जन्म लेगा।
नाम-भजन करते-करते जड़-अभिमान दूर होता है, शुद्ध अप्राकृत चिन्मय-भाव प्रकट होता है तथा शुद्ध कृष्ण-सेवोपयोगी चिन्मय शरीर की उपलब्धि होती है। [यह उपलब्धि] गुरु करा देंगे और [चित्त में] कृष्ण की स्फूर्ति होने से, उनकी प्रेरणा से आत्मा के सिद्धदेह की भी अनुभूति होगी।
शुद्ध-चित्-स्वभाव में केवल कृष्ण ही पुरुष हैं तथा अन्य सब स्त्री। जीव के चित् के गठन में वस्तुतः स्त्री-पुरुष का कोई चिह्न नहीं होता, किन्तु सेवा के स्वभाववशतः जैसे जो सेवा करते हैं, वैसे सेवा के अनुरूप जीव का स्त्री या पुरुष अभिमान होता है। किन्तु इसको भी नित्य समझना, यह अनित्य नहीं है।
साधन-भजन के माध्यम से वे शुद्धदेह प्राप्त करते हैं। जिनकी मधुररस में स्पृहा है, वे रसिक-भक्तों के आनुगत्य में साधन-भजन करते-करते अपनी वासना और साधन के अनुसार सिद्धदेह (गोपीदेह) प्राप्त करते हैं। योगमाया—अघटन-घटन-पटीयसी-शक्ति ही इसकी सारी व्यवस्था करती है।
साधने भाविवे जाहा सिद्ध देहे पाब ताहा।
केवल मात्र पक्व अपक्व विचार॥
-प्रेमभक्तिचन्द्रिका
साधन में जो भाव चिन्तन करेंगे, वस्तुसिद्धि में वैसा ही भाव होगा। केवल पक्व और अपक्व का यहाँ पर विचार है।
इसलिये बतलाया— “व्रजगोपी भाव हइबे स्वभाव, आन भाव न रहिबे।”
[20:38-27:41 तक किसी भक्त द्वारा अंग्रेजी भाषा में अनुवाद…]
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: एक बात स्पष्ट कर देना चाहता हूँ, जो हमारे आचार्यों ने स्पष्ट की है। श्रील रूप गोस्वामी ने भी कहा है। शुद्ध-भक्ति में प्रवेश करने के लिए स्वयं विधि-मार्ग का पालन करना होगा।
जिसकी रति उत्पन्न नहीं हुई है, उस साधक को भक्ति के चौसठ प्रकार के अङ्गों में से अपने स्वाभीष्ट भावमय, स्वाभीष्ट भावसम्बन्धी, स्वाभीष्ट भावानुकूल और स्वाभीष्ट भाव-अविरुद्ध [अङ्गों] को ग्रहण करना होगा। और जो उसके स्वाभीष्ट के विरुद्ध होगा, [अर्थात् स्वाभीष्ट भावविरुद्ध,] उसको छोड़ देना होगा। हमने इन सबका बहुत पहले वर्णन किया है।
भक्ति-मार्ग में श्रील रूप गोस्वामी, श्रील रघुनाथदास गोस्वामी इत्यादि की भाँति, शरीर के द्वारा उन्होंने जो साधन [प्रदर्शित किया] है, वैसे ही उसे ग्रहण करना होगा। और सिद्धरूप में, मञ्जरी इत्यादि के रूप में जो भजन करते हैं, उसको भी ग्रहण करना होगा।
सेवा साधकरूपेण सिद्धरूपेण चात्र हि।
तद्भावलिप्सुना कार्या व्रजलोकानुसारतः॥
-श्रीभक्तिरसामृतसिन्धु (1.2.295)
[जिन्हें रागात्मिका-भक्ति पाने की प्रगाढ़ लालसा है, वे रागमार्ग परायण व्रजवासियों का अनुसरण करते हैं। साधकरूप से, बाह्यदेह के द्वारा श्रवण-कीर्तन का रागानुगा आचरण तथा सिद्धरूप से अपने गुरुप्रदत्त स्वरूप का चिन्तन करते हुए अन्तश्चिन्तित देह के द्वारा सेवा करें।] GVP
“व्रजलोकानुसारतः” का क्या [अर्थ है?] श्रील रूप गोस्वामी, श्रील रघुनाथदास गोस्वामी इत्यादि षड्गोस्वामियों ने या हमारे अन्य गोस्वामी लोगों ने जिस प्रकार ऊपर से [अर्थात् बाह्यरूप से] शरीर से भजन किया, ऐसे ही [साधक को भी शरीर से साधन करना होगा।]
संख्यापूर्वक-नामगाननतिभिः कालावसानीकृतौ
निद्राहार-विहारकादि-विजितौ चात्यन्तदीनौ च यौ।
राधाकृष्ण-गुणस्मृतेर्मधुरिमानन्देन सम्मोहितौ
वन्दे रूप-सनातनौ रघुयुगौ श्रीजीव-गोपालकौ॥
-श्रीषड्गोस्वाम्यष्टकम् (6)
मैं, श्रीरूप-सनातनादि उन छ: गोस्वामियों की वन्दना करता हूँ कि, जो अपने समय को संख्यापूर्वक नाम-जप, नामसंकीर्तन एवं संख्यापूर्वक प्रणाम आदि के द्वारा व्यतीत करते थे; जिन्होंने निद्रा-आहार-विहार आदि पर विजय प्राप्त कर ली थी एवं जो अपने को अत्यन्त दीन मानते थे तथा श्रीराधाकृष्ण के गुणों की स्मृति से प्राप्त माधुर्यमय आनन्द के द्वारा विमुग्ध रहते थे। (GVP)
ये सब साधन [करना होगा।]
“हे राधे! व्रजदेविके! च ललिते! हे नन्दसूनो! कुतः” [#2]— ये सब पालन करना होगा—व्रजलोकानुसारतः। और सिद्धस्वरूप में वे जो अष्टकालीयलीला आदि का स्मरण करके सेवा करते हैं, ये सब भी होगा। किन्तु होगा कैसे?
इसीके लिए कहते हैं—विधि-मार्ग का अभिप्राय गुरु-पदाश्रयादि चौसठ प्रकार के भक्ति-अङ्गों का पालन करना है। किन्तु उसमें विशेष विचार, जो अभी बतलाया, वह है—स्वाभीष्टभावमय दास्य, सख्य, मधुर आदि; और स्वाभीष्टभाव सम्बन्धी गुरु-पदाश्रय आदि; स्वाभीष्ट भावानुकूल तुलसी-काष्ठ की माला, तिलक, वैष्णव-चिह्न, तुलसी-सेवा, परिक्रमा, प्रणाम आदि; स्वाभीष्ट भाव-अविरुद्ध: गो, अश्वत्थ, आँवला, ब्राह्मण आदि का सम्मान करना; और स्वाभीष्ट-भावविरुद्ध: न्यास-मुद्रा, द्वारका-ध्यान आदि। इन सबको ठीक रखते हुए भजन करना होगा।
ऐसे करते-करते, विशेषकर चैतन्य महाप्रभु के विचार [के अनुसार] श्रील रूप गोस्वामी ने जो साधन दिया है, श्रीचैतन्यचरितामृत पढ़ने से उसमें वैधी-भक्ति का जो विचार है, उसे पालन करने से [साधक क्रमशः] रागानुगा-मार्ग में अपने आप आ जायेगा।
विधिमार्गरत-जने, स्वाधीनता रत्न दाने
रागमार्गे करान प्रवेश।
-कल्याणकल्पतरु
[जो लोग विधिमार्ग का पालन करते हैं, श्रीकृष्ण उन्हें स्वाधीनता के रत्न से विभूषित करके रागमार्ग में प्रवेश प्रदान करते हैं।]
हमारे गोस्वामियों के ग्रन्थ ही ऐसे हैं। उनका वैधीमार्ग भी रागानुगा-भक्ति को लक्ष्य करता है। इसलिये आज या कल, यदि शुद्धरूप में उसने साधन-भजन किया, तो [वह रागानुगा-भजन में] अवश्य आयेगा।
मैं यहीं तक कहकर अपना वक्तव्य समाप्त करता हूँ। इसके बाद हम लोग…
आज हम लोग परम पूज्यपाद श्रील भक्तिवेदान्त वामन महाराजजी की विरह-तिथि का पालन कर रहे हैं। आज हम उनका विधिवत् अर्चन करेंगे, आरती करेंगे। अभी श्रीपाद भक्तिवेदान्त परिव्राजक महाराजजी [पट] खोलकर अर्चन करेंगे। मैं भी वहाँ जाता हूँ। सभी लोग इधर से आकर उनके चरणों में पुष्पाञ्जलि अर्पित करेंगे और लगभग दस बजे फिर हम बैठेंगे।
उस समय—विरह-तिथि के दिन, जब मैं लौटकर आया था, [उस समय] सभी वक्ता लोग रोते हुए उनके चरणों में पुष्पाञ्जलि अर्पित कर रहे थे—यथार्थ में वही [पुष्पाञ्जलि] है, जैसा उन लोगों ने उस दिन पुष्पाञ्जलि अर्पित की थी।
जो वक्ता लोग उस दिन बोल नहीं सके थे, वे आज उनके गुणानुवाद करते हुए उनके चरणों में पुष्पाञ्जलि अर्पित करेंगे। हम दस बजे बैठेंगे। आप सभी लोग दस बजे आइये।
You should explain all this.
[33:32-39:34 तक किसी भक्त द्वारा अंग्रेजी भाषा में अनुवाद…]
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: याद रखें, व्रत समाप्त नहीं हुआ है, आरम्भ हुआ है। अभी तो केवल चाबी दी गयी है, इसे कम-से-कम कुछ दिन रहना होगा, गौर-पूर्णिमा तक रहेगा और फिर वहाँ पर जो चाबी दी जायेगी, वह कार्तिक महीने तक रहेगी। तो इस प्रकार गुरु महाराजजी तीन बार का व्रत रखते थे।
भक्त: [तीसरी चाबी] रथयात्रा के समय [दिया करते थे।]
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: इसलिये आज व्रत समाप्त हो गया, अब कुछ करेंगे नहीं—ऐसा न करें। विशेषकर मैं समझता हूँ कि इसमें हरिनाम सब लोगों का पूरा हुआ होगा कि नहीं हुआ होगा। अब नाम पूरा करेंगे। हमारा तो नाम पूरा हुआ नहीं, इसी व्रत में ही लगा रह गया—पाठ, कीर्तन और प्रवचन में। तो हरिनाम करेंगे और ग्रन्थों का अध्ययन करेंगे।
You should not think that our vrata has finished. I think it has begun. So you should chant, remember, read books, and preach my mission—the mission of Śrīla Rūpa Gosvāmī and Śrī Caitanya Mahāprabhu—everywhere. [Do] book distribution and everything [else.]
Always be strong. Try to see that lust should not come, nor anything that is against bhakti. So always be careful about this, and try to follow the instructions that Śrīla Bhaktivinoda Ṭhākura has given in [bhajana-rahasya.]
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समाप्ति-नोट्स (Endnotes)
#1
ते स्तम्भ-स्वेद-रोमाञ्चाः स्वरभेदोऽथ वेपथुः।
वैवर्ण्यमश्रु प्रलय इत्यष्टौ सात्विकाः स्मृताः॥
-श्रीभक्तिरसामृतसिन्धु (2.3.16)
भाव के अष्ट-सात्विक विकार हैं—स्तम्भ, घर्म (पसीना), रोमाञ्च, स्वरभेद, कम्प, वैवर्ण्य, अश्रु, प्रलय अर्थात् मूर्च्छा। (GVP)
#2
हे राधे! व्रजदेविके! च ललिते! हे नन्दसूनो! कुतः
श्रीगोवर्धन-कल्पपादप-तले कालिन्दीवन्ये कुतः।
घोषन्ताविति सर्वतो व्रजपुरे खेदैर्महाविह्वलौ
वन्दे रूप-सनातनौ रघुयुगौ श्रीजीव-गोपालकौ॥
-श्रीषड्गोस्वाम्यष्टकम् (8)
मैं, श्रीरूप-सनातनादि उन छ: गोस्वामियों की वन्दना करता हूँ कि, जो “हे ब्रज की पूजनीय देवि! राधिके! आप कहाँ हो? हे ललिते! आप कहाँ हो? हे ब्रजराजकुमार! आप कहाँ हो? श्रीगोवर्धन के कल्पवृक्षों के नीचे बैठे हो अथवा कालिन्दी के कमनीय कूल पर विराजमान वनसमूह में भ्रमण कर रहे हो क्या?” इस प्रकार पुकारते हुए विरहजनित पीड़ाओं से महान विह्वल होकर, ब्रजमण्डल में चारों ओर भ्रमण करते थे। (GVP)
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