Sri Brhad-bhagavatamrtam 1.6.27-41: Conversation between Mother Rohini and Uddhava
01:02:52This audio is included in the following series of lectures:
Topics
- Explanation of Sri Brhad-bhagavatamrtam 1.6.27-41
- Uddhava told Narada Muni that gopis are the topmost.
- Uddhava did not glorify the gopis much due to the fear of awakening the feelings of mutual competition among the Dvaraka queens present there.
- However, Rohini-devi could not control her impulse to glorify Vraja and the vrajavasis.
- Discussion between Mother Rohini and Uddhava about the gopis' misfortune.
- Separation of the gopis from Krsna after He left for Mathura
- After Sri Krsna came back to Mathura from the home of Sri Sandipani Muni, Mother Rohini briefly narrated the pitiful condition of Sri Vrndavana to Him. After hearing her words, Krsna's heart did not melt. The evidence of this is that He sent Uddhava to Gokula rather than going Himself to console the vraja-vasis.
- Mother Rohini says that Krsna never gave anything to gopis; He is happy in Dvarka with His queens and sons.
- Vrajavasis were very happy before Krsna’s birth but after Krsna’s birth, they always faced troubles because of Him.
Transcript
श्रीबृहद्भागवतामृतम्: रोहिणी मैया और उद्धव का वार्तालाप
[श्रील भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराज ने 16 अगस्त, 2003 को श्रीकेशवजी गौड़ीय मठ, मथुरा में यह हरिकथा कही थी।
नोट: इस प्रतिलेखन में निम्नलिखित सम्पादकीय योगदान हैं: कुछ स्थानों पर भाषा को थोड़ा सम्पादित किया गया है, समाप्ति-नोट्स (endnotes) जोड़े गये हैं और विषय-वस्तु के प्रवाह और बोधगम्यता को सुविधाजनक बनाने के लिए वर्गाकार कोष्ठकों (square brackets) में अतिरिक्त पाठ सम्मिलित किया गया है। इसका शाब्दिक प्रतिलेखन शीघ्र ही उपलब्ध होगा।
यदि आप प्रतिलेखन सेवा में भाग लेने के लिए प्रेरित हैं, तो कृपया https://www.audioseva.com/register पर पञ्जीकरण करें।]
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: देखो, ‘भगवान् की कथाएँ, भगवान् का नाम, भगवान् के परिकर और उनकी जो कथाएँ होती हैं’– वे भगवान् से अभिन्न हैं। बल्कि भगवद्-कथाओं का माहात्म्य कुछ और भी विशेष रूप में है। यदि इन कथाओं के श्रवण में रुचि हो गयी तो भवसागर पार समझ लो और नहीं तो समस्त परिश्रम बेकार है।
[Lord’s] Name, His sweet pastimes and the sweet pastimes of all the parikara (associate) of Krsna are same, identical but in some cases the power of harikatha is more superior than Krsna himself. Gopi can tolerate the separation of Krsna but they cannot give up his harikatha.
भले ही कृष्ण गोपियों को छोड़कर चले जायें, गोपियाँ उनका विरह-दुःख सह लेंगी किन्तु उनकी कथाओं को नहीं छोड़ सकतीं। कथाओं में कुछ रस है। भले ही विरह हो, किन्तु विरह में मिलन की स्मृति आती है। इसलिये विरह दुःख नहीं बल्कि आनन्दमय है। जो इस वस्तु को नहीं समझते हैं, उनके लिए यह दुःख रूप हो सकता है, किन्तु [वास्तव में विरह आनन्दमय है।] वह भागवत का क्या श्लोक है?
भक्त: दुस्त्यजस्तत्कथार्थः
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज:
मृगयुरिव कपीन्द्रं विव्यधे लुब्धधर्मा
स्त्रियमकृत विरूपां स्त्रीजितः कामयानाम्।
बलिमपि बलिमत्त्वावेष्टयद्ध्वाङ्क्षवद्य-
स्तदलमसितसख्यैर्दुस्त्यजस्तत्कथार्थः॥
-श्रीमद्भागवतम् (10.47.17)
[हे मधुप! नृशंस स्वभाव श्रीकृष्ण ने रामावतार में वानरराज बालि का वृक्ष की ओट में छिपकर व्याध के समान वध कर दिया था तथा एक स्त्री के वशीभूत होकर उन्होंने काम-पीड़ावश आयी दूसरी स्त्री शूर्पणखा के नाक-कान काटकर कुरूप कर दिया था। ऐसे ही एक और काले थे– वामन देव। राजा बलि ने उन्हें विविध पूजोपहार प्रदानकर उन्हें उनकी इच्छित वस्तु भी प्रदान की। उन्होंने उसे ग्रहण कर लिया और बाद में राजा बलि को वरुणपाश में उसी प्रकार बाँधकर पाताल में डाल दिया, जिस प्रकार कौआ बलि देनेवाले को ही अपने साथियों के साथ घेर लेता है। ऐसे धूर्त काले के साथ सख्यता से भला हमारा क्या प्रयोजन है? जो बाहर से काला है, क्या वह अन्दर से शुभ्र हो सकता है? जो त्रिभङ्ग है, क्या उसका अन्तःकरण कभी सरल हो सकता है? कृष्ण ही क्यों, किसी भी काली वस्तु से हमारा कोई सम्बन्ध नहीं है। सभी काले ऐसे ही निष्ठुर, निर्मोही, निर्दयी, छली, कपटी, धूर्त एवं कामुक होते हैं, परन्तु सुन! कृष्ण-चर्चा का त्याग करना हमारे लिए अति दुष्कर है।] GVP
ये गोपियाँ कह रही हैं।
मानो वह भँवरा कह रहा है– “यदि कृष्ण इतने निष्ठुर हैं कि तुम्हें छोड़ करके चले गये, तो आप बार-बार [उनकी ही कथा क्यों] कहती हैं? तो आप भी उनको छोड़ दीजिये। कृष्ण इतने निष्ठुर हैं, तो आपको [भी] उनकी कोई आवश्यकता नहीं रह गयी। आप लोग उनके सम्बन्ध में सोचना-तोचना सब कुछ भूल जाइये।”
[गोपियों ने] कहा– “यही तो गड़बड़ है। हम कृष्ण को त्याग कर सकती हैं। उनका विरह-दुःख हम सह सकती हैं किन्तु उनकी कथाओं को हम किसी भी परिस्थिति में, किसी भी दशा में त्याग नहीं सकतीं। क्योंकि कथाओं में कुछ ऐसा गूढ़ रस छिपा है कि कृष्ण से मिलन की सारी स्मृतियों को एकदम ताजा कर देता है।”
इसलिये उद्धवजी कहते हैं– “मैं ब्रज में गया। [मैंने] ब्रज को देखा, ब्रजवासियों की विरह-आर्ति को देखा तो मैं विचलित हो गया और वहाँ से लौट करके कृष्ण को [ब्रज में] ले जाना चाहा किन्तु कृष्ण फिर भी नहीं गये।”
उद्धवजी कह रहे हैं– “उनका जो दुःख (विरह) है, उसमें भी सुख है। और इसलिये उनका सौभाग्य देख करके मैंने उनकी वन्दना की।” क्या?
आसामहो चरणरेणु जुषामहं स्यां
वृन्दावने किमपि गुल्मलतौषधीनाम्।
या दुस्त्यजं स्वजनमार्यपथञ्च हित्वा
भेजुर्मुकुन्दपदवीं श्रुतिभिर्विमृग्याम्॥
-श्रीमद्भागवतम् (10:47.61)
[मैं तो ऐसी प्रार्थना करता हूँ कि मैं इस श्रीवृन्दावन में कोई गुल्म-लता या औषधि-जड़ी-बूटी रूप में जन्म ग्रहण करूँ, जिससे मुझे उन ब्रजाङ्गनाओं की चरणधूलि निरन्तर सेवन करने को मिलती रहे। उन ब्रजगोपियों ने दुस्त्यज (जिसे छोड़ना अत्यन्त कठिन है) स्वजन-सम्बन्धियों तथा वेद की आर्य-मर्यादा को परित्यागकर श्रीगोविन्द के उन चरणकमलों का भजन किया है, जिन्हें श्रुतियाँ अभी तक भी खोज रही हैं।] GVP
कल मैंने 5-7 श्लोक की पूरी व्याख्या की।
[उद्धवजी कह रहे हैं–] “गोपियों की चरणधूलि से अभिषिक्त होने के लिए मैं लता-गुल्म इत्यादि होना पसन्द करता हूँ। इसलिये उनके चरण की एक धूलिकणा की मैं वन्दना करता हूँ।”
अच्छा ये कथाएँ जो हैं… कृष्ण तो चले गये। वे अपनी कथाओं को ले करके गये, ना छोड़ गये? छोड़ गये। किसलिये छोड़ गये? हम लोगों के लिए छोड़ गये कि ये यदि उनके कानों में पड़ जायेंगी तो गोपियों के आनुगत्यवाली वह प्रेममय भक्ति इन लोगों को सहज रूप में प्राप्त हो जायेगी और ऐसी दयायुक्त कृष्ण की जो शक्तिशाली (powerful) कथाएँ हैं, उनको श्रवण करने में जिसकी रुचि नहीं है, वह कैसा दुर्भागा हो सकता है? उसके समान जगत् में और कोई भी दुर्भागा नहीं है।
मान लो वह हरिनाम भी कर रहा हो, सेवा भी कर रहा हो और दूसरे प्रकार से भगवान् की सेवा भी कर रहा है, वह करोड़ों रुपये ढाल देता है, तब भी उसको वह वस्तु प्राप्त नहीं होगी। इन सबका तात्पर्य क्या है? इसके द्वारा उस हरिकथा को सुनने में रुचि हो जाये, बस जीवन सार्थक हो जायेगा। हम किसलिये वैष्णवों का सङ्ग चाहते हैं? ऐसे भक्तों के साथ में रहने से ये हरिकथा मिलेगी।
हमारे भरत [महाराजजी अगले जन्म में] हिरण हो करके जन्मे। रहे कहाँ?
भक्त: सन्तों के स्थान पर
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: क्या करते थे? उनका जूठा-फूटा जो कुछ मिल जाता [उसे ग्रहण कर लेते] और गङ्गाजी में जा करके पानी पी लेते और फिर वहीं पर बैठकर [साधुओं के मुख से] हरिकथा [श्रवण करते।] और उसके द्वारा उनकी गति क्या हुई? उनको भक्ति-तत्त्व का सब कुछ ज्ञान हो गया और वे [अगले जन्म में जड़भरत के रूप में] जगत् की उपेक्षा (neglect) कर भगवान् की कथाओं में रमण करते। उनकी लीला-कथाओं का चिन्तन करते। दूसरे लोग समझते हैं कि ये पागल है। किन्तु जो [स्वयं प्रेम में] पागल हैं वही यथार्थ में समझेंगे कि ये [प्रेम में] पागल हैं।
तो इसलिये उद्धवजी ने कहा अथवा वे कहते हैं कि उन ब्रजवासियों की जो कथाएँ हैं, उनका माहात्म्य श्रवण करने से, उन कथाओं को श्रवण करने से [सत्यभामा आदि महिषियों को दुःख हो सकता है।] यहाँ सत्यभामाजी हैं, रुक्मिणीजी हैं, 16108 स्त्रियाँ हैं, विशेष करके सत्यभामा हैं, ब्रज की गोपियों की महिमा बोलने से क्या होगा? [महिषियों को] सौतिया-डाह हो जायेगा और बड़ी दुःखी हो जायेंगी, मान करके घर में बैठ जायेंगी– “हमारे सामने हमारी सौत की इतनी प्रशंसा!”
कृष्ण ने सत्यभामा के सामने रुक्मिणी को एक पारिजात पुष्प दिया। सत्यभामा उसको सह ना सकीं। पैरों को पीटती हुई कोपभवन में चली गयीं, [राज]वस्त्रों को हटा दिया और मलिन वस्त्र धारण करके रो रही हैं।
इसलिये उद्धवजी कहते हैं– “मैं ये सब जानता हूँ। इसलिये मैं इनके सामने [गोपियों की महिमा] नहीं कहना चाहता। इसलिये आप चुप रहें।”
विशेष करके उनको नारदजी के प्रति सौतिया-डाह हुआ। क्यों हुआ? हम जो चाहते हैं, इन सबको अच्छी तरह से ये जानते हैं। ये भगवान् के सबसे बड़े कृपापात्रों में से एक हैं।
[किसी भक्त के द्वारा श्रील गुरुदेव की हरिकथा का अंग्रेजी भाषा में अनुवाद करने के उपरान्त…9:06-14:36 तक]
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: सभी लोग समझने की चेष्टा करो।
अथवा और ये कह रहे हैं– “चुप रहिये और अधिक हमसे मत कहलवाइये।” उद्धवजी नारदजी से कह रहे हैं– “और आप सुनने की चेष्टा मत करें, जानने की चेष्टा [न] करें। क्यों? यदि मैं गोपियों का माहात्म्य वर्णन करूँ या कोई भी करे तो उससे भगवान् की जो प्रेमरूपी परमपीड़ा है, [उसके उत्पन्न होने की आशंका है।] वह कोटि-कोटि दावानलों से भी अधिक पीड़ादायक है। पीड़ा नव…
भक्त: नवकालकूट
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: “भाई! उससे भी अधिक इसमें पीड़ा है। गोपियाँ क्षण-क्षण में मूर्च्छित हो रही हैं। क्षण-क्षण में जागती हैं और क्षण-क्षण में मूर्च्छित होती हैं। इतना असह्य दुःख है। फिर उन दुःखों को सहना पड़ेगा।”
किन्तु यहाँ पर समझो कि यह व्याज-स्तुति [#1] है। व्याज-स्तुति, इसलिये मना कर रहे हैं। [जैसे] वृन्दावन में मत जाना। वृन्दावन में किसी प्रकार से गये तो केशीघाट पर मत जाना। केशीघाट पर यदि किसी प्रकार से पहुँच गये तो गोविन्द का दर्शन नहीं करना, नहीं तो तुम्हारे स्त्री-पुत्र-परिवार का जो सुख है, वह सब समाप्त [हो जायेगा।] ऐसे ही यहाँ पर ये कह रहे हैं– “इसलिये सुनने का आग्रह आप छोड़ दो, मत [करो।] इसलिये मैं इससे अधिक कुछ नहीं कहूँगा।”
यदि कहो [अथवा] यदि आप ऐसा कहते हैं कि गोपियों की ये सब बातें, जो महिमा हैं, उनका यदि कोई विवरण [करता है, उनको] यदि कोई परस्पर बोलता और सुनता है, तो उससे क्या होगा? ‘एक से दूसरा कौन भगवान् का श्रेष्ठ कृपापात्र है?’– इसका ज्ञान होगा। इन कथाओं को श्रवण करने से भगवान् के सबसे अधिक कौन कृपापात्र हैं? [–इसका ज्ञान होगा। इस श्रीबृहद्भागवतामृतम् ग्रन्थ में उसका] एक तुलनामूलक दृष्टिकोण दिया है। उससे हम ये बतला सकते हैं कि हनुमान की अपेक्षा पाण्डव लोग किसलिये श्रेष्ठ हैं? पाण्डवों से भी ये यादव लोग किसलिये श्रेष्ठ हैं? उन यादवों में भी उद्धवजी श्रेष्ठ हैं। कैसे श्रेष्ठ हैं? उनसे भी गोपियाँ श्रेष्ठ हैं। उन गोपियों में भी चन्द्रावली इत्यादि श्रेष्ठ हैं। उन चन्द्रावली इत्यादि सखियों में भी श्रीमती राधिका श्रेष्ठ हैं। यह तारतम्य कैसे ज्ञात होगा? सुनने से ही ज्ञात होगा।
नारदजी यदि कह रहे हैं– “इसीके लिए मैं आया हूँ। इसीकी अनुभूति करके मैं मुनियों की सभा में घोषणा करनेवाला हूँ कि कौन उनका (भगवान् का) सबसे श्रेष्ठ कृपापात्र है? इसलिये आप इसको थोड़ा-सा विस्तारपूर्वक वर्णन करें।”
उसी के लिए [उद्धवजी] कह रहे हैं– “हे मुनिवर! मुनियों में श्रेष्ठ नारद!”
कल बतलाया था ना? व्यास इत्यादि से भी [ये श्रेष्ठ हैं।] शुकदेव गोस्वामी के गुरु के भी गुरु हैं– ये नारद।
[उद्धवजी कह रहे हैं–] “हे मुनिवर! आपके चरणों में मैं बार-बार प्रणाम करके ये कहता हूँ और विनय करता हूँ कि आप इस वृत्तान्त को सुनने की चेष्टा के आग्रह को दूर रखें, मत सुनिये। नहीं तो आपको भी वैसा ही दुःख होगा और यहाँ पर ये सब रानियाँ मान करके रूठ जायेंगी अथवा ब्रजवासियों की कथा सुनने से रस-लाम्पट्य उदित होगा, इसलिये आप उससे विराम लाभ कीजिये अर्थात् सुनने का आग्रह [छोड़ दीजिये।”]
रस-लाम्पट्य क्या? कृष्ण का गोपियों के साथ में जो रस-लाम्पट्य है, गोपियाँ उनको चोर, लम्पट, धूर्त इत्यादि कहती हैं।
[उद्धवजी कह रहे हैं–] “वही प्रसङ्ग आपमें भी उपस्थित हो जायेगा अथवा अनर्थ बढ़ने की सम्भावना है। हो सकता है कि मृत्यु तक हो जाये।”
भक्तिरस में मृत्यु माने क्या? – मूर्च्छा।
[उद्धवजी कह रहे हैं–] “इसलिये मृत्यु भी हो सकती है और अनर्थ बढ़ जायेगा। आपकी वही दशा होगी, मेरी भी [वही] दशा होगी।”
परीक्षिदुवाच—
तद्वाक्यतत्त्वं विज्ञाय रोहिणी सास्रमब्रवीत्।
चिरगोकुलवासेन तत्रत्यजनसम्मता॥
-श्रीबृहद्भागवतामृतम् (1.6.28)
[महाराज श्रीपरीक्षितने कहा– “श्रीउद्धव के वचनों के अभिप्राय को जानकर श्रीरोहिणीजी, जो बहुत समय तक गोकुल में रहने के कारण वहाँ के निवासियों को अत्यन्त प्रिय थीं, प्रेमाश्रु बहाती हुई इस प्रकार कहने लगीं।”] GVP
उद्धवजी की बातों को रोहिणी मैया सह ना सकीं– “उद्धव तुम कैसे हो! यदि जगत् में कोई दुर्भागा है, तो ये गोपियाँ और ब्रज के लोग हैं। और तुम उनको भगवान् का कृपापात्र मान रहे हो। बड़े दुःख की बात है। तुमको तो मैं समझती थी कि बहुत समझदार व्यक्ति हो, किन्तु तुम ठीक उल्टा (विपरीत) कह रहे हो कि संसार में भगवान् की सबसे श्रेष्ठ कृपापात्र ये गोपियाँ हैं किन्तु मैं देखती हूँ क्या? संसार में यदि कोई सबसे दुर्भागा है, तो ये गोपियाँ हैं जो [कृष्ण] के विरह में तड़प-तड़प करके प्राण छोड़ रही हैं।”
रोहिणी मैया कह रही हैं– “मैंने गोकुल में बहुत दिनों तक वास किया। अरे! औरों की तो बात क्या? कृष्ण और बलदेव के जन्म के पहले से मैं ब्रज में हूँ। मेरे पति [अर्थात्] आर्यपुत्र ने कंस के भय के कारण मुझे उनके [कृष्ण, बलराम के] जन्म के पहले ही वहाँ गोकुल में भेज दिया था। इसलिये मैं गोकुल में यशोदा इत्यादि के साथ ही थी और गोपियों की दशा से भलीभाँति परिचित हूँ या (inaudible 21:17)। मैं बहुत अच्छी तरह से जानती हूँ।”
कुछ आँसू भरे हुए नेत्रों से यह कह करके [रोहिणी मैया ने] बीच में ही उद्धव को रोक दिया– “ये क्या तुम उनसे उल्टी-फुल्टी बातें कर रहे हो?”
रोहिण्युवाच—
रोहिणी मैया क्या कहने लगीं, क्या बोलीं?
आस्तान् श्रीहरिदास त्वं महादुर्द्दैवमारितान्।
सौभाग्यगन्धरहितान्निमग्नान् दैन्यसागरे॥
तत्तद्बाड़ववह्नयर्चिस्ताप्यमानान् विषाकुलान्।
क्षणाचिन्तासुखिन्या मे मा स्मृते: पदवीं नय॥
-श्रीबृहद्भागवतामृतम् (1.6.29-30)
[श्रीरोहिणीदेवी ने कहा– “हे श्रीहरिदास उद्धव! तुम शान्त हो जाओ। मैं जिन लोगों की चिन्ता को छोड़कर कुछ सुखी हुई हूँ, उन महादुर्दैव के मारे हुए, सौभाग्य की गन्ध से रहित, दैन्य-सागर में निमग्न, भीषण शोकरूपी बड़वानल ज्वाला से सन्तप्त तथा विरह के विष से जर्जरित ब्रजवासियों की याद मुझे मत दिलाओ।] GVP
“ओह! वे ब्रजवासी और ब्रजवासियों में भी जो गोपियाँ हैं, [महादुर्दैव की मारी हुई हैं।] तुम तो हरिदास हो, हरिदास होने से तुमको तो सबकुछ जानना चाहिये, किन्तु तुम तो कुछ भी नहीं जानते? ये [गोपियाँ] दुर्दैव की मारी हुईं, दैन्यसागर में डूबती हुईं, विरह-शोक में निमग्न और सौभाग्य की गन्ध से रहित हैं [अर्थात्] जिनका तनिक भी सौभाग्य नहीं है। ऐसी जो दुर्भागिनी गोपियाँ और ब्रज के दुर्भागे लोग हैं, उनको तुम बतला रहे हो कि ये भगवान् के सबसे बड़े कृपापात्र हैं।
उसीको कह रहे हैं– “हे हरिदास उद्धव! तुम अब चुप रहो। अधिक बोलने की आवश्यकता नहीं है।” [रोहिणी मैया ने ऐसा इसलिये कहा] क्योंकि ये उद्धव ही तो गोपियों की महिमा बतला रहे थे कि ये सबसे बड़ी कृपापात्र हैं। इन्होंने तो मना कर दिया [कि गोपियाँ सबसे बड़ी कृपापात्र हैं, अपितु ये कह रही हैं कि गोपियाँ महादुर्दैव की मारी हुई हैं जो कृष्ण उन्हें विरह सागर में निमज्जित करके मथुरा/द्वारका चले गये।]
[रोहिणी मैया ने कहा–] “मैंने इस समय उन ब्रजवासियों की चिन्ता को सम्पूर्ण रूप से छोड़ दिया है। किसलिये छोड़ दिया है? उनकी चिन्ता करने से हमें दुःख होगा। दुःखी व्यक्ति की चिन्ता करने से, सहानुभूति करने से अपने को भी दुःख की अनुभूति होती है। इसलिये इस समय में कुछ सुखी हूँ। क्यों? उनकी सारी चिन्ताओं को, दुःखों को सब मैं एकदम छोड़ चुकी हूँ। छोड़ने की, भूलाने की चेष्टा करती हूँ। अब मैं कुछ सुखी हूँ क्योंकि उन लोगों की चिन्ता नहीं करती। वे महादुर्दैव-हत [अर्थात् महादुर्दैव की मारी हुई,] दुर्भागिनी, सौभाग्य की गन्ध से रहित, दैन्य-सागर में निमज्जित, बड़वाग्नि शिखा से भी कोटि-कोटि गुणा अधिक सन्तप्त(दुःखी) [भीषण विरह ज्वाला में] जल रही और विरह विष से जर्जरित ब्रजवासियों की स्मृति मेरे हृदय में मत लाओ। उनके सम्बन्ध में मुख से कुछ मत कहो।”
टीका में [श्रील सनातन गोस्वामी] कहते हैं कि वह कह रही हैं– “आह! अर्थात् हाय! हाय! उनकी चिन्ता मेरे अन्दर में मत लाओ।”
[किसी भक्त के द्वारा श्रील गुरुदेव की हरिकथा का अंग्रेजी भाषा में अनुवाद करने के उपरान्त… 24:20-28:07 तक]
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज:
अहं श्रीवसुदेवेन समानीता ततो यदा।
यशोदाया महार्त्तायास्तदानीन्तनरोदनैः॥
-श्रीबृहद्भागवतामृतम् (1.6.31)
[जिस समय श्रीवसुदेव मुझे ब्रज से यहाँ ला रहे थे, उस समय श्रीयशोदा के महान रोदन को सुनकर कठिन पाषाण भी रोने लगे।] GVP
“उद्धव! जब हमारे आर्यपुत्र अर्थात् मेरे पति वसुदेवजी गोकुल से मुझे ले आये...”
कब ले आये?
श्रीपाद माधव महाराज: कृष्ण के मथुरा आने के बाद
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: जब कृष्ण ने कंस को मारा और मारने के बाद नन्द [ब्रज में] लौट गये तो उस समय कृष्ण का उपनयन कराने के पहले [वसुदेवजी ने रोहिणीजी को मथुरा] में बुलाया।
[रोहिणी मैया ने कहा–] “जिस समय मैं आयी, उस समय यशोदाजी के रोदन को सुन करके पत्थर तक पिघल गये। पत्थर तक पिघल गया! पत्थर से भी अधिक [कठोर] वज्र है, वह भी पिघल गया, विदीर्ण हो गया और गोप-गोपियों की तो बात क्या? वे लोग भी मुझे देख करके [रोने लगे] कि ये गोकुल से जा रही हैं। यशोदा मैया की तो बात ही क्या? और गोपियों की तो बात ही क्या? सब तड़फड़ा करके रोने लगीं और उनमें से कोई जीवित हैं या सब मर गयीं?– मैं नहीं जानती। किन्तु केवल एक व्यक्ति का हृदय नहीं पिघला।”
वह कौन है? वे बोलीं नहीं, किन्तु हाथ से दिखलाकर कहा– “हे उद्धव! वे हैं– यही तुम्हारे प्रभुजी हैं। इनका हृदय नहीं पिघला और बाकी सब पत्थर से पत्थर व्यक्ति का हृदय भी विदीर्ण हो गया, पिघल गया।”
उसीको टीकाकार बतला रहे हैं कि रोहिणी तो कहती हैं कि अब [वे सब बातें] स्मृति-पथ में मत लाओ। तो फिर ये वही सब बातें क्यों बोलने जा रहे हैं? वह तो उद्धवजी को कह रही हैं– “अब मत सुनाओ! अब हम नहीं [सुनना] चाहतीं। अब तुम इससे विरक्त हो। उनकी चिन्ता करने से ऐसा ही दुःख होता है।” और फिर उसी कथा को ये रोहिणी देवी सुनायेंगी, कहने लगेंगी। क्यों? इसमें जो आनन्द है, उन लीलाओं की स्मृति से [जो आनन्द है,] वह कोई नहीं छोड़ [सकता।]
हमारे गुरुजी एक उदाहरण देते थे, दृष्टान्त दिया करते थे। विरह एक ऐसी वस्तु है, जो कि छोड़ी नहीं जाती। जैसे किसी जगह में राम की लीला हो रही है। और उसमें रामचन्द्रजी सीताजी को त्याग देते हैं और त्यागने के बाद में उस समय सीताजी रोती हुईं वाल्मीकि आश्रम में प्रवेश करती हैं। सीताजी मूर्च्छित हो जाती हैं। वाल्मीकिजी जल का छींटा दे करके उनको उठा करके ले जाते हैं।
[वाल्मिकिजी ने कहा–] “ओह! रामजी ने तुमको छोड़ दिया है।” उनसे बोले नहीं कि ये तो मैं जानता था। इसलिये मैं आ गया।
[वाल्मिकिजी ने सीताजी से कहा–] “बेटी! तुम हमारे घर में चलो।” और [सीताजी को] वहाँ पर रखा।
इसके बाद में रामचन्द्रजी ने अश्वमेध-यज्ञ किया। उसमें रामजी ने दोनों बच्चों को देख करके आदेश दिया। लव-कुश रामायण पाठ करते थे। [उनको देखकर रामजी ने सोचा–] “ये लड़के हों न हों मेरे हैं।”
और फिर वाल्मीकिजी से बोले– “जानकी को यहाँ लाओ और उनसे कहना कि वे प्रमाण दें। वैसे तो हम जानते हैं कि वे पवित्र हैं किन्तु फिर लोक-समाज वही है। यही लोग निन्दा करते हैं। वे प्रमाण दें कि मैं पतिव्रता हूँ।”
उस समय में सीताजी लव-कुश को अपनी अङ्गुलियों से पकड़ करके आयीं। वाल्मीकिजी आगे चल रहे हैं, पीछे-पीछे दृष्टि नीचे किये हुए आयीं और कहा– “फिर भी मुझसे प्रमाण माँगा जा रहा है कि मैं पवित्र हूँ। अच्छा, तो ठीक है। मैं इसका प्रमाण देती हूँ।”
यह कहकर उन्होंने कहा– “हे पृथ्वी देवी! [यदि] मैं तन-मन-वचन से राम के अतिरिक्त कुछ नहीं जानती, तो आप विदीर्ण हो जायें [और] मैं आपके अन्दर में प्रवेश [कर जाऊँ।] बलपूर्वक किसी के द्वारा मेरा स्पर्श किया गया है किन्तु यदि मैंने बाहर से और मन से किसी को स्पर्श नहीं किया है तो आप फट जायें।” और कहते ही पृथ्वी फट गयीं और उसमें से पृथ्वीदेवी रथ ले करके खड़ी हो गयीं और अपने हाथों से उनको ले करके रथ पर बैठाया और साथ-ही-साथ में पृथ्वीजी जुड़ गयीं और रसातललोक, पृथ्वीलोक चली गयीं।
यह देख करके राम हाहाकार कर उठे। [उन्होंने] धनुष-बाण उठाया और कहा– “पृथ्वी! तुम मेरी सास हो। यदि तुम नहीं आती हो, सीताजी को लौटा करके नहीं देती हो, तो मैं अभी तुमको चूर्ण-विचूर्ण कर दूँगा।”
और सब लोग रोने लगे। सारी सभा रोने लगीं। उस समय वाल्मीकिजी आये [और कहने लगे–] “बस, यह मैंने नहीं लिखा था। अब लिखूँगा।”
वहाँ पर वह नाटक समाप्त हुआ और दूसरे दिन उन लोगों ने विज्ञापन दिया कि इस जगह में नाटक होगा। अब उससे भी अधिक हजारों लोग वहाँ पर पहुँचे। किसलिये? वहाँ पर तो ये विरह-दुःख [देख-] सुन करके रो रहे थे। तो क्या रोने के लिए [लोग वहाँ पर एकत्रित हुए?] तो उस रोने में क्या आनन्द है? भगवान् की कथाओं को सुन करके उसपर रोने में क्या आनन्द है? एक अद्भुत आनन्द है! वह वही जानेगा, जिसको ये आनन्द प्राप्त है, दूसरे नहीं। वह तो नारदजी समझेंगे, उद्धवजी समझेंगे, शुकदेव गोस्वामी समझेंगे, वे गोपियाँ समझेंगी।
[किसी भक्त के द्वारा श्रील गुरुदेव की हरिकथा का अंग्रेजी भाषा में अनुवाद करने के उपरान्त… 34:37-40:00 तक]
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: This is my explanation but Rohini Mother is not telling all these things. This is my explanation.
Though she is telling don't remind me [about Vrajavasis…]
[रोहिणी मैया ने उद्धव को कहा–] “हमको मत बतलाओ। उनकी [ब्रजवासियों की] स्मृति मत दिलाओ। नहीं तो हमें भी दुःख होगा, सुननेवाले को भी दुःख होगा। श्रीमान् उद्धव! तुम्हारे प्रभु…” रोहिणी मैया ये नहीं कह रही हैं कि हमारे बेटे [और] न ही यशोदा मैया [का बेटा] कहा। ‘तुम्हारे प्रभु’ [कह रही हैं], माने कैसे निष्ठुर हैं ये तुम्हारे प्रभु! उसीके लिए कह रही हैं– “बस, एक ही व्यक्ति का चित्त द्रवित नहीं हो रहा है।” उसीके लिए यह श्लोक है। उदाहरण क्या है?
“जिस समय तुम्हारे प्रभु गुरु सान्दीपनी के यहाँ पढ़ने के लिए गये और पढ़ करके 60 दिनों के बाद में वहाँ से लौटे, उस समय मैं कुबुद्धि...” कुबुद्धि अर्थात्? अपने को कह रही हैं कि मैं कुबुद्धि हूँ।
“मैंने समझा था कि ये बड़ा दयालु है। मैं क्या जानती थी कि ये इतना निष्ठुर है! मैंने सोचा कि उन लोगों (ब्रजवासियों) की यथार्थ स्थिति बतलाऊँगी तो उसका चित्त द्रवित हो जायेगा, तो वह फिर [वृन्दा]वन में जायेगा। किन्तु उल्टा देखा। हमने गोपियों की स्थिति बतलायी कि वे जीवित हैं कि नहीं? यशोदा मैया की भी अभी खबर मुझे नहीं मिली कि वह [कैसी हैं?] उस समय जब मैं आ रही थी तो उनको विरहाग्नि में जलते देखा ।”
“[मैंने उससे] कहा कि ‘कृष्ण! तुम वहाँ पर [ब्रज में] एक बार जाओ। तुम्हारे जाये बिना [उनका विरह दूर नहीं होगा।] तुम्हारे दर्शन के [बिना] वे सभी मरेंगी। जो बची हैं– वे भी मरेंगी, गैया मरेंगी, बछड़े मरेंगे, पशु-पक्षी सब मरेंगे’, किन्तु उसका हृदय द्रवित नहीं हुआ। मैं कुबुद्धि किसलिये? मैंने सोचा कि ऐसा होगा– वे जायेंगे, किन्तु देखा कि नहीं तो, वह तो बड़ा निष्ठुर व्यक्ति! उसका हृदय द्रवित नहीं हुआ। तो मैंने उसको संक्षेप में निवेदन किया “गायें अब तृण नहीं खाती हैं। गोपियाँ कहती हैं कि हमारा मन नहीं लगता। इस प्रकार से ब्रज के विरह की कथाएँ [बोल दीं।]”
याद है? जरा बोलो तो। [इनको] माइक (mic) दे दो। मथुरावाली शब्द दोहरायेंगी (repeat)
[कीर्तन के उपरान्त...42:52-47:58 तक]
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: तो ब्रज की स्थिति ऐसी थी। गाय-बछड़े भी धीरे-धीरे समाप्त हो रहे हैं।
“मैंने संक्षेप में इसको सुनाया कि इसको दुःख ना हो। इसलिये इस आशंका से संक्षेप में ही सुनाया कि कहीं ये दुःखी न हो जाये। किन्तु मैं कुबुद्धि क्या जानती थी कि ये सुन करके भी ऐसा निष्ठुर बना रहेगा? मैं नहीं जानती थी, इसलिये मैं कुबुद्धि हूँ । विशेष करके मैंने इसे इसलिये कहा [क्योंकि] यदि बहुत दुःख हो तो दूसरों से कहने से उसका दुःख कुछ बंट जाता है, उसका हृदय कुछ हल्का हो जाता है। इसलिये मैंने भी सोचा कि ये बतलाऊँ और मेरा दुःख भी हल्का हो जायेगा। नहीं तो मेरा दुःख भी बहुत भारी लग रहा था। मैंने इससे कहा, अपने मन की पीड़ा इससे कही, किन्तु कोई फल नहीं हुआ। [यदि] मैं जानती कि कुछ फल नहीं होगा तो मैं कहती नहीं। किन्तु मैंने दुर्बुद्धि के कारण इससे कहा और इसने सुना नहीं। मैं निश्चित रूप में कहती हूँ कि तुम्हारे प्रभु का हृदय इतना कठोर है!
न हि कोमलितं चित्तं तेनाप्यस्य यतो भवान्।
सन्देशचातुरीविद्याप्रगल्भः प्रेषितं परम्॥
-श्रीबृहद्भागवतामृतम् (1.6.34)
[किन्तु मेरी बात को सुनकर निश्चय ही तुम्हारे प्रभु का हृदय नहीं पिघला, क्योंकि स्वयं ब्रज में न जाकर उन्होंने चतुरतापूर्वक सन्देश देने की विद्या में कुशल तुम्हें ब्रज में भेज दिया।] GVP
छल-चातुरी की विद्या में ये तुम्हारे प्रभु बड़े तेज हैं। बहुत चातुरी जानते हैं, बातें बनाना जानते हैं। तो इस विद्या में वे बड़े निपुण हैं। इसलिये इस विद्या में निपुण तुम जो हो, जैसे वे हैं– प्रभु (मालिक), वैसा ही मुनीम। तो तुमको छल-चातुरीयुक्त समझ करके कि तुम छल करने में, चातुरी करने में बड़े तेज हो, [तुमको] गोपियों के पास में भेजा और कहलाया, कुछ सन्देश दिया। क्या? समझो कि मैं आ ही गया। ये कहना कि मैं आनेवाला ही हूँ, अब आ ही गया– ये कहना। [ब्रज में] गये? इसके बाद में बलदेव को भेजा। इसके बाद भी नहीं [गये।] मिले तो कहाँ मिले? कुरुक्षेत्र में। बहुत दिनों के बाद में लगभग 50-60 वर्ष के बाद मिले। और उस मिलन से गोपियाँ क्या प्रसन्न हुईं? उनकी विरह-ज्वाला और बढ़ गयी। तो केवल सन्देश-चातुरी-विद्या में कुशल तुम्हारे प्रभु ने तुमको शान्ति [के लिए] ब्रज में भेजा। उससे क्या और शान्ति हुई कि उनका दुःख बढ़ गया? दुःख बढ़ गया।”
शुकदेव गोस्वामी ने श्रीमद्भागवत में ये बतलाया कि उनकी विरह की ज्वाला और बढ़ गयी। उनको शान्ति नहीं हुई।
अयमेव हि किं तेषु त्वत्प्रभो: परमो महान्।
अनुग्रहप्रसादो यस्तात्पर्येणोच्यते त्वया॥
-श्रीबृहद्भागवतामृतम् (1.6.35)
[तुम जिस अभिप्राय से ब्रजवासियों के प्रति अपने प्रभु की परमकृपा के विषय में वर्णन करने जा रहे हो, क्या उस कृपा का यही लक्षण है?] GVP
“ओह! वह (कृष्ण) भी निष्ठुर है [और] तुम भी निष्ठुर हो, जो तुम [नारदजी से यह] कह रहे हो, कि गोपियाँ अत्यन्त सौभाग्ययुक्त हैं कि वे कृष्ण की सबसे अधिक कृपा की पात्र हैं। यह तुम कैसे कह रहे हो? क्या अनुग्रह का यही लक्षण है– किसी को दुःख देना? यही [अनुग्रह] का लक्षण है?” [रोहिणी मैया] यही बात उद्धवजी से भी पूछने लगीं।
हाँ, बोलो।
[किसी भक्त के द्वारा श्रील गुरुदेव की हरिकथा का अंग्रेजी भाषा में अनुवाद करने के उपरान्त… 52:01-54:40 तक ]
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: उद्धव! ‘मम प्रत्यक्षमेवेदं’– मैंने ब्रज में जा करके [प्रत्यक्ष रूप में वहाँ की स्थिति देखी है।] कृष्ण और बलदेव के जन्म के पहले से ही में ब्रज में [चली गयी थी] और उनके ब्रज से आने के बाद भी मैं [कुछ समय] तक ब्रज में थी।
तो मैंने देखा कि ये जो ब्रजवासी लोग हैं, गोप-गोपियाँ हैं, [इन्होंने] कृष्ण के लिए कितने दुःख सहे हैं? कितना दुःख! जिसका कोई आर-पार नहीं। किन्तु कृष्ण ने तनिक भी उसकी परवाह नहीं की। उसके बदले में क्या दिया? क्या-क्या उपकार किया? इसके जन्म के पहले ब्रज में कोई भी दुःख नहीं था। जितना [भी] दुःख ब्रज में हुआ, इसके जन्म के बाद से ही हुआ। पूतना ब्रज में किसलिये आयी?
भक्त: कृष्ण को मारने के लिए
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: उनके लड़कों को किसलिये मार रही थी? आपके इस प्रभु के लिए। तृणावर्त, शकटासुर, कालिय[नाग], अघासुर, बकासुर इत्यादि जितने थे– ये ब्रज में उत्पात करने लगे। किसके लिए? क्या ब्रजगोपियों का कोई दोष था? न कि इस प्रभु के लिए? कंस [ने इतने असुरों को] किसके लिए भेजा? [कंस सोचता था–] “ज्ञात होता है कि ये कृष्ण नन्द का बेटा नहीं है, [अपितु] वही है [अर्थात् मेरी मृत्यु है।”] कंस को ये [लगता] था न कि? और सारे ब्रजवासी लोग क्या समझते थे? कृष्ण यशोदा और नन्द के [पुत्र हैं।] इसलिये कंस ने कृष्ण को मारने के लिए ब्रजवासियों को मारना भी उचित समझा। उनको कष्ट देता था। इसलिये ब्रजवासियों पर जितने भी कष्ट आये, [कृष्ण के कारण आये।]
जब इन्द्र ने वज्र बरसाया और [मूसलाधार] पानी बरसाया, तो उससे दुःख किसको हुआ? तुम्हारे प्रभु को हुआ कुछ? वे तो सुखपूर्वक वंशी बजा रहे थे। दुःख किसको हुआ?
भक्त: ब्रजवासियों को
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: [ब्रजवासी लोग] पानी में डूब रहे थे। वर्षा में काँप रहे थे। उनके गाय-बछड़े मर रहे थे। किनके लिए? तुम्हारे प्रभु के लिए। वह शकटासुर किसके लिए आया? उन्हीं के लिए। तृणावर्त ब्रज में किसलिये आया? [तृणावर्त के आने पर] चारों ओर आँधी आयी और सब लोग मरने लगे, हाहाकार करने लगे। केशी दैत्य किसलिये आया? [किसलिये] उत्पात किया? इस प्रकार से [असुरों ने ब्रज में उत्पात किये।] यही नहीं देवता लोगों ने भी [व्रज में उत्पात किये।]
ये तुम्हारे प्रभु के लिए नन्दबाबा को अजगर सर्प ने निगल लिया। तुम्हारे [प्रभु के] लिए वे पुण्य बटोरने के लिए स्नान करने के लिए गये थे कि [कृष्ण] ठीक रहेगा और हुआ क्या? नन्दबाबा को वरुणदेव ले गया, किसलिये? वे तुम्हारे [प्रभु के] लिए ही तो एकादशी व्रत कर रहे थे कि हमारा बेटा ठीक रहे। कृष्ण ने अपनी माया से उनपर जादू कर दिया था। उनका ज्ञान, बुद्धि, विवेक सब अपहरण कर लिया था। इसलिये वे सबकुछ छोड़ करके कृष्ण में इतने मुग्ध थे, मोहित थे कि अपना कोई सुख नहीं जानते थे। बस इसके [सुख के] लिए दिन-रात चेष्टा [करते थे।]
नन्द [ब्रजवासियों के साथ] बैठक करते थे। क्या बैठक? ये [ब्रज में] इतने असुर आ रहे हैं, कैसे [इनसे कृष्ण] को बचाया जाये? [ब्रजवासियों ने] अपने दुःख की कभी चिन्ता नहीं की, किन्तु उन ब्रजवासियों के लिए कृष्ण ने उस समय क्या दिया? और उसके बाद वहाँ से मथुरा से आये हैं और इतनी रानियों के साथ में विवाह किया, पुत्र-कलत्र (पत्नी) के साथ में रह रहे हैं। अब इस द्वारका में यहाँ से क्या ये दे रहे हैं? ‘भूल गये सब’– यह कहने का तात्पर्य है। इसलिये ब्रजवासी लोगों ने अपने लिए कुछ नहीं चाहा, किन्तु इसने क्या दिया? मैं देख करके चकित हूँ कि इन गोप-गोपियों ने जिनको (कृष्ण को) प्राण की पुतली, आँखों की पुतली बना करके रखा था, उनके लिए [इसने] उस समय भी कुछ नहीं दिया जब ब्रज में था, [और] अब ब्रज से मथुरा में आया है, मथुरा से द्वारका में आया, [अब भी कुछ नहीं दिया।] अब [देखो!] तो कितनी रानियाँ? 16100, पुत्र कितने? और बेटियाँ कितनी? और दामाद कितने? [उन सबके साथ] बड़े आनन्द के साथ में यहाँ पर [रह रहा है। ब्रजवासियों को] एकदम भूल गया।
[किसी भक्त के द्वारा श्रील गुरुदेव की हरिकथा का अंग्रेजी भाषा में अनुवाद करने के उपरान्त… 59:28-1:02:05 तक]
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: आज यहीं पर कथा समाप्त हो रही है।
[श्रील गुरुदेव किसी भक्त को नगर संकीर्तन के लिए सभी गौड़ीय वैष्णवों को निमन्त्रण देने के लिए कहते हैं।]
---------------------------------------------------------------
समाप्ति-नोट्स (Endnotes)
#1
व्याज-स्तुति का अर्थ है– किसी की प्रशंसा करना, लेकिन ऐसा करते समय, यह ऐसा लगे कि आप उसकी निन्दा कर रहे हैं। यह एक प्रकार का शब्दालंकार है, जिसमें प्रशंसा इस तरह से की जाती है कि सुनने या पढ़ने वाले को यह निन्दा प्रतीत हो।
We have endeavoured to do this transcript to our best capacity, but surely we can make mistakes. So we welcome any feedback for further improvement.
Please provide a feedback on this transcript or reach us for general feedback.