Glories of Giriraja Govardhana & Paitha-gaon Lila and Sri Brhad-bhagavatamrtam: How to Practice Devotion
49:26This audio is included in the following series of lectures:
Topics
- Paitha is an important place in our sampradaya because it was established here that only Radharani is superior most than other gopis; Krsna exhibited himself in caturbhuja form here.
- There is an eitha-kadama (kadama-tree) which represents that Radharani does mana without any reason; now this tree has shrunk a lot.
- There is syamaghata, one and a half miles away from Paitha where Krsna used to drink buttermilk using the leaves of the trees by joining them.
- Sri Brhad-bhagavatamrtam 1.7.146-156 - Benedictions received by Narada Muni.
- There are many rasamayi and gopaniya lilas performed in Govardhana.
- We should pray to Govardhana to make us the dasi of Radharani; for this, we should try not to become namaparadhi, vaisnava-aparadhi and should not do ninda.
- One can do bhajana only if one is humble.
Transcript
गिरिराज गोवर्धन की महिमा, पैठा ग्राम की लीला तथा श्रीबृहद्भागवतामृतम् : भजन करने की विधि
[श्रील भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराज ने 20 अक्तूबर, 2003 को गोवर्धन में यह हरिकथा कही थी।
नोट: इस प्रतिलेखन में निम्नलिखित सम्पादकीय योगदान हैं: कुछ स्थानों पर भाषा को थोड़ा सम्पादित किया गया है, समाप्ति-नोट्स (endnotes) जोड़े गये हैं और विषय-वस्तु के प्रवाह और बोधगम्यता को सुविधाजनक बनाने के लिए वर्गाकार कोष्ठकों (square brackets) में अतिरिक्त पाठ सम्मिलित किया गया है। इसका शाब्दिक प्रतिलेखन शीघ्र ही उपलब्ध होगा।
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श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: हम लोग जब वृन्दावन से आ रहे थे तो रास्ते में पैठा [ग्राम] देखा। पैठा में हमारे सम्प्रदाय का एक विशेष स्थल है। ‘राधाजी गोपियों में सर्वश्रेष्ठ हैं’ – वहाँ पर (उस जगह में) यह प्रमाणित हुआ है। अन्य [गोपियों] को देख करके कृष्ण का चतुर्भुज [रूप] लुप्त नहीं हुआ, वे द्विभुज नहीं हुए किन्तु राधाजी को देखते ही उनकी दो भुजाएँ भीतर में चली गयीं।
पैठा में एक और चीज थी, हमने दिखलायी नहीं, क्योंकि समय कम था। वहाँ पर ऐंठा कदम्ब है। ऐंठा कदम्ब माने क्या? एक कदम्ब वृक्ष है जो ऐंठा हुआ है। जैसे राधिकाजी ऐंठ जाती हैं, उसी तरह से कदम्ब अर्थात् राधाजी ही कदम्ब हो गयीं और ऐंठी हुई हैं। तात्पर्य यह है कि राधाजी कदम्ब वृक्ष हैं और मतलब हो या बेमतलब हो, कारण हो या बिना कारण हो– राधिकाजी ऐंठ जाया करती हैं, मान धारण कर लेती हैं। तो उस जगह का कदम्ब वृक्ष भी टेढ़ा, वक्र और ऐंठा हुआ रहता है। इसलिये अभी भी वह पेड़ है।
भक्त: गोवर्धन में?
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: गोवर्धन में नहीं, [वह कदम्ब वृक्ष] पैठा में है, जो अभी भी ऐंठा हुआ है। पहले [वह वृक्ष] बहुत ऊँचा था, किन्तु अब वह सूख गया है और उसमें केवल छह-सात हाथ बाकी है। [यदि] अगले वर्ष [आप लोग] यहाँ होंगे तो हम दिखलायेंगे।
अभी आज आप लोग गोविन्दकुण्ड से पूँछरी होते हुए गये।
भक्त: राघव पण्डित की गुफा
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: वहाँ गये थे? और वहाँ से फिर हम लोग सुरभिकुण्ड में गये और मैं आप लोगों को छोड़ करके आप लोगों को दिखलाने के लिए, कुछ देखने के लिए चला गया। पूँछरी से लगभग एक-डेढ़ मील [अथवा] 2 किलोमीटर दूर श्यामढ़ाक एक स्थान है, तो मैं वहाँ गया था। वहाँ पर हम एक बार बहुत पहले गुरुजी के साथ भी गये थे। वहाँ पर कदम्ब के हजारों पेड़ थे किन्तु आजकल लुप्त हो रहे हैं, इने-गिने बहुत कम रह गये हैं। तो भी अभी लगभग 150-200 [कदम्ब वृक्ष] होंगे। तो वहाँ के पत्तों में ढूँढ़ने में ऐसा होता है कि दोना अपने आप लग जाता है और कृष्ण उसीमें छाछ पीते थे। हमारे रघुनाथदास गोस्वामी भी छाछ पिये थे। तो हम लोग ढूँढ-ढ़ाँढ करके एक पत्ता लाये हैं। इसको कहते हैं दोना।
कदम्ब वृक्ष की जय हो!
O! You should tell. Where is he? Why are you here? You should tell [what is this Kadamba leaf?]
[सबको बताओ कि] ये कदम्ब का क्या है?
ये एक छोटा [दोना] है, एक बड़ा है। दोनों दोने हैं। देखो और सब [पत्ते] तो सीधे हैं और ये कटोरी की तरह ऐसा [गोल] है। इसीमें छाछ ले करके कृष्ण पीते थे, खाते थे।
[6:14-8:37 तक किसी भक्त के द्वारा श्रील गुरुदेव की हरिकथा का अंग्रेजी भाषा में अनुवाद]
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज:
I will keep it in Ṭhākur’s mandira (temple), and those who are in the rear line, they can also take darśana of the leaf. How Kṛṣṇa, naturally in the forest, where no pot is there to take chācha (buttermilk), but Mother Yaśodā used to send chācha and all other things for Kṛṣṇa in the midday. Oh! Kṛṣṇa was taking all these very big big [leaves], and Kṛṣṇa used to take anna, ḍāl, caṭnī, sabjī, pakaurī, rasamalāi, and so many things, and he used to keep (9:21 inaudible) and they used to take.
[मैं इसे ठाकुरजी के मन्दिर में रखूँगा और जो लोग पीछे की पंक्ति में हैं वे भी पत्तों के दर्शन कर सकते हैं। वन में जहाँ कोई पात्र नहीं है, कैसे कृष्ण वहाँ पर स्वाभाविक रूप से इन दोनों में छाछ लेते थे। यशोदा मैया कृष्ण के लिए दोपहर में छाछ और अन्य सभी भोजन-सामग्री भेजती थीं। ओह! कृष्ण वन में ये सब बड़े-बड़े पत्ते लेते थे। कृष्ण अन्न, दाल, चटनी, सब्जी, पकौड़ी, रसमलाई और बहुत-सी वस्तुएँ लेते थे और इन दोनों में रखकर ग्रहण करते थे।]
गौरप्रेमानन्दे! हरि हरि बोल!
इसको ठाकुरजी के घर में दे दो और उसको एक थाली में सामने रख देंगे। दो हैं –एक छोटा, एक बड़ा। लोग दर्शन करेंगे। देकर आ जाओ।
Now come with me in Dvārakā—Nārada Ṛṣi, Kṛṣṇa, Satyabhāmā, Rukmiṇī, Devakī Maiyā, Vasudeva Mahārāja, and all the parikaras of Kṛṣṇa are there.
[अब मेरे साथ द्वारका आओ—नारद ऋषि, कृष्ण, सत्यभामा, रुक्मिणी, देवकी मैया, वसुदेव महाराज और कृष्ण के सभी परिकर वहाँ हैं।]
वहाँ पर कृष्ण के सभी परिकर और नारद ऋषि हैं। कृष्ण ने नारद ऋषि से दो वर माँगने के लिए कहा और [नारद ऋषि ने] दोनों वर माँगे। [उन्होंने] एक वर में [माँगा कि] “विश्व में जहाँ-जहाँ विचरण करूँ, सर्वत्र मैं प्रधान (मुख्य) कृष्णनाम का कीर्तन करूँ। मैं मधुर से मधुर [अर्थात्] मधुरतम कृष्ण नाम का कीर्तन करूँ।”
जगन्नाथ, परमात्मा, ब्रह्म, अल्लाह, खुदा – ये सब जो नाम हैं, गौण नाम हैं, मुख्य नाम नहीं हैं। मुख्य नाम क्या हैं? राम, नारायण, नृसिंह – ये सब भगवान् के मुख्य नाम हैं। ये मधुर नाम हैं किन्तु इन मधुर नामों से भी मधुरतम नाम कौनसा है? कृष्ण के ब्रजलीला सम्बन्धी नाम [इनसे भी] मधुर हैं। गोपीकान्त, राधाकान्त, रासबिहारी, वंशीधर, मुरलीधर – ये सब [नाम मधुरतम हैं।] और इन सब नामों में भी ‘राधिकारमण’ – ये मुख्यतम में भी और मुख्यतम मधुर नाम है।
“इन नामों का मैं गान करते हुए उन्मत्त हो करके सारे विश्व में विचरण करूँ” – यह [नारद ऋषि ने] पहला वर [माँगा] और दूसरा वर क्या [माँगा?] “जो लोग अपनी किसी भी इन्द्रिय से– चाहे आँख से देखकर, [चाहे] कान से सुनकर, चाहे शरीर से स्पर्शकर अथवा नाक से घ्राणकर– गोपियों सम्बन्धित इन लीलाओं को जो कि हमने वर्णन किया कि गोपियों का कृष्ण के प्रति कैसा प्रेम है? अद्वितीय (unparalleled) प्रेम है, सीमारहित और कोई साम्यरहित– ऐसा गोपियों का जो प्रेम है, उसमें भी राधाजी का विशेष (special) जो मधुरभाव है, उसको स्पर्श करेगा, उन लीलाओं को कान से सुनेगा, उन लीला-स्थलियों को स्पर्श करके आँख से देखेगा, तो यदि अपराध नहीं है– वैष्णव-अपराध, गुरु-अपराध तो उसे उन लीलाओं की स्फूर्ति हो जाये। उसका जीवन सफल हो। उसे वैसा ही प्रेम हो।”
कृष्ण बड़े प्रसन्न हुए और दक्षिण हाथ बाहर करके प्रसन्न हो करके बोले– “एवमस्तु, एवमस्तु, एवमस्तु। ऐसा ही हो, ऐसा ही हो और ऐसा ही हो।”
[13:17-15:17 तक किसी भक्त के द्वारा श्रील गुरुदेव की हरिकथा का अंग्रेजी भाषा में अनुवाद]
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: तत्पश्चात् नारद मुनि भगवान् से वर पा करके आनन्द के समुद्र में डूब गये और नृत्य करने लगे। [उन्होंने बड़े प्रसन्न] हो करके ऐसा कहा– “जय हो! नन्दनन्दन तेरी जय हो! जय हो! यशोदानन्दन तेरी जय हो!”
पीछे श्रीकृष्ण और बलदेव विविध प्रकार के पेय और परमान्न, चटनी, रसमलाई तरह-तरह की चीज पकोड़े, सन्देश... सन्देश नहीं, वह बङ्गाल में महाप्रभु खाते थे। कृष्ण को ये नहीं मिलता।
भक्त: वह मिला नहीं था, इसलिये [कृष्ण] बङ्गाल चले गये।
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: रसाला, सरपुरी-चिरपुरी, [घेवर, फेनी] ये सब खा रहे हैं।
कृष्ण उस समय [ब्रज में] छोटे बच्चे होने पर भी कैसे हैं? (16:49 अस्पष्ट) [सर्वशक्तिमान भगवान् हैं।] वे विश्व-ब्रह्माण्ड की सब चीजों को भी खा सकते हैं।
[द्वारका में] देवकी मैया और रोहिणी मैया [कह रही हैं]– “अरे बेटा! ये खा लो। ये मैंने बनाया है। देखो, ये मैंने बनाया है। ये बहुत रसाला है। ये बहुत सुन्दर, स्वादिष्ट (tasteful) है। ये खा लो।” रुक्मिणी और सत्यभामा पंखे झल रही हैं क्योंकि अभी [भोजन] गर्म आया है ना? तो ऐसे-ऐसे [लीलाएँ हो रही हैं।]
उन्होंने पंखा (fan) नहीं लगा दिया कि जो बहुत जोर से चल रहा है, या स्वयं चलता नहीं है या [केवल] एक समान गति से [ही चलता रहे।] ये (रुक्मिणी और सत्यभामा) जब जैसी आवश्यकता है, पंखे से [भोजन को] झल रही हैं। कभी-कभी कृष्ण के लिए भी चला लेती हैं [अर्थात् आवश्यकतानुसार पंखा झल लेती हैं और] बड़े प्रेम के साथ में खिलाने लगीं।
उस समय भोजनकाल में उद्धवजी कह रहे हैं– “ये रसमलाई है। बहुत मीठी है। तुमको तो बहुत अच्छी लगती है।” और कृष्ण इङ्गित से रुक्मिणी, सत्यभामा को कह रहे हैं जो परिवेशन कर रही हैं– “ये नारद बाबा को दे दो।” [कृष्ण] स्वयं भी खा रहे हैं और बलदेवजी और दूसरों को भी खिला रहे हैं। भोजन करने के बाद में वहाँ पर ताम्बूल-वीटिका, इलायची, कर्पूर, लवङ्ग इत्यादि ले करके मुखशुद्धि की। जैसे भक्तिविनोद ठाकुरजी ने वह कहा है– “‘जाम्बुल’ ‘रसाल’ आने ताम्बूल-मसाला”
तो ये सुन्दर-सुन्दर माला लाये। वह कृष्ण और बलदेवजी को पहनाया और कृष्ण, बलदेवजी ने नारदजी को पहना दिया।
नारदजी भक्तिरसलम्पट हैं—भक्तिरस के लम्पट! और हम लोग [जड़]रस के, हम लोग काम (lust) के लम्पट हैं। नारदजी किसके लम्पट हैं? भक्तिरस के लम्पट हैं। इसके बाद में वे मुनियों को कृतार्थ करने के लिए प्रयाग [चले गये। मुनिगण] प्रयाग में उनके लिए अभी तक प्रतीक्षा कर रहे हैं। अच्छा, ये कितना समय लगा? जितना भी समय लगा हो। हम लोगों के विचार से तो ये कितने हजारों, लाखों, कोटि वर्ष लग जायेंगे? किन्तु नारदजी मन के वेग से चलते हैं न? और (19:29 अस्पष्ट) हैं। हो सकता है कि 2-4 महीना लग गया हो।
मुनिलोग प्रयाग में [नारदजी की] प्रतीक्षा कर रहे थे। [नारदजी] द्वारका से माधवजी का आदेश ले करके प्रयाग में आये और [वहाँ मुनियों की सभा में,] जो भक्ति-माहात्म्य उन्होंने इतने दिनों तक अनुभव किया था, [उसका वर्णन किया।] क्या [वर्णन किया?]—किस प्रकार हनुमान से पाण्डव लोग [श्रेष्ठ हैं,] पाण्डवों से द्वारकावासी, द्वारकावासियों में उद्धव, उद्धव से भी नन्द-यशोदा, उनसे भी अधिक [श्रेष्ठ] गोपियाँ, उन गोपियों में भी चन्द्रावली और राधिका, उनमें भी [श्रीमती राधिका श्रेष्ठ हैं।] श्रीमती राधिका का प्रेम और उनका विरह किस प्रकार का है—नारदजी ने जो कुछ [स्वयं] अनुभव किया और जो [कुछ] कृष्ण से भी सुना, उन सबका वर्णन किया।
वे ऋषि कैसे थे? सारग्राही– सार को ग्रहण करनेवाले थे। नारदजी के मुख से भक्ति का माहात्म्य सुन करके कर्म और ज्ञान को दूर कर दिया। [उन्होंने] सम्पूर्ण रूप से कर्म, ज्ञान, योग, तपस्या, व्रत, होम, स्वाध्याय, संयम– सबको दूर कर दिया और दूर करके जैसे नारदजी ने कहा, नारदजी के विचार के अनुसार में, नारदजी के वचनानुसार मनोनिवेशकर भजन करने लगे। वे राधाकृष्ण अर्थात् मदनगोपाल, गोपीनाथजी का भजन करने लगे।
अब [परीक्षित् महाराजजी] कहते हैं– “हे माता! अरी मैया! अब जो कुछ कथा है, मैं आपको उसका सार बतला रहा हूँ। आप भी गोपियों के दास्य की कामना करके– “गोपियों की दासी होऊँ” – इसकी कामना करके [गोपकिशोर का भजन करें।”] यह बहुत मुख्य वस्तु है।
“हे माता! आप ये मत समझिये कि मैं कृष्ण की पुत्रवधू हूँ। ये मत समझिये, भूल जाइये। होने से भी आपकी महिमा खर्व (कम) नहीं होगी, मर्यादा नष्ट नहीं होगी कि पुत्रवधू कैसे, किस प्रकार से उनको अपना प्रियतम माने? गोपियों का भाव कैसे लाये? भूल जाओ। और भूल करके क्या समझो? गोपियों की दासी का लक्ष्य रख करके कि गोपियों ने प्रेम और विरह के साथ में जैसे कृष्ण की सेवा की थी, उन रासरासेश्वर कृष्ण, किशोरशेखर कृष्ण की वैसे ही प्रेमभक्ति करो। कैसे करो? नाम-संकीर्तन के माध्यम से।” कैसे नाम-संकीर्तन के माध्यम से करें?
हे कृष्ण! करुणासिन्धो! दीनबन्धो! जगत्पते!
गोपेश! गोपिकाकान्त! राधाकान्त! नमोऽस्तु ते॥
[हे करुणासिन्धो! हे दीनबन्धो! हे जगत्पते! हे गोपेश! हे गोपीकान्त! हे राधावल्लभ! श्रीकृष्ण! प्रभो! आपके लिए मेरा कोटिशः प्रणाम है।] GVP
ऐसे–
प्रमदमदनलीलाः कन्दरे कन्दरे ते
रचयति नवयूनोर्द्वन्द्वमस्मिन्नमन्दम्।
इति किल कलनार्थं लग्नकस्तद्द्वयोर्मे
निज-निकट-निवासं देहि गोवर्धन! त्वम्॥
-श्रीगोवर्धनवासप्रार्थनादशकम् (2)
[हे गोवर्धन! आप, मुझको अपने निकट ही निवास प्रदान कीजिये; क्योंकि नवयुवकस्वरूप श्रीराधाकृष्णकी युगलजोड़ी, आपकी प्रत्येक कन्दरामें, हर्षप्रद प्रेममयी लीलाओं को विशेषरूप से करती रहती हैं। मैं, उन दोनों की लीलाओं को देखने के लिए मध्यस्थ बनना चाहता हूँ।] GVP
हे गिरिराज-गोवर्धन! मैं आपकी शरण में आया हूँ। हम गोपियों की दासी बनने के लिए आपके चरणों में आये हैं। आप प्रमदमदन-लीला के साक्षी हैं। प्रमदमदन-लीला आपकी कन्दराओं में, गुफाओं में और कुञ्जों में हुई थीं—जो कुञ्ज इधर-उधर हैं, [किन्तु] आजकल लोग उन्हें ढूँढ़ नहीं पाते हैं। तो ऐसे ही हम [उन लीलाओं का दर्शन करना चाहते हैं।] आप साक्षी हैं, उसी वस्तु के लिए मैं आया हूँ, [किन्तु मेरी] कुछ भी [योग्यता] नहीं है। योग, ज्ञान, तपस्या, व्रत, होम– कुछ नहीं है। हम साधु भी नहीं हैं। हम साधुत्व [इत्यादि] कुछ भी नहीं चाहते। हम जैसे भी हैं, “गोपियों की दासी होऊँ” – यही वर आप हमको प्रदान कीजिये और जैसे आप [उन लीलाओं के] साक्षी हैं और अनुभव किये हैं, ऐसे ही हम लोग भी कर सकें।
और कैसे? जैसे–
स्मरविलसिततल्पे जल्पलीलामनल्पां
क्रमकृतिपरिहीनां बिभ्रती तेन सार्धम्।
मिथ इव परिरम्भारम्भवृत्त्येकवर्ष्मा
क्षणमपि मम राधे नेत्रमानन्दय त्वम्॥
-श्रीराधिकायाः प्रेमपूराभिधस्तोत्रम् (4)
[हे राधिके! कन्दर्प विलास शय्या पर श्रीकृष्ण के साथ अतिशय क्रमशून्य हास्य परिहासमय लीला के अनुभव में एक दूसरे के अङ्ग आलिंगन के आरम्भ में समुत्सुक होकर क्षण काल भी दर्शन देकर तुम मेरे नयनों को आनन्द प्रदान करो।]
हे राधे! हमारे ऊपर में [दया करो।] तुम्हारी दया के अतिरिक्त मैं जीवित नहीं रह सकता। तुम हमारे ऊपर में दया करो। ‘स्मरविलसिततल्पे’– जब कृष्ण तुम्हारे साथ में शैय्या पर बैठेंगे, पुष्प-शैय्या पर बैठेंगे, तो ‘जल्पलीलामनल्पां’– [तुम] इधर-उधर की बेकार की बातें [करोगी,] जिनका कोई सिर (मुण्ड) और हाथ नहीं है। उनसे ऐसी बातें करते हुए आप प्रेम में मग्न हो जायेंगी और ‘क्रमकृतिपरिहीनां बिभ्रती तेन’– क्रमहीना निरन्तर उनके साथ में विलास करती हैं। [राधाजी] कृष्ण [से पूछती हैं–] “वह क्या है?” [उनकी बातों का] कोई माथा (मुण्ड) नहीं और कृष्ण वैसे ही,उत्तर दे रहे हैं। यह स्वाधीनभर्तृका [नायिका] का लक्षण है। ऐसे में राधाजी की कब कृपाकटाक्ष होगी कि राधाजी आप हमारे ऊपर में कृपा करें।
और कैसे?
क्वचन च दरदोषाद्दैवतः कृष्णजाता-
त्सपदि विहितमाना मौनिनी तत्र तेन।
प्रकटितपटुचाटुप्रार्थ्यमानप्रसादा
क्षणमपि मम राधे नेत्रमानन्दय त्वम्॥
-श्रीराधिकायाः प्रेमपूराभिधस्तोत्रम् (8)
[हे राधे! किसी समय दैववशतः श्रीकृष्ण के अतिअल्प दोष दर्शन से तुम तत्क्षणात् मानिनी होकर मौन धारण कर लोगी, तब श्रीकृष्ण विविध प्रकार के चाटुवाक्यों द्वारा तुम्हारी प्रसन्नता के निमित्त प्रार्थना करेंगे– उस अवस्था में क्षण काल भी दर्शन देकर मेरे नयनों को आनन्द प्रदान करो।]
‘क्वचन च दरदोषात्’– कृष्ण ने दोष किया। दोष तो नहीं, दोष की भाँति [किया।] किसलिये? राधाजी का वाम्यभाव आस्वादन करने के लिए जानबूझ करके कह दिया कि चन्द्रावली, तू कैसी है? बस इतना ही कहा था कि [राधाजी] ने मान कर लिया। ‘दरदोषात्’ राधाजी ऐंठ गयीं। उस समय कृष्ण हाथ जोड़ करके चाटु-पटु प्रणय प्रकाश की बातें करते हुए उनको रिझाने लग गये। ऐसी राधाजी क्षणमात्र के लिए भी हमारे ऊपर में कृपा करें।
फिर राधाकृपाकटाक्ष का अन्तिम [श्लोक] क्या है?
भक्त: मखेश्वरि
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज:
मखेश्वरि क्रियेश्वरि स्वधेश्वरि सुरेश्वरि
त्रिवेद-भारतीश्वरि प्रमाण-शासनेश्वरि।
रमेश्वरि क्षमेश्वरि प्रमोद काननेश्वरि
व्रजेश्वरि व्रजाधिपे श्रीराधिके नमोऽस्तुते॥
-श्रीराधाकृपाकटाक्ष-स्तवराज (12)
[सब प्रकारके यज्ञों की आप स्वामिनी हैं, सम्पूर्ण क्रियाओं की अधीश्वरी हैं, स्वधादेवी की स्वामिनी हैं, सभी देवताओं की ईश्वरी हैं; ऋक्, साम और यजु—इन तीनों वेदों की वाणियों की स्वामिनी, प्रमाण शासन–शास्त्र की स्वामिनी, श्रीरमादेवी की अधीश्वरी, श्रीक्षमादेवी की भी स्वामिनी, प्रमोद-कानन की ईश्वरी (वृन्दावनेश्वरी) आप ही हैं; हे ब्रजेश्वरी! हे व्रजकी अधिष्ठात्री श्रीमती राधिके! आपको मेरा बारम्बार प्रणाम है।] GVP
ये सब प्रार्थनाएँ होंगी। ये भजन होता है। नहीं तो वैष्णवों की निन्दा करते हैं, वैष्णवों से झगड़ा करते हैं। तो ये सब कथाएँ कहाँ से सुनेगा? रे मूर्ख! अपराधी! धामापराधी भी! नामापराधी भी! वैष्णव-अपराधी भी! – सब कुछ है और समझता क्या है?– “हम लोग सबसे अधिक समझते हैं, हम समझदार, बूझदार, लायक हैं और हरिनाम करते हैं।” वह नाम क्या है? घोर नामापराध ही किया। इसलिये आप लोग बस बच करके [चलो।] किसी की निन्दा-वन्दना न करते हुए भगवान् का भजन करो, ऐसी-ऐसी [स्तव-स्तुतियाँ करो।]
और भी कैसे?
फुल्लेन्दीवर-कान्तिमिन्दु-वदनं बर्हावतंसप्रियं
श्रीवत्साङ्कमुदार-कौस्तुभधरं पीताम्बरं सुन्दरम्।
गोपीनां नयनोत्पलार्चित-तनुं गोगोप-संघावृतं
गोविन्दं कलवेणु-वादनपरं दिव्याङ्गभूषं भजे॥
-श्रीपद्यावली (46)
[जिनकी अङ्गकान्ति विकसित नीलकमल के समान है, जिनका मुख चन्द्र के समान है, जिनके सिरपर मयूर-पङ्ख सुशोभित है, वक्ष:स्थलपर श्रीवत्स का चिह्न है, हृदय में कौस्तुभमणि है और जो सुन्दर पीताम्बर धारण किए हुए हैं, गोपियाँ अपने नेत्रकमलों से जिनका अर्चन करती हैं, जो गो-गोप के द्वारा आवृत हैं और वेणुनाद कर रहे हैं तथा जिनके दिव्य अङ्गोंमें आभूषण सुशोभित हैं, ऐसे गोविन्दका मैं भजन करता हूँ।] IGVP
यह कृष्ण के लिए है। गोपियाँ अपने नयनों के उत्पल से [अर्थात्] नयनरूपी कमल से आपकी आरती उतारती हैं और आप उसको ग्रहण करते हैं। ‘फुल्लेन्दीवर’– फुल्ल+इन्दी+वर [अर्थात्] [विकसित] कमल के समान [जिनकी कान्ति है।]
वेणुं करान्निपतितः [#1]
अच्छा सुनो, और सुनो।
बर्हापीडाभिरामं मृगमद-तिलकं कुण्डलाक्रान्तगण्डं
कञ्जाक्षं कम्बुकण्ठं स्मित-सुभग-मुखं स्वाधरे न्यस्तवेणुम्।
श्यामं शान्तं त्रिभंगं रविकर-वसनं भूषितं वैजयन्त्या
वन्दे वृन्दावनस्थं युवतिशतवृतं ब्रह्म गोपाल-वेशम्॥
[जो मयूरमुकुट से सुशोभित हैं, जिनके विशाल ललाटपर कस्तूरी-केसर मिश्रित चन्दन का तिलक विराजमान है, जिनके इन्द्रनीलमणि के दर्पणों के दर्प को चूर्ण करनेवाले दोनों मनोहर कपोलों में मकराकृति कुण्डलों की परछाई पड़ रही है, विकसित सितकमल के से जिनके नयन-युगल हैं, शङ्ख के समान उतराव-चढ़ाववाली जिनकी ग्रीवा है, मन्द मुस्कानयुक्त मुखारविन्द है, बिम्बफल सदृश अधरपर जिन्होंने वेणु स्थापित कर रखी है, जो स्वतः नूतन जलधर समान श्यामवर्ण हैं, शान्त हैं, सूर्य की किरणों के समान देदीप्यमान पीताम्बर धारण किये हुए हैं, वैजयन्तीमालासे विभूषित हैं और सैकड़ों गोपियों से जो चारों ओर से घिरे हुए हैं, ऐसे श्रीधाम वृन्दावनस्थ गोपाल वेशधारी परब्रह्म की मैं वन्दना करता हूँ।] IGVP
कस्तूरीतिलकं ललाटपटले वक्ष:स्थले कौस्तुभं
नासाग्रे वर-मौक्तिकं करतले वेणुः करे कङ्कणम्।
सर्वाङ्गे हरिचन्दनं सुललितं कण्ठे च मुक्तावली
गोपस्री-परिवेष्टितो विजयते गोपालचूड़ामणि:॥
-श्रीगोपाल-सहस्रनाम स्तोत्रम् (28)
[हे श्रीकृष्ण! आपके मस्तकपर कस्तूरी-तिलक सुशोभित है, वक्ष:स्थलपर देदीप्यमान कौस्तुभमणि विराजित है, नासिका के अग्रभाग में श्रेष्ठ मोती पहना हुआ है, हाथ में वेणु विराजमान है और कलाई में कङ्गन धारण किए हुए हैं। हे हरि! आपकी सम्पूर्ण देहपर सुगन्धित चन्दन लगा है और सुन्दर कण्ठ मुक्ताहार से विभूषित है, सेवारत गोपियों से परिवेष्टित हे गोपाल! आपकी जय हो।] IGVP
वंशीन्यस्तास्यचन्द्रं स्मितयुतमतुलं पीतवस्त्रं वरेण्यं
कञ्जाक्षं सर्वदक्षं नवघनसदृशं वर्हचूडं शरण्यम्।
त्रैभंगर्भङ्गिमांगं व्रजयुवतियुतं ध्वस्तकेश्यादिशूरं
वन्दे श्रीनन्दसूनुं मधुररस-तनुं धुर्य-माधुर्य-पूरम्॥
[मैं श्रीनन्दनन्दन की वन्दना हूँ, जो अपने अधरों पर वंशी धारण किये रहते हैं, जिनकी मृदु मुस्कान से अतुलनीय तेज निकलता है, जो उत्तम पीतवस्त्र पहने रहते हैं, जिनके नेत्र कमल के समान हैं, जो सभी कलाओं में निपुण हैं, जिनका शरीर नवीन मेघ के समान है, जिनके सिर पर मोर पंख का मुकुट सुशोभित है, जो शरणागतों के लिए आश्रय हैं, जो त्रिभङ्गललित मुद्रा में खड़े हैं, जो ब्रजयुवतियों से घिरे हुए हैं, जो केशी तथा अन्य असुरों को वश में करते हैं, जो अनन्त मधुररस के शिखर हैं तथा माधुर्यरस के साक्षात् स्वरूप हैं।]
ये भजन का स्वरूप है। दिन-रात ऐसे ही भजन में डूबा रहे।
ये सब भजन के तरीके हैं, तब तो भजन है, नहीं तो क्या भजन है? ऐसे ही भजन हो जाता है – “हरे कृष्ण हरे कृष्ण” भजन हो गया? [हरिनाम कर रहे हैं और चिन्तन कर रहे हैं–] “ये बड़ा बदमाश व्यक्ति है। वह ऐसा गड़बड़ कर दिया, वैसा कर [दिया।” तो भजन नहीं होता।]
अरे! [इन स्तव-स्तुतियों को करते-करते] कहाँ उसमें डूब गया, उसको पता नहीं। कृष्णचन्द्रजी पीछेसे आ करके स्तव सुन रहे हैं। राधाजी मुस्कुरा रही हैं। [उन्होंने] कृष्ण को देखा [और कहा–] “वाह! कैसा सुन्दर भजन, ये स्तव-स्तुति कर रहा है! अब इस पर कृपा ही कर दो।”
[कृष्ण ने कहा–] “थोड़ा ठहर जाओ। उत्कण्ठा तो बढ़ने दो।” (30:43 अस्पष्ट)
भक्त:
भजामि राधामरविन्दनेत्रां, स्मरामि राधां मधुर-स्मितास्याम्।
वदामि राधां करुणाभराद्रीं, ततो ममान्यास्ति गतिर्न कापि॥
-श्रीविशाखानन्ददाभिधस्तोत्रम् (131)
[मैं श्रीमती राधिका का भजन करता हूँ, जिनके नेत्र कमलके समान हैं, मैं श्रीमती राधिका का स्मरण करता हूँ, जिनका मुखारविन्द मन्द-मधुर-हास्य से युक्त है, मैं श्रीमती राधिका का गुणगान करता हूँ, जिनका हृदय करुणा से आर्द्र है। उनकी सेवा के अतिरिक्त मेरी अन्य कोई गति नहीं है।] IGVP
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: ऐसे कितने-कितने सब [कीर्तन] हैं! कितना गायेगा? दिन-रात कहते जाओ।
तो [परीक्षित् महाराजजी कह रहे हैं–] “हे माता! आप गोपियों के दास्य की कामना करके, गोपियों की दासी बनने के लिए प्रार्थना करते हुए नन्दकिशोरजी का उसी प्रकार से प्रेमभक्तिपूर्वक भजन करें।”
आजकल लोग ये सबकुछ अनुशीलन नहीं करते हैं। हम समझते हैं कि लाखों-करोड़ों में से ऐसा भजन करनेवाले विरले होंगे और उनको कोई समझ नहीं पायेगा। [उनको देख करके साधारण लोग कहते हैं–] “ये तो सांसारिक मनुष्यों जैसे खाते-पीते, सोते हैं।” – ऐसा सोचेंगे।
“[हजारों लोगों को लेकर] परिक्रमा कर रहे हैं। दिन-रात परिक्रमा [की व्यवस्था करने] में व्यस्त हैं। ये लोग भजन क्या जानें? रुपये के लिए ये ऐसा कर रहे हैं”– ये इनकी धारणा हैं। [ये लोग] नहीं समझेंगे कि [वैष्णव लोग] अपने हृदय की वस्तुओं को बाँटने के लिए [ऐसा विराट आयोजन] कर रहे हैं। उनको कदापि ज्ञान नहीं। [ये लोग] नहीं समझेंगे [कि वैष्णव लोग] कितने दयालु हैं कि ऐसे-ऐसे भाव जो श्रीमद्भागवत रूपी पिटारी के अन्दर में गुप्त हैं, उसको खोल करके ये दे रहे हैं।
[32:39-39:45 तक किसी भक्त के द्वारा श्रील गुरुदेव की हरिकथा का अंग्रेजी भाषा में अनुवाद]
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: [परीक्षित् महाराजजी कह रहे हैं–] “अरी मैया! मैं गोपियों की महिमा वर्णन करने के योग्य नहीं हूँ। जिस प्रकार एक मक्षिका (मक्खी) सुमेरु पर्वत को अपने मुख में ग्रहण नहीं कर सकती, उसी प्रकार मैं उनकी महिमा वर्णन करने के योग्य नहीं हूँ। अहो! मेरे गुरु कृष्णरस में आविष्ट हो करके श्रीकृष्ण और उनकी प्रिया रुक्मिणी, सत्यभामा का नाम करते हैं। उन्हीं के नाम का कीर्तन करते हैं, किन्तु कभी भी वे ब्रजगोपियों के नाम को मुख से उच्चारण नहीं करते।”
उनके गुरु कौन हैं? कौन कह रहा है? कौन?
भक्त: परीक्षित् महाराज
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: परीक्षित् जी। परीक्षित् जी को भागवत सुनानेवाले गुरु कौन हैं? शुकदेव गोस्वामी। थोड़ा समझो, बुद्धि लगाओ।
तो [शुकदेव गोस्वामी गोपियों का नाम उच्चारण] नहीं कर पाते। क्यों? अतिविलक्षण पराकाष्ठा प्राप्त प्रेमरूपी अनलशिखा (आग की शिखाएँ) जलने लगती हैं। गोपियों का नामकीर्तन करते ही विरह की आग धधकने लगती है—सारी कृष्ण की लीलाओं की विरह सूचक आग। गोपियाँ कैसे विरह में तड़प रही हैं?
हा नाथ रमण प्रेष्ठ क्वासि क्वासि महाभुज।
दास्यास्ते कृपणाया मे सखे दर्शय सन्निधिम्॥
-श्रीमद्भागवतम् (10.30.40)
[हा नाथ! हा रमण! हा प्रेष्ठ! हा महाभुज! तुम कहाँ हो! कहाँ हो! हे मेरे सखा! मैं तुम्हारी दीन-हीन दासी हूँ। शीघ्र ही मुझे अपने समीप ले लो, अपने दर्शन दो।] GVP
हे नाथ हे रमानाथ व्रजनाथार्त्तिनाशन।
मग्नमुद्धर गोविन्द गोकुलं वृजिनार्णवात्॥
-श्रीमद्भागवतम् (10.47.52)
[गोपियाँ मथुरा की ओर मुख करके दैन्य के साथ पुकारने लगीं– “हे प्यारे श्रीकृष्ण! हे हमारे प्राण-सर्वस्व! हे रमानाथ! हे ब्रजनाथ! हे दुःख-विनाशन! हे गोविन्द! आपके पिता-माता, ग्वालबाल, गौएँ, हम गोपियाँ – सारा ब्रजमण्डल दुःख के अपार सागर में डूब रहा है। हे नाथ! आप आयें, हमें बचायें और गोकुल का उद्धार करें (दूत भेजने से क्या प्रयोजन है?)] GVP
ये सब...
[परीक्षित् महाराजजी कह रहे हैं– “गोपियों का नाम उच्चारण करनेमात्र से ही मेरे गुरुजी] विरह में तड़पने लगते हैं और [उनको] छः महीने की समाधि लग जाती है। छः महीने तक उनको सुध-बुध नहीं रहती। इसलिये कभी भी ‘राधे! ललिते! विशाखे!’ नाम उच्चारण नहीं [कर पाते।”]
और हम तो दिनभर करते हैं और कुछ नहीं होता। कुछ होता ही नहीं है।
गोपियों का नाम करने से क्या [होता है?] गोपियों के हृदय में स्थित तीक्ष्ण प्रेमानल के कारण जो उद्दीप्त शिखाएँ उठती हैं, उनके स्पर्श से [शुकदेव गोस्वामी] विकल हो जाते हैं और छः महीने या एक वर्ष की मूर्च्छा ही लग जाती है। इसलिये [परीक्षित् महाराज] कहते हैं– “मैं [गोपियों की महिमा का वर्णन] नहीं कर सकता। जब मेरे गुरुजी नहीं कर सकते हैं, तो मैं क्या कर सकता हूँ?”
कारण क्या? वे दीन-हीनता से बतला रहे हैं। भजन दीन-हीन होने से [ही] होता है। रघुनाथदास गोस्वामी, रूप गोस्वामी, सनातन गोस्वामी जैसे उत्तम अधिकारी [सोचते हैं कि “मैं] दीन-हीन हूँ। ये सब भजन मुझसे कैसे सम्भव होगा!”
जितनी दीनता होगी, [उसका] एकदम वैष्णव-अपराध नहीं होगा। वह सरल-शान्त रहेगा और [अन्य भक्तों को देखकर] कहेगा कि “ये लोग भजन कर रहे हैं। इनके देखने से मेरे मुख में हरिकथा स्फूर्ति होती है।” इसलिये सबको आदर की दृष्टि से [देखेगा।] ये महान् पुरुषों का लक्षण है। वे किसी का दोष नहीं देखते। कोई [यदि इनके प्रति] अपराध भी करता है, तो ये अपराध की ओर नहीं देखते, ‘उसका भी कल्याण ही हो’–यही सोचते हैं।
[43:43-45:47 तक किसी भक्त के द्वारा श्रील गुरुदेव की हरिकथा का अंग्रेजी भाषा में अनुवाद]
श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: कल एकादशी तिथि है। (बङ्गला भाषा में) यदि घर में बैग में मालपुआ है तो खाना नहीं।
तो कल एकादशी है।
Tomorrow is Ekādaśī. You should observe [it properly] — especially, you should not take any grains or anything prepared from grains, by cāvala (rice), wheat, paddy, beans, corns and other such things — don’t use [them at all.] If you feel very hungry, you can take banana, apple, or other fruits. [But] do not take any grains. Even you should not give any [grains] to your children. There will be milk, curd, and so many other things are there and Premānanda Prabhu will prepare many things. So don’t worry. All of you should observe Ekādaśī.
[कल एकादशी है। आप सभी को विशेष रूप से इसका पालन करना चाहिये। विशेषकर, चावल, गेहूँ, धान, फलियाँ, दालें, मक्का और अन्न से बनी कोई भी वस्तु न लें। इनका सेवन बिल्कुल न करें। यदि बहुत भूख लगे, तो केला, सेब या अन्य फल ले सकते हैं, परन्तु अन्न बिल्कुल नहीं। यहाँ तक कि अपने बच्चों को भी अन्न से बनी कोई वस्तु न दें। दूध, दही और अन्य बहुत सी वस्तुएँ हैं, और प्रेमानन्द प्रभु बहुत कुछ स्वादिष्ट प्रसाद तैयार करेंगे — इसलिये चिन्ता की कोई बात नहीं। आप सभी को एकादशी का विधिपूर्वक पालन करना चाहिये।]
और दूसरी बात एकादशी के दिन हम लोगों की मानसीगङ्गा की परिक्रमा है। सर्वप्रथम हरिदेवजी [का दर्शन करेंगे]—जिस स्वरूप में कृष्ण ने गिरिराज-गोवर्धन को धारण किया था। पास ही में ब्रह्मकुण्ड, मानसीगङ्गा, पारङ्गघाट—जहाँ पर नौका-विलास लीलास्थली का वर्णन करते हैं, चकलेश्वर महादेव—जो कि इन [लीलाओं] में [प्रवेश करने की] योग्यता देंगे और पास ही में सनातन गोस्वामी की भजन कुटीर है। इन सबका दर्शन करेंगे। इसके बाद में हम लोग मुखारविन्द में आयेंगे। वहीं पर हम गिरिराज-गोवर्धन के मुखारविन्द का दूध से अभिषेक करेंगे।
We will do abhiṣeka of Śrī Girirāja Govardhana at Mukhāravinda with milk, yogurt (dahi), honey, and all these things. Tell Premānanda Prabhu to prepare everything. If you want to give something for that then you can give it to Mādhava Mahārāja, and [through] that we will manage so much milk, yogurt, honey, ghee, sugar and all other [things.] And then we will do kīrtana, parikramā, and ārati. You can take your ārati-dīpa and you will give this. Then we will come here and in the evening [there will be] our harikatha.
In the morning, after kīrtana, I will come and I will try to finish the rest of Dāmodarāṣṭakam. So you all must come. I will come and like this daily our kathā will go on.
[हम लोग गिरीराज गोवर्धन के मुखारविन्द में दूध, दही, शहद आदि से अभिषेक करेंगे। प्रेमानन्द प्रभु से कह देना कि सारी सामग्री की तैयारी कर लें। यदि आप इस सेवा में कुछ सामग्री देना चाहें, तो माधव महाराज को दे सकते हैं। हम उससे दूध, दही, शहद, घी, शक्कर और अन्य सभी आवश्यक वस्तुएँ व्यवस्थित कर लेंगे। इसके बाद हम कीर्तन, परिक्रमा और आरती करेंगे। आप सब आरती के लिए दीप ले आयें। फिर हम यहाँ वापस आयेंगे और शाम को हरिकथा होगी।
सुबह कीर्तन के बाद मैं आऊँगा और दमोदराष्टकम् शेष भाग पूरा करने का प्रयास करूँगा। आप सभी को आना चाहिये, मैं भी आऊँगा और इस प्रकार प्रतिदिन हमारी कथा चलती रहेगी।]
गौर प्रेमानन्दे।
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समाप्ति-नोट्स (Endnotes)
#1
वेणुं करान्निपतितः स्खलितं शिखण्डं
भ्रष्टं च पीतवसनं व्रजराज सूनोः।
यस्याः कटाक्ष शरघात विमूर्च्छितस्य
तां राधिकां परिचरामि कदा रसेन॥
-श्रीराधारससुधानिधि (39)
जिनके कटाक्ष-बाणों के आघात से ब्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्ण के हाथ से वेणु गिर जाता है, मोरपंख का चूड़ा स्खलित हो जाता है, अङ्गों से पीताम्बर भी गिर जाता है, यहाँ तक कि वे स्वयं मूर्च्छित हो जाते हैं, उन श्रीराधिकाजी की रसपूर्ण सेवा मैं कब करूँगा? (GVP)
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