Supremacy of Srimati Radhika Is Established In Rasa Lila
48:57This audio is included in the following series of lectures:
Topics
- Sukadeva Gosvami is so absorbed in gopi rasa, that he can't speak the gopis' names during the conversation between him and Pariksita Maharaja before the 10th canto.
- When gopis heard Krsna's flute, they became mad and ran to Him immediately, leaving their household chores.
- Some gopis imitated Krsna's lila due to their viraha. Some became Putana, Yasoda or Krsna, etc.
- Some gopis saw the footprints of Krsna, but between his two footprints, they saw that there were footprints from a gopi. They thought She was fortunate.
- The vipaksa gopis said that the gopi who is with Krsna is so fortunate. The svapaksa gopis knew already that Srimati Radhika was with Krsna because they recognized Her footprints.
- The gopis sang the gopi-gita in separation; Krsna appeared and was ashamed and smiling; Srimati Radhika called Him debauchee.
- Krsna says He can't pay His debts to gopis.
- Krsna likes when he is scolded by the gopis.
- You should perform bhajana under the guidance and then you will understand the glories of the gopis.
- The 10th Canto is the essence of the Srimad Bhagavatam. You should have sradhha to listen to this to receive quick Krsna-prema.
- Srila Gurudev corrected Damodara Maharaja that Parikisita Maharaja only said, 'O mother', and not her name. Calling mother by name is not etiquette.
Transcript
रासलीला में श्रीमती राधिका की सर्वश्रेष्ठता का स्थापन
[श्रील भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराज ने 21 अक्तूबर, 2003 को गोवर्धन में यह हरिकथा कही थी।
नोट: इस प्रतिलेखन में निम्नलिखित सम्पादकीय योगदान हैं: कुछ स्थानों पर भाषा को थोड़ा सम्पादित किया गया है, समाप्ति-नोट्स (endnotes) जोड़े गये हैं और विषय-वस्तु के प्रवाह और बोधगम्यता को सुविधाजनक बनाने के लिए वर्गाकार कोष्ठकों (square brackets) में अतिरिक्त पाठ सम्मिलित किया गया है। सम्पादित संस्करण के नीचे शाब्दिक प्रतिलेखन उपलब्ध है।
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श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: श्रीश्रीगुरुदेव, गौराङ्ग और वैष्णवों की कृपा से हम लोगों की परिक्रमा का आज बारहवाँ दिन है। भगवान् की बड़ी कृपा है कि बड़े सुन्दर रूप से यह परिक्रमा चल रही है। वैष्णव-पदावली-कीर्तन भी बड़े सुन्दर-सुन्दर हो रहे हैं और साथ-साथ में हम लोग परिक्रमा में भी जा रहे हैं। कल काम्यवन की [परिक्रमा] होगी। भाई! आदिबद्री काम्यवन में ही है। काम्यवन के अन्तर्गत में आदिबद्री और केदारनाथ दोनों ही हैं। और परसों विशेषरूप से काम्यवन [की परिक्रमा] होगी।
तो मैं बतला रहा था कि हमारे परीक्षित् महाराजजी अपनी मैया उत्तरादेवी से कह रहे हैं– “मैया! जिस प्रकार एक छोटी-सी मक्षिका (मक्खी) सुमेरु पर्वत को मुख में धारण नहीं कर सकती, (बाङ्गला भाषा में) उसी प्रकार मैं गोपियों की महिमा वर्णन करने में असमर्थ हूँ। उनकी महिमा सुमेरु से भी बड़ी है और मैं मक्खी [के समान] हूँ। मैं [उनकी महिमा] नहीं बोल सकता।”
सनातन गोस्वामीजी टीका में सुन्दर रूप से [अर्थ दे रहे हैं –]
गोपियों की महिमा का वर्णन करना बहुत दूर की बात है, उनका नाम ग्रहण करने में भी मैं अक्षम हूँ। उनकी महिमा बहुत दूर की बात है। ये गोपी, ये ललिता, विशाखा, चन्द्रावली, राधिका इत्यादि नाम मैं मुख से उच्चारण नहीं कर पाता। कारण क्या है? गोपियों का नामकीर्तन करने से, उनका महिमा कीर्तन करने से मैं उन्हीं की भाँति प्रेमविवशता [को प्राप्त होऊँगा,] विरहानल शिखा [के ताप से] दग्ध हो जाऊँगा।
हमारे एकमात्र जीवनस्वरूप ये भगवद्-कीर्तन और स्मरण ये विच्छेद माने शान्त हो जायेंगे और कर नहीं पाऊँगा। हमारा जो साधन-भजन जो जीवन... क्या जीवन? भगवन्-नामकीर्तन तब तो बन्द हो जायेगा। क्यों? विरहाग्नि से जब मैं मूर्च्छित हो जाऊँगा, मुग्ध हो जाऊँगा, तब मैं कीर्तन नहीं कर पाऊँगा। तब मैं जीवित कैसे रहूँगा? इसी आशंका से–
अहो कृष्णरसाविष्टः सदा नामानि कीर्त्तयेत्।
कृष्णस्य तत्प्रियाणाञ्च भैष्म्यादीनां गुरुर्मम॥
-श्रीबृहद्भागवतामृतम् (1.7.157)
[अहो! मेरे श्रीगुरुदेव कृष्णरस में आविष्ट होकर श्रीकृष्ण और उनकी प्रिया श्रीरुक्मिणी आदि के नामों का सदा कीर्तन करते हैं, किन्तु वे कभी भी ब्रजगोपियों के नाम को मुख से उच्चारण नहीं कर पाते।] GVP
इसी कारण से हमारे गुरुदेव शुकदेव गोस्वामीजी (वैयासकि) ने अब तक ‘रुक्मिणीप्रिय’, ‘रुक्मिणीकान्त कृष्ण’, ‘सत्यभामाप्रिय वे कृष्ण’– ऐसे ही नाम किये हैं। ब्रज की गोपियों के सम्बन्ध में [नामकीर्तन] नहीं कर पाते। ‘हे गोपीकान्त! हे राधाकान्त! हे यशोदानन्दन!’ –ये नाम नहीं कर पाते हैं, हमारे गुरुजी शुकदेव गोस्वामीजी। अब तक वही करते हैं। क्यों? कृष्ण के प्रति अनुराग व कृष्णस्वरूप परमानन्द-रस में आविष्ट रहते हैं। वे कृष्णरस में, गोपीरस में इतने आविष्ट हैं कि जहाँ उनका नाम लिया– ‘राधा, चन्द्रावली, गोपी, ललिता, विशाखा’ – वे [कुछ भी कहने में] समर्थ नहीं होते। उनका मुख बन्द हो जाता, गला रुद्ध हो जाता और प्रेमानल-शिखा, विरह प्रस्फुटित हो जाता। क्यों? उन गोपियों का चरमसीमा प्राप्त परममहत्व। विशेषतः सर्वविलक्षण अतिविस्तृत परम प्रकटित प्रेमरूपी अग्नि की शिखा के ताप से दग्ध गोपियों का नामसङ्कीर्तन [करने से उनका स्मरण होता है।]
गोपियाँ किस प्रकार की हैं? सब समय कृष्ण विरहाग्नि से तप्त। मिलन हो अथवा वियोग हो, सब समय प्रेमरूपी अग्नि से दग्ध। उनके स्मरण से मेरे गुरुदेव संज्ञाहीन हो जाते हैं, मुग्ध हो जाते हैं और उन्हें बाहर का कोई आवेश नहीं रहता, ज्ञान नहीं रहता। इस कारण गुरुदेव तत्क्षणात् नामसङ्कीर्तन के समय ही [मूर्च्छित हो जाते।] क्या नामसङ्कीर्तन? ‘राधारमण हरि गोविन्द जय जय’ जहाँ उच्चारण किया ‘राधा’, बस गिर पड़े और कीर्तन नहीं कर पाते।
हम लोग तो सारा दिन ‘राधे-राधे-राधे’ करते हैं और कुछ नहीं होता। और वे लोग यदि करें, तो तत्क्षणात् मोहित हो करके, मूर्च्छित हो करके गिर [जाते हैं।] कृष्णदास (कृष्णदास प्रभु– कीर्तनीया) तो 5 दिन राधे-राधे कर सकता है और उठकर नृत्य भी कर सकता है।
वे (शुकदेव गोस्वामीजी) परमविह्वल हो जाते हैं, आकुल-व्याकुल [हो जाते हैं।] उनका कण्ठ रुद्ध हो जाता है। इसलिये कभी उनका (राधाजी) नाम नहीं करते हैं। क्या करते हैं? नाम भी यदि करना होगा तो जैसे भागवत के दशम-स्कन्ध में कहा गया है। क्या कहा गया है? ‘काश्चिद्’– कोई-कोई गोपी [कहा गया।] ‘काश्चिद्’, ‘काचित्’, ‘वह गोपी’– ऐसा बतलाया गया। [गोपियों के नाम के स्थान पर केवल] ‘वह’ [कहा गया,] ‘गोपी’ नहीं कहा। ‘वह', ‘वे’ – बस ऐसा [कहा गया।]
उसीके लिए कह रहे हैं। क्या कह रहे हैं?
दुहन्त्योऽभिययु: काश्चिद् दोहं हित्वा समुत्सुका:।
पयोऽधिश्रित्य संयावमनुद्वास्यापरा ययु:॥
-श्रीमद्भागवतम् (10.29.5)
[श्रीकृष्ण का वंशीनाद सुनते ही कोई-कोई ब्रजसुन्दरियाँ जो गायों का दूध दोहन कर रही थीं, वे उस दोहन कार्य को बीच में ही छोड़कर चल पड़ीं। कोई-कोई चूल्हे के ऊपर दूध की कढ़ाई रखकर दूध को उबलता हुआ ही छोड़कर, अन्य कोई गोपियाँ जो गेहूँ का दलिया पका रही थीं, वे उस तैयार दलिये को चूल्हे पर ही छोड़कर वेणुगीत की दिशा की ओर चल पड़ीं।] GVP
कोई-कोई गोपी क्या कर रही है? चूल्हे पर दूध रखा गया है और वह उबल रहा है और उच्छलित हो करके नीचे गिर रहा है।
बाङ्गला समझते हो?
[दूध] उच्छलित होकर गिर रहा है। पूर्णिमा की रात में गोपियों ने कृष्ण की वंशीध्वनि सुनी और उसको (दूध को) उतारा नहीं और ऐसे ही चली गयी। कोई-कोई [गोपी] गाय का दोहन कर रही थी। बस [वंशीध्वनि] सुनी और पागल हो गयी और [गाय का दोहन करना] छोड़ दिया। कोई-कोई [गोपी] दधि-मन्थन कर रही थी। बस जितना हो गया, उतना हो गया और चल दी। कोई-कोई गोपी शृंगार कर रही थी। एक आँख में अञ्जन लगाया, दूसरे में नहीं। कोई-कोई ‘संयावम्’ दलिया बना रही थी। और दलिया [बनाना] हो गया है, [उसको चूल्हे से] उतारना है, उतारा नहीं, [वंशीध्वनी सुनी और] चली गयी। कोई [गोपी] रोटी सेक रही थी। रोटी तवे में दे दिया और रोटी जलने लगी और छोड़कर [चली गयी।] इसलिये यहाँ पर [अर्थात् श्रीमद्भागवतम् में] ‘कोई-कोई’, ‘काश्चिद्’, ‘जो गोपी’, ‘वही गोपी’ इत्यादि लिखा। ‘गोपी’ भी नहीं कहा, ‘वह चली गयी’, ‘वे चली गयीं’ [लिखा।]
और भी लिखा–
कस्याश्चित् पूतनायन्त्या: कृष्णायन्त्यपिबत् स्तनम्।
तोकायित्वा रुदत्यन्या पदाहन् शकटायतीम्॥
-श्रीमद्भागवतम् (10.30.15)
[उनमें से एक गोपी पूतना बन गयी, तो दूसरी श्रीकृष्ण बनकर उसका स्तनपान करने लगी। कोई गोपी छकड़ा बन गयी, तो किसी ने बालकृष्ण बनकर रोते हुए उसे पैर से ठोकर मारकर उलट दिया।] GVP
कोई-कोई गोपी कृष्ण की भाँति आचरण करने लगीं। कैसे? अपना ये [हाथ] उठा लिया और इस पर कपड़ा तान दिया– “देखो, मैं गोवर्धन को धारण कर रही हूँ।” और-और गोपियाँ देख रही हैं। ‘शकटायतीम्’ कोई एक दूसरी गोपी गाड़ी बन गयी और कोई-कोई [गोपी] कहने लगीं– “देखो, मैं गाड़ी को दबा रही हूँ। ये चकनाचूर हो जायेगा।” कोई पूतना बन गयी। पूतना कौन बना? योगमाया। और एक गोपी क्या बन गयी? कृष्ण बन गयी और उसका स्तनपान करने लगी और उसको गिरा दिया। योगमाया को नीचे गिरा दिया और कोई पूतना बन करके… क्या है ये? लीला में आवेश है। लीला में अत्यन्त आवेश हो जाने पर– “मैं ही कृष्ण हूँ” –ये भावना होती है।
कोई-कोई गोपी यशोदा बन गयीं और कोई-कोई गोपी कृष्ण बन गयीं। और यशोदा मैया उनको बाँध रही हैं और कृष्ण रो रहे हैं। वह खुद रोने लगी और दूसरी गोपी उनको बाँधने लगी। कौन? [न] ललिता, न विशाखा, न राधिका, न चन्द्रावली– ये नाम नहीं लिया। यदि नाम लेते तो [शुकदेव गोस्वामी] ये वर्णन नहीं कर सकते थे।
वे गोपियाँ…
इत्येवं दर्शयन्त्यस्ताश्चेरुर्गोप्यो विचेतस:।
यां गोपीमनयत्कृष्णो विहायान्या: स्त्रियो वने॥
सा च मेने तदात्मानं वरिष्ठं सर्वयोषिताम्।
हित्वा गोपी: कामयाना मामसौ भजते प्रिय:॥
-श्रीमद्भागवतम् (10.30.36-37)
[इस प्रकार गोपियाँ एक दूसरे को भगवान् श्रीकृष्ण तथा उनकी प्रिया के चरणचिह्नों को दिखलाती हुई मतवाली-सी होकर अपनी सुधबुध खोकर वन-वन में भटक रही थीं। इधर भगवान् श्रीकृष्ण दूसरी गोपियों को वन में छोड़कर जिस भाग्यवती गोपी को एकान्त में ले गये थे, उसमें यह अभिमान आ गया कि “मैं ही समस्त गोपियों में श्रेष्ठ हूँ, इसीलिये तो मेरे प्यारे श्रीकृष्ण दूसरी समस्त गोपियों को छोड़कर, जो उन्हें इतना चाहती हैं, केवल मेरा ही मान करते हैं, मुझे ही आदर दे रहे हैं।] GVP
वे सब गोपियाँ विरह में बड़ी दुर्बल हो गयीं। वे चल-फिर नहीं सकतीं और फिर भी, बलहीन हो करके भी कृष्ण का रास्ता देखने लगीं कि कृष्ण किधर से जा रहे हैं? क्या देखा? ध्वज, पद्म, वज्र, अंकुश इत्यादि 19 चिह्नों को देखा।
[गोपियों ने] कहा– “अरे! ये तो कृष्ण के [चरणों के] चिह्न हैं। कृष्ण इसी रास्ते से गये हैं। इसी रास्ते से!” और वे चलने लगीं।
थोड़ी देर के बाद में देखा– “अरे! ये तो कृष्ण के दोनों पैरों के बीच में और एक छोटा-सा पैर [है जो कि] बड़ा सुन्दर है। उसमें भी चिह्न हैं। कृष्ण के दाहिने पैर में जो चिह्न हैं, वे सब चिह्न इस गोपी के बायें पैर में दिख पड़ते हैं। इसमें ध्वजा, अंकुश, वज्र इत्यादि सभी हैं।” ये कौन हैं?
अनयाराधितो नूनं भगवान् हरिरीश्वरः।
यन्नो विहाय गोविन्दः प्रीतो यामनयद् रहः॥
-श्रीमद्भागवतम् (10.30.28)
[इस भाग्यवती रमणी ने निश्चय ही भगवान् ईश्वर श्रीहरि की यथार्थ रूप में आराधनाकर उन्हें विशेष रूप से सन्तुष्ट किया है, अन्यथा हम सबको त्यागकर हमारे प्राण-प्रियतम श्रीगोविन्द केवल अकेली उसे निर्जन स्थानपर क्यों ले जाते?] GVP
“ओह! ये गोपी धन्य है। इसने आराधना की है। आराधना करके ये कृष्ण के साथ में चल रही है।”
थोड़ी देर चलने के बाद में [उन गोपियों ने] देखा कि उस बीचवाली गोपी के [चरणों का] चिह्न [नहीं है। गोपियों ने कहा–] “आहा! [कृष्ण ने] उसको गोदी में उठा लिया है और उठा करके चल रहे हैं।”
थोड़ी देर चलने के बाद में कहने लगीं– “ओह! यहाँ पर किसी के भी चरण [चिह्न] नहीं दिखते। ओह! दूर्वा घास का मैदान है। इसमें कृष्ण के पैर [का चिह्न] भी नहीं दिखता।”
थोड़ी देर के बाद में [उन गोपियों ने] देखा कि कृष्ण के पैर [का चिह्न] और गड़ा हुआ है और [उस] गोपी के बैठने का चिह्न मिला– “ओह! यहाँ पर [कृष्ण] उसको उतार करके उसकी वेशभूषा बनाने के लिए फूल तोड़ रहे हैं।” और जहाँ पर फूलों की डाली है, [वहाँ] कृष्ण के पैरों का अगला भाग देखा, पिछला भाग नहीं देखा– “ओह! ये कामी उसको यहाँ बैठा करके उसका शृङ्गार कर रहा है और फूलों को चुनने के लिए ये अपने पंजों को ऊपर में [अर्थात्] ऊँचा कर रहा है।” कोई इस प्रकार से… ऐसे ही ऐसे और सब लीलाएँ हो रही हैं।
और सनातन गोस्वामी ने क्या बाकी रखा? सभी तो उन्होंने कह दिया।
[17:29-25:25 तक किसी भक्त के द्वारा श्रील गुरुदेव की हरिकथा का अंग्रेजी भाषा में अनुवाद...]
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: Then Kṛṣṇa told to a gopī. Who was that gopī? It was none other than Rādhikā — but He did not mention Her name.
[तब कृष्ण ने एक गोपी से कहा। वह गोपी कौन थीं? और कोई नहीं, स्वयं श्रीमती राधिका ही थीं — किन्तु उन्होंने उनका नाम नहीं लिया।”]
(बाङ्गला भाषा में) ओह! उन्होंने (शुकदेव गोस्वामी ने) नाम नहीं लिया। [उन्होंने इस प्रकार से कहा–] ‘किसी एक गोपी को’
कृष्ण ने क्या किया?
कृष्ण ने कहा– “चलो, गोपियाँ–सखियाँ सब निकट में आ गयी हैं। चन्द्रावली और ये सब भी [आ गयी हैं।] वे देखेंगी तो हमें क्या कहेंगी? हमारे ऊपर में सभी रुष्ट हो जायेंगी।”
तो [उस] एक गोपी ने कहा, जिसको कृष्ण बोल रहे थे, जिसको अपने कन्धे पर या अङ्क में बैठाकर जिसको वहन कर रहे थे, वह गोपी कह रही है– “मैं चल नहीं सकती, मैं थक गयी हूँ। अब आपको वन के भीतर में या बाहर में जहाँ भी ले चलना है, आप मुझे उठा लीजिये और ले करके चलिये। मैं अब चल नहीं सकती।”
अच्छा, ऐसा किसलिये कहा? कहने का कारण है। राधाजी सोच रही हैं– “सखियाँ हमारे लिए प्राण देती हैं और इन सबको छोड़ करके मैं अकेले कृष्ण के साथ में विलास करूँगी, यह मेरे लिए बहुत अनुचित है।” इसलिये और गोपियों की, अपनी सखियों की चिन्ता करके उन्होंने कहा– “मैं नहीं चल सकती हूँ। आपको जहाँ इच्छा हो वहाँ ले चलिये, किन्तु अब मैं नहीं चल सकती।”
[उस गोपी ने] सोचा– “कृष्ण कहेंगे कि यहीं रहो, मत चलो। और गोपियाँ आ जायेंगी, कृष्ण भाग जायेंगे तो फिर... या गोपियों के साथ में मैं कृष्ण के साथ विलास [करूँगी।”]
कृष्ण ने कहा– “अच्छी बात है। तो तुम मेरे कन्धे पर चढ़ जाओ।” और कृष्ण बैठ गये। ये गोपी इतने विरह में तन्मय थी कि कृष्ण तो वहीं पर है [किन्तु] कृष्ण को देख नहीं सकी। पैर उठाया, विरह में देखा और कृष्ण वहीं से हट करके वन के भीतर में छिप गये। अब ये गोपी तड़पने लगी “हाय! कृष्ण कहाँ गये? श्यामसुन्दर कहाँ गये?” कौन? ‘एक गोपी’। ये नहीं बतलाया जा रहा है [कि कौन है?] किन्तु [ये गोपी] है कौन? ये राधिकाजी हैं।
गोपियाँ वहाँ से खोजती-खोजती आयीं– “अरे! तुम यहाँ पर पड़ी रो रही हो?”
[उस गोपी] के मुँह को धो करके पानी पिलाया और उसको मूर्च्छित से स्वस्थ किया– “अरे! तुम हमारे जैसे क्यों विलाप कर रही हो? क्या हुआ?”
उस गोपी ने कहा– “हमने तो उनको बड़े सौभाग्य से पाया, किन्तु मैंने कहा कि मुझको जहाँ इच्छा हो, ले चलो; मैं चल नहीं सकती। [उन्होंने] मेरा शृङ्गार भी किया, सब कुछ किया। किन्तु अन्त में मुझको गर्व हो गया और गर्व होने से मैंने ऐसा कहा कि जहाँ इच्छा हो, वहाँ ले चलो। तो उन्होंने कहा कि अब मैं बैठ रहा हूँ। मेरे कन्धे पर चढ़ जाओ। ज्योंहि मैंने उनके कन्धे के ऊपर चढ़ना चाहा, देखा कि वे [अन्तर्धान हो गये।] इसलिये मैं विलाप कर रही हूँ।”
वह [एक गोपी] कौन है? राधिकाजी। तत्पश्चात् में जिसने कहा कि ‘अनयाराधितो नूनं भगवान् हरिरीश्वरः’ ये किसने कहा? कौनसी गोपी [ने कहा?]
भक्त: विपक्ष की गोपी ने
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: विपक्ष की गोपी [ने कहा।] ललिता-विशाखा [इत्यादि] अपनी गोपियाँ [अर्थात् स्वपक्ष की गोपियाँ] जो राधाजी के चरणों के चिह्नों को जानती थीं, वे समझ गयीं कि कृष्ण के साथ में यही गोपी है।
और उन्होंने (विपक्ष की गोपियों ने) कहा– “जो इनके पास में रह रही है, जिसको उठा करके ले जा रहे हैं, ये निश्चित ‘अनयाराधितो हरिः’ भगवान् को इन्होंने बहुत-सी तपस्या करके प्रसन्न किया है। इसलिये कृष्ण उनको साथ ले करके जा रहे हैं।”
[शुकदेव गोस्वामी ने] किसीका नाम नहीं लिया। नाम लेने से वैसा ही विरह होगा, जैसाकि राधाजी को विरह हुआ था। ऐसा विरह [होगा,] इसलिये नहीं कहा।
इसके बाद में वे सब गोपियाँ एकत्र हो करके यमुना के किनारे पर आ गयीं। किसलिये? [गोपियों ने सोचा–] “हम [कृष्ण को] ढूँढ रही हैं, तो ये और पीछे-पीछे अँधकार में भाग रहा है। उसको कष्ट होगा।” इसलिये [यमुना के किनारे] चली गयीं और वहाँ पर क्या किया?
जयति तेऽधिकं जन्मना व्रजः श्रयत इन्दिरा शश्वदत्र हि।
दयित दृश्यतां दिक्षु तावकास्त्वयि धृतासवस्त्वां विचिन्वते॥
-श्रीमद्भागवतम् (10.31.1)
[गोपियोंने कहा—हे प्रियतम! तुम्हारे द्वारा इस व्रज में जन्म लेने के कारण यह व्रजमण्डल वैकुण्ठ आदि लोकों से भी अधिक महिमायुक्त हो रहा है। इसी कारण से सब प्रकार के सौन्दर्य और सम्पत्ति की अधिष्ठात्री-देवी श्रीलक्ष्मी सदा-सर्वदा इस व्रज को अलंकृत करती हुई यहाँ निवास कर रही हैं। किन्तु नाथ! ऐसे अत्यधिक आनन्द से परिपूर्ण इस व्रजधाम में तुम्हारी प्रेयसी हम गोपियाँ ही तुम्हारे विरह में अत्यन्त दुःखी हैं, तथापि केवल तुम्हारे लिए ही अपने प्राणों को धारण कर रही हैं और तुम्हें चारों ओर ढूँढ़ते-ढूँढ़ते कातर हो गयी हैं, अतएव अब तो दर्शन दो।] GVP
तव कथामृतं तप्तजीवनं कविभिरीड़ितं कल्मषापहम्।
श्रवणमङ्गलं श्रीमदाततं भुवि गृणन्ति ते भूरिदा जनाः॥
-श्रीमद्भागवतम् (10.31.9)
[तुम्हारा कथारूप अमृत तुम्हारे विरह से कातर लोगों के लिए जीवनस्वरूप है। विज्ञ व्यक्ति अर्थात् (ब्रह्मा, शिव, चतुःसन आदि) कविगण भी उसकी स्तुति किया करते हैं। तुम्हारी कथा प्रारब्ध और अप्रारब्ध-पापों का नाश करनेवाली, श्रवणमात्र से ही मङ्गल प्रदान करनेवाली, प्रेमरूपी सम्पत्ति को प्रदान करनेवाली तथा कीर्तन करनेवाले के द्वारा विस्तारित होती है। अतएव जो व्यक्ति इस संसार में तुम्हारी कथाओं का कीर्तन करता है, वही सर्वश्रेष्ठ दाता है।] GVP
गोपियाँ तन्मय हो करके गाने लगीं और तब कृष्ण से रहा नहीं गया। उस समय में कृष्ण प्रकट हुए। ‘आविरभूच्छौरिः स्मयमानमुखाम्बुजः’ [#1] कुछ लज्जित हुए, कुछ लजाते हुए, कुछ मुस्कुराते हुए, कुछ आनन्द से आँसू उमड़ते हुए [कृष्ण] प्रकट हुए। ‘शौरिः’ माने वसुदेव महाराज के पुत्र। [कृष्ण] बड़े निष्ठुर हैं। इसलिये शुकदेव गोस्वामी ने उन पर निष्ठुरता का दोष लगा करके ‘शौरिः’ उनका नाम दिया, ‘कृष्ण’ नहीं कहा।
जिस समय वे प्रकट हुए तो गोपियाँ… कोई रोष से दूर में खड़ी हो गयीं और कटाक्षरूपी बाण चलाने लगी। और किसी ने पीछे से आ करके उनके बायें हाथ को अपने कन्धे पर रख लिया और उसको सहलाने लगी। कोई दूसरे हाथ को सहलाने लगी। कोई उनके चरणकमलों को अपनी गोदी में ले करके सहलाने लगी। कोई कुछ करने लगी। विपक्ष, स्वपक्ष, तटस्थ और सुहृत्– चारों प्रकार की सखियाँ चार प्रकार की भावना से उनको [मिली।]
जो दूर में खड़ी थीं, वह कौन हैं? श्रीमती राधिकाजी। वे अपने नेत्रों के कटाक्ष से उनको देख रही हैं और कह रही हैं– “ऐसा धूर्त, काला और लम्पट!” और ललिता-विशाखा उनका अनुगमन करके उनको कह रही हैं– “हमारी सखी को छोड़ करके चले गये! कैसे तुम [इतने] निष्ठुर हो?” इस प्रकार से [कहने लगीं।]
तो [इस प्रकार से शुकदेव गोस्वामी ने] इन सब सखियों का वर्णन किया। [किन्तु किसी का] नाम नहीं दिया। ‘काश्चिद्, एका, द्वितीया, तृतीया, चतुर्थी’– इस प्रकार से गोपियों का वर्णन किया। इस प्रकार से फिर ‘वे गोपियाँ’ कृष्ण को ले करके यमुना के पुलिन में नृत्य करने लगीं। कौन गोपियाँ?
तब कृष्ण ने कहा–
न पारयेऽहं निरवद्यसंयुजां स्वसाधुकृत्यं विबुधायुषापि वः।
या माभजन् दुर्जरगेहशृङ्खलाः संवृश्च्य तद्वः प्रतियातु साधुना॥
-श्रीमद्भागवतम् (10.32.22)
[हे ब्रजसुन्दरियो! मैं ब्रह्मा के जीवनकाल में भी आप लोगों की निःस्पृह सेवा के ऋण को चुका नहीं पाऊँगा। मेरे साथ तुम लोगों का मिलन निर्मल और अनिन्दनीय है। तुमने उन समस्त गृह-बन्धनों को तोड़कर मेरा भजन किया है, जिन्हें तोड़ पाना अत्यन्त कठिन है। अतएव तुम्हारे यशस्वी कार्य ही तुम्हारे साधुत्व का प्रत्युपकार करें।] GVP
‘प्रतियातु साधुना’– हे गोपियों! मेरा तुम्हारे प्रति जो कृत्य है, वह तुम्हारे ऋण को नहीं चुका सकता। तुम अपने साधुत्व से क्षमा करके मुझको कृतार्थ करो।
इस प्रकार से [शुकदेव गोस्वामी ने] वर्णन किया। कुछ बाकी नहीं रखा, किन्तु किस रूप में कहा? इस (परोक्ष) रूप में कहा। [उदाहरणस्वरूप, यदि मैं कहूँ कि] एक व्यक्ति दण्ड लिए हुए हमारे साथ में बैठे हुए हैं। कश्मीर में उनका जन्म हुआ। मुस्कुरा भी रहे हैं। दाढ़ी और मूंछ भी है। बतलाओ तो वह कौन है? ये बैठे हैं सामने। तो इस [शैली से कहने] में कुछ आनन्द रहता है। इसको क्या कहते हैं?
भक्त: परोक्षवाद।
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: परोक्ष रूप में। भागवत परोक्ष रूप में है। परोक्ष...
भक्त: ‘परोक्षवादो वेदोऽयं बालानामनुशासनं’ [#2]
अन्य भक्त: ‘परोक्षं मम च प्रियम्’ [#3]
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: ये परोक्षवाद भगवान् को प्रिय है। उनको अच्छा लगता है। तो इस प्रकार से वर्णन किया।
परीक्षित् महाराजजी कह रहे हैं– “हे माता (माँ)! आप इन बल्लवी (गोपियों) के साथ रासक्रीड़ा इत्यादि [में मिलित] कृष्ण का, ब्रजबल्लवीगण के जो परम प्रियतम कृष्ण हैं, उनका भजन करो और तभी आप उनके आनुगत्य में उन सभी भक्तों जैसी भक्ति करने से गोपियों की किञ्चित् महिमा समझ सकेंगी, नहीं तो नहीं समझेंगी। यदि महिमा समझ जायेंगी तो क्या होगा? तो फिर वैसे ही भजन होने लग जायेगा और वैसे ही कृष्ण [के प्रकटलीला के समय] गोपी घर में कहीं जन्म ले करके और फिर आप प्राणवल्लभ के रूप में उनको प्राप्त करेंगी।”
आप लोग भी ऐसा सोचिये, ऐसा ही।
कह रहे हैं– ‘एतन्महाख्यानवरं महाहरेः’ – जो लोग इस महाआख्यान को श्रवण करेंगे... ये महाआख्यान है। ये श्रीमद्भागवत के सार का भी सार है। इसमें [श्रीमद्भागवतम्] के 1 से 9 अध्याय और दशम स्कन्ध का भी सब सार है। श्रीमद्भागवतम् का सार ये दशम स्कन्ध हैं जिसमें कि जिन राजाओं के वैराग्य इत्यादि का वर्णन किया गया है, वे वैराग्य इत्यादि के लिए भक्ति के पीछे वैराग्य होगा तब। और दशम स्कन्ध को क्या कहते हैं? – दस में से...
भक्त: मुखारविन्दं दशमः [#4]
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: श्रीमद्भागवतम् में दस में से दस [लक्षण हैं।] तो यह दशम स्कन्ध ही मूल है, रसस्वरूप है और इसकी प्रतिष्ठा के लिए ही 1 से 9 [स्कन्ध हैं] और एकादश व द्वादश स्कन्ध सिद्धान्त समन्वित हैं कि कैसे [दशम स्कन्ध में वर्णित गोपियों के जैसी भक्ति को] पाया जायेगा। [ये स्कन्ध] भजन-साधन के लिए [प्रकाश स्तम्भ] हैं।
जो लोग इस महा-आख्यान को, जिसमें कृष्ण के करुणापात्र का निर्धारण किया गया है कि कृष्ण का सबसे [अधिक] करुणापात्र कौन है, श्रद्धा के सहित श्रवण या कीर्तन करेंगे या अपने किसी अङ्ग से ही सम्यक् रूप से आचरण करेंगे, ब्रजलीला [स्थलियों] का दर्शन करेंगे, जैसे हम दर्शन कर रहे हैं, कान से उनके [विषय] में ध्यान से सुनते हैं, किन्तु श्रद्धापूर्वक होना चाहिये और नहीं [तो यदि] अपराधमूलक रूप में होगा, तो फिर सब चौपट हो जायेगा। श्रद्धा के साथ में [होना चाहिये। और यदि हमारे प्रति किसीका आचरण] अपराध वाला भी है तो उसको समझो कि हमारे कर्मों का फल है। उसके प्रति द्वेष-कलह कुछ मत रखो। उसके प्रति बदला लेने की भावना मत रखो, जिसको ईर्ष्या कहते हैं। भगवान् के ऊपर में छोड़ दो। हरिदास ठाकुर के जैसे उसका कल्याण चाहो। तो जो ऐसा करेंगे, सम्यक् रूप से इस महा-आख्यान को, चरित्र को, इस बृहद्भागवतामृत को सुनेंगे, श्रद्धापूर्वक सुनेंगे तो वे भी शीघ्र ही कृष्ण के प्रति गोपियों जैसे प्रेम को लाभ करेंगे।
‘इति श्रीबृहद्भागवतामृते प्रथमखण्डे सप्तमऽध्याये मूल समाप्त’ [अर्थात् श्रीबृहद्भागवतामृत के प्रथमखण्ड का सप्तम अध्याय समाप्त हुआ।]
आज अभी हमने समाप्त [किया।] पहले मैंने यह पाठ तो किया था किन्तु इतनी गम्भीरता से विचार करते हुए नहीं किया था। इस बार बहुत गम्भीर रूप से और एक-एक श्लोक को ले करके हमने विचार किया। तो ये मेरा भी सौभाग्य है, आप लोगों का भी सौभाग्य है कि इसको सुन रहे हैं। सुन करके भजन में प्रमत्त होकर ऐसा ही भजन [करो] जैसाकि इन्होंने सनातन गोस्वामीजी ने निर्देश किया है। केवल निर्देश ही नहीं, उन्होंने अपने जीवन में आचरण करके दिखाया है। रूप गोस्वामीजी ने भी आचरण करके [निर्देश] किया है। ऐसा ही भजन करो। तुम्हारा जीवन सार्थक हो। कृष्ण और गोपियाँ आप लोगों के ऊपर कृपा करें।
Now you should [translate.]
इसके बाद में हम शाम को भजन रहस्य करेंगे और सवेरे उपदेशामृत, मनःशिक्षा, शिक्षाष्टक और दूसरे-दूसरे [ग्रन्थ पाठ करेंगे।]
[39:30 से 45:55 तक किसी भक्त के द्वारा श्रील गुरुदेव की हरिकथा का अंग्रेजी भाषा में अनुवाद...]
[भक्त के द्वारा अनुवाद करते समय श्रील गुरुदेव भक्त को संशोधित करते हैं–]
भक्त: Parīkṣit Mahārāja is saying to his mother, Uttarā— “O Uttarā!”
[परीक्षित् महाराज अपनी माता उत्तरा से कह रहे हैं—“हे उत्तरा!”]
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: No, no—Uttarā. Don’t tell Uttarā. Parīkṣit Mahārāja cannot [call] his mother by [the name] Uttarā. [He will say,] “O Mother” [not “O Uttarā.”]. In Western countries there is no [such] etiquette, Or, you have no etiquette? I know that in English [it is] very polite[—they say,] “Please do this.” Even not in Indian languages. So how were you cultured in this [way,] that [Parīkṣit Mahārāja addresses his] mother, “O Uttarā”? [The same way—]“O Gurudeva! How are you? O Nārāyaṇa Mahārāja! You are okay?”
[नहीं, नहीं—‘उत्तरा’ मत कहो। परीक्षित् महाराज अपनी माता को उनके नाम से नहीं पुकारेंगे। वे कहेंगे—‘हे माता!’
पश्चिमी देशों में ऐसा शिष्टाचार नहीं होता। या फिर, तुम्हें शिष्टाचार का ज्ञान ही नहीं है? मुझे पता है कि अंग्रेज़ी में तो बहुत विनम्रता से कहते हैं—‘Please do this.’ यहाँ तक कि भारतीय भाषाओं में भी ऐसा नहीं कहा जाता। तो फिर तुम्हें किस प्रकार ऐसी शिक्षा मिली कि परीक्षित् महाराज अपनी माता को ‘हे उत्तरा’ कहकर सम्बोधित करें?
क्या ऐसे ही कहते हो—‘हे गुरुदेव! आप कैसे हैं? हे नारायण महाराज! आप ठीक हैं?’
Perhaps you have taken birth in Assam, in the village of Narakāsura.
[सम्भवतः तुम्हारा जन्म असम में, नरकासुर के गाँव में हुआ होगा।]
Don't do!
[ऐसा मत करो।]
[47:03 से 47:37 तक भक्त के द्वारा अंग्रेजी भाषा में अनुवाद...]
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: महा-आख्यान। आख्यान माने?
भक्त: कहानी (story)
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: Not story. Never told a story. Like Upaniṣad-Vedas upākhyāna. Upadeśa-upākhyāna…
यह कहानी नहीं है। [सनातन गोस्वामी ने] कहानी नहीं सुनायी है। यह उपनिषदों, वेदों [में वर्णित] उपाख्यान की भाँति है। उपाख्यान-उपदेश…
भक्त: narrations (उपाख्यान)
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: like Śrīmad-Bhāgavatam Upākhyāna, Prahlāda-caritra, Prahlāda-upākhyāna, Rāya Rāmānanda and Mahāprabhu Upākhyāna—Kathana-upakathana
[श्रीमद्भागवतम् के उपाख्यानों की भाँति — प्रह्लाद-चरित्र, प्रह्लाद-उपाख्यान। राय रामानन्द और महाप्रभु उपाख्यान—कथन-उपकथन]
Don’t think that Jaiva-dharma and this Bṛhad-bhāgavatāmṛta are stories, otherwise you cannot learn anything. Always [think] that these are even more than the essence of the Śrīmad-Bhāgavatam. So this is mahā-ākhyāna, mahā-upākhyāna.
[ऐसा मत सोचो कि जैवधर्म और बृहद्भागवतामृत कहानियाँ हैं अन्यथा तुम कुछ भी नहीं सीख सकोगे। सदैव [सोचो] कि यह श्रीमद्भागवतम् के सार से भी अधिक है। इसलिये यह महा-आख्यान (महा-उपाख्यान) है।]
[48:37 से 48:57 तक किसी भक्त के द्वारा श्रील गुरुदेव की हरिकथा का अंग्रेजी भाषा में अनुवाद...]
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समाप्ति-नोट्स (Endnotes)
#1
तासामाविरभूच्छौरिः स्मयमानमुखाम्बुजः।
पीताम्बरधरः स्रग्वी साक्षान्मन्मथ मन्मथः॥
-श्रीमद्भागवतम् (10.32.2)
उसी समय उन रोदनकारी ब्रजदेवियों के बीच में शूरवंश के शिरोमणि श्रीकृष्ण प्रकट हो गये। उनका मुखकमल मन्द-मन्द मुस्कान से खिला हुआ था, वे गले में वनमाला और शरीरपर पीताम्बर धारण किये हुए थे। उनका वह रूप-सौन्दर्य सबके मन को मथ डालनेवाले साक्षात् कामदेव के मन को भी मथनेवाला था। (GVP)
#2
परोक्षवादो वेदोऽयं बालानामनुशासनं।
कर्ममोक्षाय कर्माणि विधत्ते ह्यगदं यथा॥
-श्रीमद्भागवतम् (11.3.44)
वेद का स्वभाव परोक्षवादात्मक है अर्थात् एक प्रकार की स्थितवस्तु के यथार्थ तत्त्व को गोपन रखने के लिए उसका अन्य प्रकार से वर्णन करना है। पिता जिस प्रकार लड्डू आदि मिठाइयों का प्रलोभन दिखलाकर अपनी सन्तान को आरोग्य-फलप्रद औषधि का सेवन कराता है, उसी प्रकार वेद भी अनभिज्ञ मनुष्यों की प्रवृत्ति के लिए स्वर्गादि सुखों के प्रलोभन-छल से कर्म से निवृत्ति के लिए ही विहित कर्मों का प्रतिपादन करता है। (GVP)
#3
वेदाब्रह्मात्म विषयाः त्रिकाण्डविषया इमे।
परोक्षवादा ऋषयः परोक्षं मम च प्रियम्॥
-श्रीमद्भागवतम् (11.21.35)
वेद त्रिकाण्डविषयक हैं– कर्मकाण्ड, देवताकाण्ड एवं ब्रह्मकाण्ड अर्थात् कर्म, उपासना एवं ज्ञानविषयक। तीनों ही काण्डों में आत्मा के ब्रह्मत्व का ही प्रतिपादन है– संसारित्व का प्रतिपादन वेद का उद्देश्य नहीं है। मन्त्र या मन्त्रदर्शी ऋषि परोक्षरूप में वेद की व्याख्या करते हैं, साक्षात् रूप से नहीं। हे उद्धव! मुझे भी परोक्षवाद अत्यन्त प्रिय है। जिनका अन्तःकरण शुद्ध है, उनका वैदिक-गु्ह्य-वस्तुतत्त्व को जानने का अधिकार है, क्योंकि वे परोक्षवाद को भलीभाँति समझ सकते हैं। अशुद्ध चित्तवाले अनधिकारी मनुष्यों में वेद के आप्त-वचनों को जानने का सामर्थ्य नहीं है। वे ज्ञान-प्राप्ति के प्रयास में चित्त-शोधक कर्म को भी व्यर्थ ही त्यागकर पतित हो सकते हैं। (GVP)
#4
पादौ यदीयौ प्रथमद्वितीयौ तृतीयतुर्यौ कथितौ यदूरू
नाभिस्तथा पञ्चम एव षष्ठौ भुजान्तरं दोर्युगलं तथान्यौ।
कण्ठस्तु राजन्नवमो यदीयो मुखारविन्दं दशमः प्रफुल्लम्
एकादशो यस्य ललाटपट्टं शिरोऽपि तु द्वादश एव भाति॥
तमादिदेवं करुणानिधानं तमालवर्णं सुहितावतारम्।
अपारसंसार-समुद्र-सेतुं भजामहे भागवत-स्वरूपम्॥
-(पद्म-पुराण)
अपार संसार-सागर पार होने के लिए सेतु-स्वरूप आदिदेव, करुणानिधान, तमालवर्ण श्रीकृष्ण के मङ्गलमय शाब्दिक अवतार श्रीमद्भागवत का मैं भजन करता हूँ। इस ग्रन्थावतार के द्वादश स्कन्ध भगवान् के द्वादश अङ्ग-स्वरूप हैं। प्रथम और द्वितीय स्कन्ध इनके युगलपाद हैं, तृतीय और चतुर्थ स्कन्ध इनकी जंघाएँ हैं, पञ्चम इनका नाभिदेश है, षष्ठ स्कन्ध इनका भुजान्तर अर्थात् वक्षःस्थल है। सप्तम और अष्टम– ये दोनों इनके युगलबाहु हैं, दशम स्कन्ध इनका प्रफुल्ल मुख पद्मस्वरूप है, एकादश स्कन्ध इनका ललाटदेश एवं द्वादश स्कन्ध इनका मस्तक है। (GVP)
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