Krsna is Not Cruel: Mood of Seperation of Krsna from Vrajavasis
01:22:38This audio is included in the following series of lectures:
Topics
- Krsna feels separated and covers his face with his pitambra (cloth) and Uddhava, Rukmini, and the wives of Krsna stand outside watching Krsna's condition.
- No devil can enter the Vraja-dhama.
- How Bakasura, Kamsa, and other devils entered Vraja; it happened by the will of Yogamaya to complete Krsna's pastimes.
- How Krsna used to steal butter, and buttermilk from gopis houses, and gopis kept shouting.
- Gopis used to complain to Mother Yasoda that her son is a thief.
- Krsna is called Achyuta.
- Mother Rohini is very intelligent, and always speaks sweet words to others.
- Krsna got married to 16108 queens and 8 of them are main.
- Krsna has 10 sons and 1 daughter from each queen.
- Narad Muni came with one parijata flower and requested Krsna give it to his wife whom he loves the most.
- Krsna gave Parijat flower to Rukmini; by this, Satyabhama became very angry and went to kopa-bhavana (darkroom).
- Krsna always misses Mother Yasoda, Nanda Baba, gopis, gopas, and cows and calls their names in his dream, also plays his flute in the dream.
- Krsna is very soft-hearted; he is carrying so much love in his heart for Vrajavasis; he sometimes cries in his dream.
- Two stages of love - separation & meeting as per Sri Sanatana Gosvami; Separation is more important.
Transcript
कृष्ण निष्ठुर नहीं हैं: ब्रजवासियों के विरह में कृष्ण के भाव
[श्रील भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराज ने 27 अगस्त, 2003 को वृन्दावन में यह हरिकथा कही थी।
नोट: इस प्रतिलेखन में निम्नलिखित सम्पादकीय योगदान हैं: कुछ स्थानों पर भाषा को थोड़ा सम्पादित किया गया है, समाप्ति-नोट्स (endnotes) जोड़े गये हैं और विषय-वस्तु के प्रवाह और बोधगम्यता को सुविधाजनक बनाने के लिए वर्गाकार कोष्ठकों (square brackets) में अतिरिक्त पाठ सम्मिलित किया गया है। इसका शाब्दिक-प्रतिलेखन शीघ्र ही उपलब्ध होगा।
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श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: कृष्ण घर के भीतर रुक्मिणीजी के पलङ्ग पर मुख ढककर सो रहे हैं। [वास्तव में] तो कृष्ण घर के भीतर पीताम्बर से मुख ढककर सोने का भान कर रहे हैं, सो नहीं रहे हैं। और उद्धव, नारदजी, रुक्मिणीजी, रोहिणी मैया, सत्यभामा इत्यादि सब बाहर देहरी (प्रवेशद्वार) पर हैं और वे परस्पर बातें कर रहे हैं।
उद्धवजी ने जब गोप और गोपियों की महिमा बतलायी, तो उसे सुन करके रोहिणी मैया ने बड़ी दुःखी हो करके जो कुछ कहा, [वह] मैंने कल बतलाया था। वे बड़ी शोक में आर्त्त हो [गयीं] और [उन्होंने] कृष्ण को निष्ठुर, बेदर्दी (निर्दयी) इत्यादि बतलाया। यहाँ तक कि यह बतलाया कि कृष्ण का हृदय वज्र से भी कठोर है।
[रोहिणी मैया ने उद्धवजी से कहा–] “ब्रजवासियों की बातें जो मैंने कृष्ण को बतलायी उन्हें सुनकर और यशोदा मैया का विलाप सुनकर पत्थर और वज्र भी पिघल जाते हैं किन्तु तुम्हारे प्रभु का हृदय द्रवित नहीं हुआ।”
[यहाँ तक वर्णन करके] परीक्षित् महाराज अपनी माताजी [अर्थात् उत्तरा देवी] को और भी कह रहे हैं, सुना रहे हैं– “अब सावधान हो करके सुनना और यदि में अचेत हो जाऊँ तो तुम हमें सचेत भी करना और स्मरण दिलाना कि मैं क्या कह रहा हूँ।”
देखो इसके बाद में रोहिणी मैया की बात को सुनकर–
तच्छ्रुत्वा दुष्टकंसस्य जननी धृष्टचेष्टिता।
जराहतविचारा सा सशिरः कम्पमब्रवीत्॥।
-श्रीबृहद्भागवतामृतम् (1.6.42)
[श्रीरोहिणीदेवी के वचनों को सुनकर बुढ़ापे के कारण विचारविहीना, निर्लज्जा, दुष्ट कंस की माता पद्मावती सिर को हिलाती हुई इस प्रकार कहने लगी।] GVP
परीक्षित् [महाराज] ने कहा कि रोहिणी मैया की बातों को सुनकर [अर्थात्] उन्होंने कृष्ण के प्रति कटाक्ष के द्वारा उनको जो वज्र से भी कठोर हृदयवाला बतलाया, उसे सुन करके ‘दुष्टकंसस्य जननी’ [अर्थात् दुष्ट कंस की माता] और ‘जराहत’ अत्यन्त वृद्धा, विचार विवेकरहित और धृष्ट आचरणी [पद्मावती कहने लगी।] धृष्ट आचरणी माने– अपने पति को छोड़ करके द्रुमिल दैत्य से जिसका द्रुमिल दैत्य जैसा ही कंस रूपी दुष्ट पुत्र पैदा हुआ और दुष्ट कंस [माने] कृष्ण की बाल्यावस्था से मथुरा पहुँचने तक जिसने उनको मारने के लिए असुरों को [ब्रज में भेजकर] सारी चेष्टाएँ की। तो वह द्रुमिल दैत्य का पुत्र होने [के कारण] दुष्ट और उसकी यह माता पद्मावती वृद्धावस्था के कारण सिर कँपाती हुई और रोहिणी के प्रति कुछ क्रोधित होकर कहने लगी।
यहाँ [इस श्लोक में पद्मावती को] तीन विशेषण दिये– दुष्ट कंस की मैया, धृष्टचेष्टिता और जराहत विचाररहित। ये तीन [विशेषण] बतलाये। [पद्मावती] बुद्धिरहिता है, नहीं तो ऐसे कैसे रोहिणी मैयाजी की बात को सुन करके उनसे क्रोधित हो जाती? वह मूर्ख थी बल्कि प्रेमभाव रहित थी किन्तु इस वस्तु को समझो कि यह योगमाया की क्रीड़ा है। [यह] गूढ़ रहस्य है। क्या? यदि योगमाया उसके द्वारा इस प्रकार का आचरण नहीं करवाती तो लीला की पुष्टि नहीं होती।
ब्रज में, मथुरामण्डल में कोई भी असुर प्रवेश नहीं कर सकता। तो इस ब्रज में अघासुर, बकासुर, पूतना इत्यादि सब कैसे घुसे? और मथुरा[पुरी] भी तीन लोक से न्यारी हैं। यहाँ पर तो कृष्ण सब समय रहते हैं, वहाँ पर दुष्ट कंस कैसे आ सकता है? ये गोपियों के प्रेम के लिए अनुकूल है। प्रतिकूल रूप में अनुकूलता करता है। कैसे अनुकूल करता है? यदि वह नहीं रहता तो कृष्ण की ब्रज की लीलाएँ नहीं होती। इसलिये योगमाया उसके द्वारा कृष्ण की लीला की पुष्टि के लिए प्रतिकूल रूप में ये सब चीजें कर रही हैं।
[पद्मावती] क्या बोली? सिर कँपाती हुई उनको ही दुर्बुद्धि बतला रही है– “हूं, रे रे सत्यभामा! रुक्मिणी! अरे दुर्बुद्धि रोहिणी! बड़े दुःख की बात है। अहो!”
अहो वताच्युतस्तेषां गोपानामकृपावताम्।
आबाल्यात् कण्टकारण्ये पालयामास गोगणान्॥
-श्रीबृहद्भागवतामृतम् (1.6.43)
[पद्मावती ने कहा– “अहो! बड़े दुःख की बात है, बचपन से ही श्रीकृष्ण काँटों के वन में उन निर्दयी-गोपों की गायें चराते रहे।”] GVP
“बड़े दुःख की बात है। ये अच्युत…”
[यहाँ पर] ‘अच्युत’ कृष्ण के लिए प्रयोग हुआ है किन्तु अच्युत कहने का भी एक तात्पर्य है। वह पीछे बतलायेंगे।
“बाल्यकाल से कण्टक भरे वन (जंगल) में गोगणों (गायों) को चराने के लिए यह अच्युत दिनभर उनके पीछे-पीछे रहता था।” बाल्यकाल से माने? कहने का तात्पर्य यह है कि कम-से-कम तो 8-10-12 वर्ष का होना चाहिये, तब तो वह गोचारण के लिए जायेगा।
“अभी [कृष्ण की गैया चराने की] उम्र नहीं हुई किन्तु बाल्यकाल से ही– 5-6 वर्ष की उम्र से ही गोचारण में जबरदस्ती लगा दिया। उस समय दुधमुँहा बच्चा गोदी में रख करके प्यार करने योग्य होता है और निष्ठुर गोप-गोपियों ने, निष्ठुर यशोदा और नन्द ने और उनके परिवार ने इस छोटे से दुधमुँहे कोमल बच्चे को भी इन गायों के पीछे [लगा दिया।] गायें कैसी हैं? वे चरते-चरते [क्या] कण्टकारण्य देखती हैं कि कहाँ कण्टक है? कहाँ क्या है? कहाँ नदी है? [कहाँ] नाला है? वे तो जहाँ घास देखेंगी, वहीं पर छलांग मारते हुए [चरने लगेगीं।] नुकीले पत्थरों पर [छलांग मार देंगी।] उनका खुर बना हुआ होता है, उसमें नहीं चुभता, काँटे भी नहीं चुभते और ये कण्टकारण्य (वन) में जहाँ-तहाँ दौड़ती हैं और उनके पीछे-पीछे ये [कृष्ण] चलता है। और वह भी कैसे? वह भी कैसे? [नंगे पैर।]”
“ओह! सवेरे का [घर से] निकला। वह भी तो ये तो खिलायेंगी नहीं गोपियाँ, कहीं घर से यदि मक्खन चुराया तो और विपत्ति है और वही भूखा बच्चा दिनभर गायों के पीछे छोड़ दिया। जूता नहीं दिया, छाता नहीं दिया, कुछ भी नहीं दिया।” [इस विषय को] आगे बतलायेंगे।
“तो ये बाल्यकाल से ही... कृष्ण यदि जूता-चप्पल पहन करके नहीं चलता है तो पैर में नुकीले पत्थर और कण्टक अवश्य लगेंगे।”
एक बार हम 300-400 लोग ब्रजमण्डल की पैदल परिक्रमा करते-करते पैठा [ग्राम,] इसके बाद में चन्द्रसरोवर [गये।] वहीं से गोवर्धन का पास ही में सीधा रास्ता है। परासौली पड़ता है और उसके पास ही में आन्यौर ग्राम है। हम लोग जल्दी से छोटे मार्ग (shortcut) के लिए पैदल चले तो वहाँ गोखुर के काँटे पैर में लगें और टूट जायें, निकले नहीं। बड़े काँटे हो तो निकल जायेंगे और वे गोखुर के काँटे इधर-उधर पैरों में चारों तरफ लग जाते, निकलते नहीं और टूट जाते। रातभर कष्ट, दिनभर कष्ट, जब तक न निकले। और [उन काँटों को] बड़ी सुई से निकालना भी बड़ा कठिन।
“तो ऐसे ये कृष्ण को गायों के पीछे-पीछे चलाते। जूता भी रहता तो भी एक बात थी। वर्षा हो, ठण्डक हो, चिलचिलाती धूप हो, किन्तु [कृष्ण को वन में] जाना पड़ेगा। घर में नहीं रहने देती। गायों को कौन खिलायेगा? इसलिये [यशोदा कृष्ण को] घर से बाहर कर देती। यदि देर हो जाती तो [यशोदा] कहती– “अरे! सवेरा [हो गया,] जागो तो। उठो, उठो, उठो, गैया चराना है और गैया वहाँ पर जा रही हैं और सखा लोग तुम्हारे लिए प्रतीक्षा कर रहे हैं।”
अच्युत किसलिये कहा? अच्युत कहने का कारण है कि कृष्ण कभी भी अपने स्वभाव से च्युत नहीं होते। बाल्यकाल में यदि उनको गोचारण में लगा दिया तो [बाद में भी स्वाभाविक रूप से] गोचारण करते रहें। वे दुःख-कष्ट नहीं देखते हैं। उनको प्रसन्न करने के लिए वह अपने स्वभाव में रहकर गैया चरा ही रहे हैं। ये नहीं कहते कि मैं नहीं जाऊँगा।
विभिन्न प्रकार के बहाने ढूँढ करके पद्मावतीजी इस प्रकार से गोपियों के प्रति ऐसे वचन कह रही है– “ओह! और तो क्या?
आक्रोशन्ति च तद्दुःखं कालगत्यैव कृत्स्नशः।
कृष्णेन सोढ़मधुना किं कर्त्तव्यं वतापरम्॥
-श्रीबृहद्भागवतामृतम् (1.6.45)
[पुन: वे गोपियाँ ही चिल्ला-चिल्लाकर उसका सर्वत्र प्रचार करती थीं; परन्तु श्रीकृष्ण ने यह सब दुःख काल की गति जानकर सहन कर लिया। इसके अतिरिक्त वे कर भी क्या सकते थे? तुम्हीं बताओ कि अब उन ब्रजवासियों के लिए वे क्या करें?] GVP
फिर और तो क्या? गोचारण से पहले या बाल्यावस्था में यदि कृष्ण को भूख लगी... यशोदा मैया ने तो घर में कुछ [खाने को] दिया नहीं और उनको भूख लगी तो किसी पास की गोपी के घर में मक्खन चुराने पर विवश हो गये। इसलिये उनके घरों में जब घुसे तो गोपियाँ चीत्कार कर उठती थीं– “अरे! ये चोर आया! चोर आया!” हल्ला बोल देती थीं। हल्ला करती थीं– “आया चोर! आया चोर! पकड़ो पकड़ो।” और ये बेचारा छोटा-सा बच्चा क्या करता? उसको वे पकड़ लेतीं और कभी-कभी उसको पकड़ करके यशोदा मैया के यहाँ उलाहना देने के लिए ले आतीं– “तुम्हारा बेटा चोर है, चोटा है। हमारी सब दधि खा गया, मठ्ठा खा गया।” अरे! छोटा-सा बच्चा खायेगा भी तो कितना? उनके घर का सब मक्खन ही खा जायेगा?”
ये लाञ्छना लगा रही है। चीत्कारकर [कहती–] “कभी कृष्ण गये और वह गोपी छुप करके देख रही है कि चोर आयेगा और उसने हाथ पकड़ लिया।”
ये ब्रज की बातें उसने (पद्मावती ने) सुनी हैं कहीं से। सुनी हैं ना? इसलिये वह थोड़ा-सा जानती है।
तो उनका हाथ पकड़ लिया। [कृष्ण] कहते– “मैया! मैया! मुझे छोड़ दो। मैया री! मुझे छोड़ दो।” [कृष्ण] हाथ जोड़ करके विनय करते हैं और वह ऐसी निष्ठुर गोपी! उसने हाथ नहीं छोड़ा। [उसने कृष्ण से] कहा– “तू चोरी करने क्यों आया?” कृष्ण मुस्कुराते हुए, रोते हुए, गिड़गिड़ाते हुए उसके पैरों में गिरते हैं कि छोड़ मैया! अब नहीं आऊँगा। और तब ये उसको छोड़ती। और निष्ठुर गोपी उनके कोमल हाथ को कस करके पकड़ लेती।
कभी-कभी यदि [कृष्ण को मक्खन चोरी करते हुए] पकड़ लिया तो उसको पकड़ करके यशोदा मैया के यहाँ ले आयी, “कैसा बेटा है तुम्हारा? यह किस प्रकार का चोर अभी से निकल रहा है? चोरी करता है और सीनाजोरी भी करता है [अर्थात् उस पर अकड़ भी दिखाता है] और हाथ छुड़ा करके भाग जाता है।”
[पद्मावती व्रजवासियों पर] विभिन्न प्रकार की लाञ्छनाएँ लगा रही है। ये कृष्ण की बाल्यलीलाओं को उलाट करके ऐसा कह रही है। और कहती सर्वत्र… यशोदा मैया के यहाँ क्यों? वहाँ पर सभी गोपियाँ कृष्ण का दर्शन करने के लिए जुटती थीं। तो [पद्मावती] कह रही है– “नहीं, वे [कृष्ण का दर्शन करने के लिए] नहीं जुटती थीं। कृष्ण के प्रति उलाहना देने के लिए वे सब आती थीं। इसलिये बड़ी भीड़ रहती थी।”
‘कालगत्यैव’– वह अभी, उनको कुछ करना है। दुष्ट कंस से बचना है। इसलिये कालगति [शब्द का प्रयोग किया।] अथवा जो बच्चे हैं, वे क्या कर सकते हैं? – इसलिये काल की गति [कहा। कृष्ण को] विवश हो करके बहुत दिनों तक ये सबकुछ सहना पड़ा। इसलिये विवश हो करके दुःख को [सहन किया।] इतना दुःख होने पर भी [inaudible 18:16] । तुम लोग भी बोलो कि अब ब्रजवासियों के प्रति, उनके सुख के लिए वे क्या करेंगे? इतना तो बचपन से ही, और अब तक [कर चुके हैं। उनकी] गायें चरायीं और न जाने उनके घर के कितने ही काम किये और उन्होंने [उचित ढंग से] खिलाया-पिलाया भी नहीं। तो कृष्ण उनके लिए क्या करेंगे? तुम लोग विचार करके देखो।”
[श्रील गुरुदेव किसी भक्त को अंग्रेजी भाषा में अनुवाद करने के लिए कहते हैं। उनके अनुवाद करने के पश्चात्...18:51-27:18 तक]
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज:
श्रीपरीक्षिदुवाच-
प्रज्ञागाम्भीर्यसम्पूर्णा रोहिणी व्रजवल्लभा।
तस्या वाक्यमनादृत्य प्रस्तुतं संशृणोति तत्॥
-श्रीबृहद्भागवतामृतम् (1.6.46)
[महाराज श्रीपरीक्षितने कहा– श्रीरोहिणीदेवी बड़ी बुद्धिमती और गम्भीर-स्वभाव की थीं तथा समस्त ब्रजवासियों की प्रिय थीं। अतः वे पद्मावती के वचनों को अनसुनाकर अपनी बात को आगे कहने लगीं।] GVP
रोहिणी मैया बहुत बुद्धिमती, गाम्भीर्य बुद्धि और गम्भीर स्वभाववाली थीं। ‘व्रजवल्लभा’– ब्रज की जितनी भी गोपियाँ थीं, उनको बड़ा स्नेह और आदर करती थीं। ‘व्रजवल्लभा’ [अर्थात्] ब्रज की वल्लभा रोहिणी देवी ने पद्मावती की बात को सुन करके उसका अनादर करके उसकी ओर ध्यान ही नहीं दिया कि क्या बकबक कर रही है? [उन्होंने सोचा कि इसकी बातों का उत्तर देने से] समय नष्ट करना होगा। इसलिये ‘कृष्ण की निष्ठुरता इत्यादि’ प्रस्तुत विषय को वह जो वर्णन कर रही थीं, बतला रही थीं, उन्होंने फिर बोलना आरम्भ किया।
‘श्रीरोहिण्युवाच’– रोहिणी मैया फिर कहने लगीं। क्या कहने लगीं?
राजधानीं यदुनाञ्च प्राप्तः श्रीमथुरामयम्।
हतारिवर्गो विश्रान्तो राजराजेश्वरोऽभवत्॥
-श्रीबृहद्भागवतामृतम् (1.6.47)
[श्रीरोहिणीदेवी ने कहा– शत्रुओं का विनाश करके श्रीकृष्ण ने यादवों की राजधानी मथुरा को प्राप्त किया तथा अब राजराजेश्वर के रूप में वे विश्राम-सुख का उपभोग कर रहे हैं।] GVP
कृष्ण ने मथुरा में पहुँचते ही कंस, उसके भ्राताओं, चाणूर-मुष्टिक और दूसरे दुष्ट लोगों का [संहार किया।] और अन्त में मथुरा में रहते हुए जरासन्ध की कितनी लाखों-करोड़ों सेनाओं का संहार किया? और अन्त में सारी मथुरापुरी के साथ में अब यहाँ [द्वारका में] आये हैं और यहाँ आ करके भीम के द्वारा जरासन्ध को भी मरवाया। पौण्ड्रक इत्यादि जो असुर स्वभाववाले थे, उन सबको मार करके भूभार हरण किया। अब शत्रु तो है नहीं, अब किसी से लड़ना-भिड़ना तो है नहीं, इसलिये बड़े आराम के साथ में द्वारकापुरी के राजराजेश्वर बने हैं, द्वारकाधीश बने हैं और साथ ही में उन्होंने 16108 पटरानियों के साथ में विवाह भी किया। इतनी तो पटरानियाँ हैं– 16100 और उनमें 8 अधिक हैं और उनकी दास-दासियाँ भी उनसे कम सुन्दर नहीं हैं। इसलिये संख्या में बहुत अधिक हैं और एक-एक पत्नी के गर्भ से 10-10 बेटे और एक बेटी है, जिनको पढ़ाने के लिए करोड़ शिक्षक (teacher) लोग नियुक्त हैं। कितने? और ऐसे राजराजेश्वर अब द्वारका में सुख भोग रहे हैं, अब विश्राम कर रहे हैं। भला उनको गोपियों की याद कैसे आयेगी? उन दिनों की याद तो आयेगी नहीं।
और इस प्रकार से उन्होंने कितने [दुष्ट] लोगों को मारकर जरासन्ध के जेलखाने से कैदी राजाओं को छुड़ाया, जो भक्त थे। जरासन्ध का पुत्र सहदेव था। जब जरासन्ध मारा गया तो कृष्ण ने सहदेव को कहा– “जितने बन्दी राजा हैं, सबको छोड़ दो।” तो वे लोग जब छूटे तो कृष्ण के चरणों में शरणागत हो गये।
कृष्ण ने कहा– “अब अपनी-अपनी राजधानियों में जाओ और युधिष्ठिर महाराजजी का राजसूय-यज्ञ होगा और वहाँ से उसमें सभी लोग भेंट ले करके आना।”
इसलिये वे लोग कृष्ण की वन्दना कर रहे हैं और जब द्वारकापुरी में आये तो वही सब राजा आते हैं।
पारिजात-हरण के समय में... यही नारदजी बैठे हैं, ये एक पारिजात का पुष्प ले करके [आये और] बोले– “प्रभु! हे द्वारकाधीश! आपकी बहुत-सी सुन्दरी-सुन्दरी स्त्रियाँ हैं। उनमें से किसी एक को आप हमारे सामने ये पारिजात का एक पुष्प दे दीजिये। मैं जानना चाहता हूँ कि आपकी सबसे अधिक प्रिया कौन हैं?”
तो कृष्ण अगल-बगल झांकने लगे कि मैं क्या करूँ? ये ऐसे ही विवाद करानेवाले, झगड़े लगानेवाले नारद हैं।
[नारदजी ने] कहा– “नहीं, प्रभु! हमको बहुत जल्दी जाना है। जल्दी से ये पुष्प दे दीजिये कि मैं भी अपने काम में जाऊँ।”
कृष्ण ने [सोचा–] “मैं क्या करूँ? किसको दूँ?” [कृष्ण] बहुत कुछ विचार [करने लगे।]
[नारदजी ने कहा–] “जल्दी कीजिये। जल्दी कीजिये।”
तो वे जल्दीबाजी में अब क्या करें? रुक्मिणीजी पास में बैठी थीं और [वह पारिजात का पुष्प] रुक्मिणीजी को दे दिया और यह देख करके सत्यभामा को महाक्रोध और मान हुआ।
[सत्यभामा ने कहा–] “झूठा! मक्कार! हर दिन ये कहता है कि तुम ही हमारी सबसे प्यारी हो। आज मैंने देख लिया कि कौन प्यारी है?”
बस वहीं अपने पैरों को पृथ्वी पर पटकती हुई और मैले-कुचैले वस्त्र पहन करके कोपभवन में गयीं। थोड़ी देर के बाद में [कृष्ण ने] देखा कि स्थिति गड़बड़ हो गयी। नारदजी ने तो अब झगड़ा लगा दिया। कुछ देर के बाद में कृष्ण वहाँ गये और देखा कि वह नागिन की तरह फुँकार कर रही हैं।
कृष्ण ने ज्योंहि उनके शरीर पर हाथ दिया, वे फूत्कार उठीं– “खबरदार! यहाँ मत आओ। जो तुम्हारी प्यारी है, उसके पास में जाओ और उसकी चापलूसी करो। यहाँ आने की कोई आवश्यकता नहीं है।” कृष्ण ने बहुत [मनाया।] वे तो मान भङ्ग करने में बड़े चतुर हैं।
[कृष्ण ने कहा–] “अरे मेरी सर्वोत्तम प्रिया! तुम्हारा ये मान देखने के लिए ही मैंने [रुक्मिणी को पारिजात पुष्प] दिया। नहीं तो मैं देता थोड़ी। तुम्हारा मान देखने के लिए [दिया] कि कैसे तू मान करती है? इसलिये मैंने दिया। देखो, मैं तुम्हारे घर में पारिजात का पेड़ लगाऊँगा। उसको तो [मात्र] एक पुष्प दिया है। स्वर्ग से पारिजात का पेड़ ही ले आयेंगे, तुम्हारे घर में लगा देंगे।”
[सत्यभामा ने कहा–] “रखो! रखो! मैं नहीं सुनूँगी।”
[कृष्ण ने कहा–] “अच्छा, अभी तैयार हो जाओ।”
और [कृष्ण] उनको जबरदस्ती गरुड़ पर बैठाकर बस उड़े, देवलोक में पहुँचे। देवताओं को परास्त करके पारिजात का पेड़ ले आये और उनके घर में लगा दिया और बोले कि इस अवसर पर रुक्मिणी को भी निमन्त्रण दो। तो रुक्मिणी भी आयीं क्योंकि वह धीर-गम्भीर हैं ना? दक्षिण स्वभाव की हैं। उन्होंने कुछ नहीं किया और ये उसके लिए [मान करती।] तो ऐसे देवता लोगों को भी परास्त किया। एक बार नहीं, दो बार [परास्त किया।] ‘सुधर्मा सभा’ लाने में भी उनको परास्त किया। और कृष्ण की महिमा देख करके वे देवता भी स्वर्ग से आ करके [वन्दना करते हैं।] ब्रह्मा भी [उनकी वन्दना करते हैं।] कौन ब्रह्मा? सहस्त्र मुखोंवाले ब्रह्मा। सहस्त्र मुखों से उनके चरणों में गिरते हैं। तो ये देवता लोग भी उनके चरणों की वन्दना कर रहे हैं। भला कृष्ण को ऐसी दशा में अवकाश कहाँ है कि गरीब ग्वालिनें, गैयाओं के पीछे-पीछे [घूमनेवालों], दूध दोहनेवालों की सुधबुध रखें, उनको स्मरण रखें। इसलिये बड़े परिताप की बात है।
श्रीपरीक्षिदुवाच– यह सब सुन करके परीक्षित् जी बोले।
रोहिणीजी के वचनों को वहाँ उपस्थित रुक्मिणी और सत्यभामा इत्यादि कृष्ण की पटरानियाँ सह नहीं सकीं।
सबसे पहले रुक्मिणीजी बोलीं– “अरे मैया! तू क्या कह रही है? कितना मक्खन जैसा कोमल कृष्ण का स्वभाव और इनको आप निष्ठुर बतला रही हैं।”
श्रीकृष्णवल्लभा अर्थात् ये दिन-रात कृष्ण के साथ में रहनेवाली, उनके हृदय और बाहर की बातें जाननेवाली हैं। कौन? रुक्मिणीजी। इसलिये वे नपी-तुली हुई ठीक बात कहेंगी। इसलिये उनके हृदय की बात को जाननेवाली भीष्मकनन्दिनी... क्यों भीष्मकनन्दिनी? भीष्मक भी वैसे ही गम्भीर [स्वभाव] वाले हैं। इसलिये रुक्मिणीजी कहने लगीं। क्यों? रोहिणी मैया के निष्ठुर वचनों को वे सह न सकीं कि कृष्ण इतने निष्ठुर हैं और वज्र से भी कठोर उनका हृदय है। इसलिये [रोहिणी मैया के वचनों का] उत्तर देने लगीं।
[37:41-46:30 तक किसी भक्त के द्वारा श्रील गुरुदेव की हरिकथा का अंग्रेजी भाषा में अनुवाद...]
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: अब रुक्मिणीदेवी कह रही हैं क्योंकि वे दिन-रात कृष्ण के पास में रहती हैं और उनके हृदय की बातें जानती हैं और ब्रज की भी बातें जानती हैं। ब्रज की बातें कैसे जानती हैं? स्वयं कृष्ण ही उनको बतलाते हैं। कभी स्वप्न में और कभी प्रत्यक्ष रूप में गोपियों के सम्बन्ध में कुछ [बताते हैं।] इसलिये रुक्मिणीदेवी कह रही हैं– “ओह माताजी! आप उनके कोमल हृदय को न जान करके उनके विरुद्ध में ऐसा क्यों कह रही हैं कि ये कठोर हृदय के हैं। निष्ठुर हैं, निर्दयी हैं। आपको ऐसा नहीं कहना चाहिये। मैं जानती हूँ क्योंकि दिन-रात उनके निकट में रहती हूँ। वे कभी जाग्रत अवस्था में स्वयं गोपियों की, माताओं की, गायों की, सखाओं की चर्चा करते हैं, ब्रजभूमि की चर्चा करते हैं और कभी सो जाने पर भी चर्चा करते हैं।” वह कैसे?
उसीको यहाँ पर रुक्मिणीदेवी वर्णन कर रही हैं– “मैं आपको और इन लोगों को भी प्रकट रूप में सुना रही हूँ। मैंने इनको भी नहीं सुनाया।” किनको? जो वहाँ पर महिषियाँ हैं।
“रात्रिकाल में जब हमारे आर्यपुत्र सो जाते हैं तो वे ब्रज की न जाने कितनी बातें बड़बड़ाते हैं?” बड़बड़ाना माने समझते हो?
भक्त: नींद में बोलना।
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: भावावेश में बोलने लगते हैं।
“[कृष्ण] स्वप्न देख रहे हैं और उसमें एकदम भावावेश में या प्रत्यक्ष ही ऐसा हो रहा है। तो कितनी बातें कहते हैं? और बड़े प्रीतिभाव से [कहते हैं।] अरे! ब्रजवासियों, यशोदा मैया, नन्दबाबा और गोपियों की तो बात ही क्या? [स्वप्न में] बड़े मधुर स्वर से– “अरे कालिन्दी! पिशङ्गी! पद्मगन्धे!” इत्यादि नामों को पुकारा करते हैं। बछड़े-बछड़ियों का भी नाम रखा है। उनको भी कभी-कभी पुकारते हैं। कभी अपने सखाओं को [पुकारते हैं]– “श्रीदाम भैया! तुम कहाँ हो? जरा ठहरो! मैं आ रहा हूँ। मधुमङ्गल तुम कहाँ हो?” और [ब्रज में] उनसे जैसी परिहास की बातें करते हैं, स्वप्न में भी उनसे [वैसी ही] परिहास की बातें करते हैं।
और कभी कहते हैं– मैया! मुझे मक्खन और रोटी दो।”
यशोदा मैया कहती हैं– “देखो, तू रोटी और मक्खन नहीं खाता, इसलिये तुम्हारी चोटी मोटी नहीं होती। इसलिये तू यदि अधिक खायेगा तो तुम्हारी [चोटी] मोटी हो जायेगी।”
तो कृष्ण कहते हैं– “मैया! तो मक्खन और रोटी ले आओ। मैं अधिक खाऊँगा और जल्दी से बलवान हो जाऊँगा और मेरी चोटी भी मोटी हो जायेगी।”
कभी-कभी वंशी बजाने की भङ्गी (pose) करते हैं, मानो वंशी बजा रहे हैं। सोये-सोये ही पैरों पर पैर रख करके टेढ़े पैरों से, टेढ़ी कमर और टेढ़े मुख से वंशी बजाने की भङ्गी (pose) करते हैं। वंशी तो है नहीं, किन्तु हाथ वैसे ही काम करता है।
कभी-कभी कहते हैं– “अरे चन्द्रावली! तुम्हारा कैसा व्यवहार है?” मेरे (रुक्मिणी) कपड़ों को पकड़ करके ऐसे खींचते हैं और कहते हैं– “चन्द्रावली! तुम्हारा कैसा व्यवहार है?”
क्यों कह रहे हैं? ब्रज की बातें स्वप्न में आती हैं और प्रत्यक्षवत् देखते हैं कि चन्द्रावली खड़ी हैं और कृष्ण राधाजी के यहाँ से वहाँ पर पहुँचे हैं और कुछ चिह्न उनके अङ्गों में हैं।
चन्द्रावली कहती हैं– “यहाँ पर किसलिये पधारे हैं?” और बड़ी गम्भीर हो करके खड़ी हो जाती हैं। कृष्ण समझ नहीं पाते हैं कि इसने मान किया है कि नहीं किया है। इतनी गम्भीर रूप में [खड़ी हो जाती हैं।]
[कृष्ण ने] कहा– “तुमने मान किया है?”
[चन्द्रावली कहती हैं–] “मान किसलिये करूँगी? आप जहाँ पर सुखी रहते हैं वहाँ पर रहिये। हमको इसमें क्या आपत्ति हो सकती है?”
इतनी गम्भीर! भीतर में गूढ़ मान है, किन्तु छिपा करके रखा हैं।
कभी कृष्ण [चन्द्रावली के पास में]आये और बोले– “राधिके! तू कैसी है? तुम्हारा [सब] कुशल तो है?
तो चन्द्रावली क्या कह रही है? – “हे कंस महाराज! आपका [सब] कुशल तो है?”
तो कृष्ण ने कहा– “हमको कंस क्यों कहा?”
[चन्द्रावली ने कहा–] “तो हमको आपने राधा क्यों कहा? मैं राधा हूँ?”
तो कृष्ण इसी सबका स्मरण करते हैं।
[कृष्ण स्वप्न में कह रहे हैं–] “तुम्हारा यह व्यवहार ऐसा क्यों है कि हमसे ना बोल रही है, ना चाल रही है, ना कुछ कर रही है? इस प्रकार से गम्भीर मान में खड़ी हो। यह तुम्हारा आचरण कैसा है? बोलो तो सही?”
कृष्ण कभी-कभी उनका गूढ़भाव देख करके मान समझ नहीं पाते। मधुमङ्गल से पूछते हैं– “इसके गूढ़भाव कैसे समझेंगे?”
मधुमङ्गल बड़ा चतुर है। वह कोई ना कोई बहाना निकाल करके और कहता है कि ये ऐसी बात है। इस प्रकार से…
और कभी-कभी क्या करते हैं? ऐसे मेरे कपड़े खींचते हैं। और कभी-कभी रोते-रोते-रोते आँखों [के अश्रुओं] से उनका तकिया और बिस्तरा सबकुछ [भीग जाता है।] कभी-कभी बड़े प्रेम से– “ललिते! ललिते! विशाखे! हे राधे! अब क्षमा करो। ऐसा अपराध नहीं करूँगा” – इस प्रकार से कहते हैं। इसलिये ब्रज की ये सभी बातें कृष्ण के द्वारा ही मैं जानती हूँ। इतने कोमल हृदय के हैं! मैं वर्णन नहीं कर सकती कि ब्रजवासियों के प्रति उनकी कितनी प्रीति है? और आप कहती हैं कि वे निष्ठुर हैं। वे निष्ठुर कदापि नहीं हो सकते।
स्वाप्नादुत्थाय सद्योऽथ रोदित्यार्त्तस्वरैस्तथा।
वयं येन निमज्जामो दुःखशोकमहार्णवे॥
-श्रीबृहद्भागवतामृतम् (1.6.53)
[और कभी तो निद्रा भङ्ग होने के उपरान्त सहसा शय्या से उठकर आर्त्त स्वर से क्रन्दन करने लगते हैं। हम सभी उनके क्रन्दन की ध्वनि को सुनकर दुःख और शोकरूपी महासागर में डूब जाती हैं।] GVP
देखो, कभी-कभी नींद टूट जाने पर शय्या से उठते ही, बिछौने से उठ करके बड़े आर्त्त स्वर से रोदन करते हैं। स्वप्न भी दो-तीन तरह के होते हैं। एक तो गम्भीर [होता है] और दूसरा होता है क्या? स्वप्न बन्द हो गया किन्तु स्वप्न में ही भावाविष्ट हैं, पूरा टूटा नहीं। उस अवस्था में ऐसे ही कुछ बातें अनाप-शनाप प्रलाप करते हैं। तो वैसे ही कृष्ण बिछौने से उठ करके शय्या त्याग करके बड़े आर्त्त स्वर से वृन्दावन की, ब्रज की, गायों की, माताओं की, ललिता, विशाखा, चन्द्रावली और राधा की यादें आ जाती हैं। और बड़े आर्त्त स्वर से रोने लगते हैं। और उनके रोदन की ध्वनि सुन करके हम जितनी उनकी महिषियाँ हैं, रानियाँ हैं, पत्नियाँ हैं, शोकसागर में निमज्जित हो जाती हैं। कोई उनको सान्त्वना नहीं दे सकतीं। कैसे उनको स्वस्थ करें? हमारे पास ऐसी कोई भी बुद्धि नहीं, जो थोड़ी देर के लिए ही उनको सान्त्वना दें। रोते-रोते-रोते उनकी आँखें सूज जाती हैं।
अहो! आज की तो बात देखो! आज न जाने क्या उन्होंने स्वप्न में देखा।
‘अद्यापि दृष्ट्वा किमपि स्वपन्निशि’– आज रात में न जाने कैसा उन्होंने स्वप्न देखा? और उठ करके क्रन्दन करते-करते अपने बिस्तर पर लेट गये हैं और अपने मुख को अपने उत्तरीय [वस्त्र] से ढककर निद्रित की भाँति अभी लेटे हुए हैं। अभी रो रहे हैं। हाय-हाय! अभी तक उन्होंने हाथ-मुख भी नहीं धोया, कलेवा भी नहीं किया। दिन भी बहुत चढ़ गया है।
इस तरह से [रुक्मिणीदेवी] रोहिणी मैया को और सब लोगों को बता रही हैं। ये तो निद्रित अवस्था [का वर्णन है।] अब इसके बाद में सत्यभामा कुछ कहेंगी।
[श्रील गुरुदेव किसी भक्त को अंग्रेजी भाषा में अनुवाद करने के लिए कहते हैं। उनके अनुवाद करने के पश्चात्...56:00-61:18 तक]
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: रुक्मिणीजी बड़ी गम्भीर बुद्धि की हैं। बड़ी उदार भी हैं। जो कुछ कहा, गोपियों के प्रति आदरभाव से कहा। उनको गोपियों के ऊपर में सापत्न्य भाव नहीं था। उन्होंने प्रीति के साथ में कहा और उनकी जितनी प्रशंसा है, उस प्रशंसा के साथ में कहा कि कृष्ण उनको आदर करते हैं। इसलिये उनको मान नहीं हुआ। किन्तु इन सब बातों को सुन करके सत्यभामाजी को गोपियों के प्रति कुछ ईर्ष्या हुई। ‘कृष्ण हम लोगों को छोड़ करके उनके प्रति इतनी प्रीति करते हैं!’– इसलिये इस भाव को वह सह न सकीं और सुन करके कुछ ईर्ष्या भाव से, कुछ कटाक्ष करते हुए, कुछ क्रोध प्रकाश करते हुए सापत्न्य [सौतपन के] भाव के अनुसार में कहने लगीं। सापत्न्य भाव माने क्या? किसी एक पुरुष की दो पत्नियाँ हैं। [उसके द्वारा किसी एक पत्नी को सम्मान देने से दूसरी पत्नी मान कर देती है।]
कृष्ण एक को आदर करेंगे तो दूसरी मान कर बैठेगी और उसको जरा सम्मान देंगे तो ये मान कर देगी। गोपियाँ कहती हैं कि मथुरापुरी में तुम्हारी लाखों यादवों की पत्नियाँ हैं। दिनभर रातभर यही मनाया करो जीवनभर।
तो इस तरह से ईर्ष्या से सत्यभामाजी कहने लगीं– “अरे भामिनी!” भामिनी माने यहाँ पर बहन।
“अरे बहन! ये आप क्या प्रलाप बक रही हैं।” प्रलाप, रुक्मिणी के लिए कह रही हैं।
“आप क्या ये प्रलाप कह रही हैं। अरे! क्या वे सोते हुए ही ये कहते हैं या नहीं? अरे! दिन में भी ऐसा ही करते हैं। प्रत्यक्ष रूप में गोपियों की बड़ाई (प्रशंसा) करते हैं, प्रतिष्ठा [प्रदान] करते हैं। और वे इतने अभिनिविष्ट हो जाते हैं, उस तदात्म भाव में आ जाते हैं कि वे भूल जाते हैं कि मैं द्वारकापुरी में हूँ और ये हमारी रानियाँ हैं। उस तदात्म भाव के [कारण ऐसे हो जाते हैं] जैसे मानो गोपियाँ [उनके समक्ष ही हैं और] वे जाग्रत समाधि में हैं। और उस समाधि में हम लोगों को कहते हैं– “अरे राधे! अरे ललिते!” –ये जाग्रत समाधि है। देवता लोगों की जैसी समाधि नहीं। इसलिये ये प्रभु क्या केवल निद्रा में ही [गोपियों को स्मरण करते हैं?] नहीं, जाग्रत अवस्था में भी [उनको स्मरण करते हैं।] वे मन-ही-मन में उन गोप-गोपियों की, गायों की, ब्रजवासियों की, चन्द्रावली और श्रीमती राधिका प्रभृति [गोपियों] की बातों को स्मरण करते हैं। [जाग्रत अवस्था में भी] निद्रित जैसे ही वे [आचरण] करते हैं, भावाविष्ट हो करके वे कहते हैं। अरे भगिनी! हम लोग तो नाममात्र की उनकी भार्या हैं किन्तु इनका हम लोगों के प्रति तनिक भी स्नेह नहीं है। हम तो इनकी दासियों की दासी होने [भी योग्य नहीं हैं।] गोपियों की दासियों की दासियों के प्रति भी तो कृष्ण को इतना प्रेम है। हम लोगों से तनिक भी कोई प्रीति नहीं है। वास्तव में हम लोग ब्रजवासियों की, ब्रजरमणियों की दासी होने के भी योग्य नहीं है। वे पुलिन्दी कन्याएँ [इत्यादि] दासियाँ भी उनकी जितनी प्रिय हैं क्योंकि वे गोपियों की चरणरज को धारण करती हैं, तो हम लोग तो ऐसी नहीं हैं।”
यहाँ पर सनातन गोस्वामीजी का यह भाव है कि प्रेम की मिलन और विरह– दो स्थितियाँ होती हैं। मिलन में बाहर से मिलन होता है, बाहर की स्मृति होती है और अनुसन्धान रहता है और विरह में क्या होता है? विरह में उनके सारे लीलाचरित्र का स्मरण उनके हृदय में होता है, मानो वे मिल रहे हैं। इसलिये विरह में एक प्रकार का आनन्द है।
मैंने एक दिन बतलाया था। सीताजी रावण की लंकापुरी में अशोक-वाटिका के बीच में बैठी हुई हैं। बाहर [पेड़ के नीचे] और झरझर-झरझर करके वर्षा हो रही है। और उसमें बैठी हुई हैं। उनकी आँखे बन्द हैं और सोच रही हैं। वे भूल गई कि मैं लंका में अशोक-वाटिका [में एक वृक्ष] के नीचे हूँ। क्या सोच रही हैं? अहो! मेरा जब स्वयंवर होने का था तो राम बगीचे में मिले थे। वे अपने गुरुजी के लिए पूजा के लिए फूल चुनने के लिए आये थे और मैं भी देवी की पूजा करने आयी थी। दोनों की आँखें चार हुई। राम के हृदय में मेरे प्रति कितना उल्लास हुआ! और मैं तो अपना सब कुछ भूल गयी। [सखियाँ] मुझे पकड़ करके घर लायीं और राम की क्या दशा हुई?
[राम] लक्ष्मणजी से बोले– “भाई! मैं बहुत अपवित्र व्यक्ति हूँ। मैं दशरथनन्दन हूँ, [उस कुल से हूँ,] जिसमें मर्यादा का पालन [होता है।] आज मैंने मर्यादा को भङ्ग कर दिया। एक किशोरी लड़की के प्रति मेरी भावना ऐसी क्यों हुई?”
लक्ष्मणजी ने समझाया– “मैं आपको जानता हूँ। आपके द्वारा कभी भी मर्यादा की हानि नहीं हो सकती है। आप [कभी भी] लोक-व्यवहार के प्रतिकूल नहीं कर सकते। मुझे तो ऐसा ज्ञात होता है कि ये ही आपकी पत्नी बनेंगी, अतः मर्यादा भङ्ग नहीं हुई है।”
अब थोड़ी देर के बाद में महाराज जनक की प्रतिज्ञा के अनुसार में बड़े-बड़े महाराज, अधिराज सब आये और धनुष उठाना चाहा किन्तु उठा नहीं सके। एक साथ में सहस्र लोग, हजारों बड़े-बड़े राजा लोग मिल करके उसे नहीं उठा सके, जिस धनुष को सीताजी बायें हाथ से उठा करके और दायें हाथ से लीप, पोंछ करके उसको रख देती थीं। इसलिये महाराज जनक ने प्रतिज्ञा की थी कि जो इस धनुष को उठा करके प्रत्यञ्चा चढ़ा सकेगा, उसीके साथ में हम अपनी वीर, परमधार्मिक बेटी का विवाह करेंगे। कोई उठा नहीं सका। और उस समय राम ने सहज सिंहशावक की भाँति मृदुल गति से झूमते हुए आ करके एक सेकण्ड के अन्दर में धनुष को उठाया और चाप जब चढ़ाने लगे तो वह टूट गया। इसके बाद में स्वयंवर में हजारों लाखों राजकुमार आये और मैंने तो प्रेम में गद्गद हो करके उनके गले में हार दे दिया।
[सीताजी को] वह दृश्य सब [स्मरण हो] आया। कैसे [उनके गले में हार] दे रही हूँ। सखियों ने उनके हाथ को पकड़ करके रामचन्द्रजी के गले में डाला। विवाह हुआ। जनकपुर [से अयोध्या] में आये। ये सब चीजों का स्मरण करते-करते [सीताजी की] आँखों में आँसू आ रहे हैं।
अच्छा वह स्मरण करेंगे तो उस समय आनन्द कितना होगा? किन्तु ये विरह है। तो विरह में भी एक आनन्द है क्योंकि भगवान् की लीलाएँ चिन्मय होती हैं। चिन्मय होने पर क्या होता है? कभी भी विच्छेद नहीं होता किन्तु फिर भी विच्छेद जैसा लगता है। यही– मिलन में ये विरह ही ‘मादनाख्या महाभाव’ है, जो केवल राधिका के अन्दर में होता है। कृष्ण उसी लोभ से श्रीचैतन्य महाप्रभु के रूप में आते हैं। यहाँ पर ब्रजवासियों के जो दुःख की बातें बतलायी गई हैं, उसीके अनुरूप में उनको भीतर से कुछ विरह में आनन्द भी है। वहाँ पर गोपियाँ, श्रीमती राधिकाजी प्रेम में विवश हो करके विरह में मूर्च्छित हो जाती हैं। उस समय कृष्ण के साथ में सारी ब्रज की लीलाएँ उनको याद आती हैं– रहना, बोलना, कृष्ण का उनको मनाना, मान भञ्जन करना– सभी याद आता है और फिर जब वह समाधि टूट जाती है तो फिर रोने लगती हैं।
इस तरह का ये हमारे सनातन गोस्वामीजी इन दोनों विरह और मिलन के स्वरूपों को प्रकरण स्वरूप में उपस्थित कर रहे हैं। गोपियों का विरह कैसा है? साधारण व्यक्ति कैसे करेगा? वह इस पद्मावती के दृष्टिकोण से विचार करेगा और दूसरे इन गोपियों का अनुसरण करेंगे। बस इतना ही।
[71:29-81:55 तक किसी भक्त के द्वारा श्रील गुरुदेव की हरिकथा का अंग्रेजी भाषा में अनुवाद...]
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: मैं कल सवेरे चिकित्सक (doctor) को दिखलाने के लिए दिल्ली जा रहा हूँ। इसलिये कल मैं यहाँ नहीं लौट सकता, परसों लौटूँगा।
Tomorrow I am going to Delhi and I may return the day after. So you can continue this Katha.
एक कीर्तन सुनाओ।
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