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Srimad Bhagavatam Series- #22- Lord Baladeva Breaks the Pride of Romaharsana Suta, Glories of Hearing Bhagavatam, Story of Nrga and Sudama

42:17
#5808
Mathura
Lecture
Hindi
Srila Gurudeva 100%
Good

This audio is included in the following series of lectures:

Topics

  • Pilgrimages purify people, but how does the pilgrimage itself become purified?
  • Before appearing on Earth, Ganga Devi had the concern that 'If people wash their sins in me, I will become impure. How will I be purified?' Then Bhagiratha Maharaja said - "When sadhus visit for pilgrimage, they will purify you."
  • Reason for Baladeva Prabhu's pilgrimage - 1) to purify the tirthas 2) to kill Romaharsana Suta and appoint Ugrasrava Suta to the seat of Vyasa.
  • Vaisnavas should be tolerant
  • Method of hearing haikatha.
  • Pastime of King Nrga, how he was cursed and became a lizard and how Sri Krsna delivered him.
  • Character of Sudama and his wife.
  • Sudama went to Dvaraka on the advice of his wife.
  • Krsna did not deprive Sudama of devotion even after giving him money and opulence etc.

Transcript

श्रीमद्भागवत शृंखला–भाग 22: बलदेव प्रभु द्वारा रोमहर्षण सूत का अभिमान-खण्डन, भागवत-श्रवण की महिमा, नृग और सुदामाजी की कथा

[श्रील भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराज ने 5 मई 1994 को मथुरा में यह हरिकथा कही थी।
नोट: इस प्रतिलेखन में निम्‍नलिखित सम्पादकीय योगदान हैं: कुछ स्थानों पर भाषा को थोड़ा सम्‍पादित किया गया है, समाप्ति-नोट्स (endnotes) जोड़े गये हैं और विषय-वस्तु के प्रवाह और बोधगम्यता को सुविधाजनक बनाने के लिए वर्गाकार कोष्ठकों (square brackets) में अतिरिक्त पाठ सम्मिलित किया गया है। इसका शाब्दिक-प्रतिलेखन शीघ्र ही उपलब्ध होगा।

यदि आप प्रतिलेखन-सेवा में भाग लेने के लिए प्रेरित हैं, तो कृपया https://www.audioseva.com/register पर पञ्‍जीकरण करें।]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: आज हम लोगों [की श्रीमद्भागवत कथा] का दशम दिवस है। भगवत्-कृपा से हम लोगों का यह अनुष्ठान अभी तक सुशृंखल और निर्विघ्न रूप से चल रहा है। कल हम लोगों की भागवत की बहुत-सी कथाएँ हुईं। उन सभी लीलाओं में शिक्षापूर्ण भाव [निहित हैं।] लीला-कथाएँ तो हैं ही, साथ में हम लोगों के लिए शिक्षापूर्ण भी हैं।

जैसे बलदेवजी समस्त तीर्थों [की यात्रा] के लिए जा रहे हैं। जब गङ्गाजी को पृथ्वी पर अवतरण कराने के लिए भागीरथजी ने तपस्या और आराधना की तो गङ्गाजीने कहा— “मैं भूलोक में जाना नहीं चाहती। क्योंकि वहाँ पर बड़े-बड़े पापी और धर्मध्वजी लोग हैं। कुछ लोग धर्म भी करते हैं किन्तु उसकी आड़ में पापाचार करते हैं। जब [मैं वहाँ] जाऊँगी, तो वे अपने सब पाप मेरे भीतर धोकर [मुझे] दे जायेंगे। इसलिये मैं डर रही हूँ।”

भागीरथजी के ऊपर भी साधु-सन्‍तों की कृपा थी, विशेष करके कपिलदेवजी की कृपा थी। उन्होंने कहा— “माता भगवती! आपको डरने की कोई आवश्यकता नहीं है। एक तो आप समस्त तीर्थों को [भी पवित्र करनेवाली हैं।] आपमें जितने भी पाप धोये जायेंगे, वे सब दूर हो जायेंगे। जितने गन्दे नाले आदि बहते हैं, वे आप (गङ्गाजी) में जाते हैं, तो गङ्गाजी ही बन जाते हैं। ऐसे ही यदि पाप भी आपमें जायेंगे, तो वे भी पवित्र बन जायेंगे और किसी परिस्थिति से मैंने मान भी लिया कि वे आपमें पाप धोयेंगे, तो सब भगवत्-विग्रह, अवतार समूह, बड़े-बड़े ऋषि और बड़े-बड़े सब भक्त लोग आपको स्पर्श करके उस मलिनता को दूर करके फिर से आपमें निर्मलता, सजीवता और सरसता ला देंगे।”

मानो उन्हीं सब वचनों [को सत्य सिद्ध करने] के लिए बलदेवजी स्वयं भगवान् होकर भी अब तीर्थ में जा रहे हैं—तीर्थों को तीर्थत्व प्रदान करने के लिए और कितनी सब जगत् मङ्गलमयी लीलाओं को करने के लिए जा रहे हैं!

जब वे नैमिषारण्य पहुँचे, [तब वहाँ] व्यासजी का शिष्य रोमहर्षण सूत पुराण आदि का पाठ कर रहा था। वहाँ बड़े-बड़े श्रोता [उपस्थित] थे। किन्तु रोमहर्षण सूत में कुछ कमी थी। जिस समय बलदेवजी वहाँ आये, तब जितने भी ऋषि, महर्षि, ब्रह्मवेत्ता, ब्रह्मर्षि और राजर्षि थे, उन सबने उठकर उनका अभिवादन किया किन्तु रोमहर्षण सूत अभिमान में मत्त होकर उच्च व्यास-आसन पर बैठा रहा। [उसने मन में विचार किया—] “मैं सबसे बड़ा हूँ। ये सब ऋषि लोग मुझे सम्मान देते हैं। तो यदि ये बलदेवजी क्षत्रिय कुल में पैदा होकर यहाँ आ गये, तो क्या हो गया?”

[उन्होंने बलदेवजी को] साधारण क्षत्रिय तथा वसुदेवजी का लड़का समझा। इसलिये उनका अभिवादन नहीं किया।

तब बलदेवजी ने कहा— “यह तो बड़ा घमण्डी और अहंकारी है। यह नहीं जानता कि यहाँ बैठे हुए ये श्रोता उससे हजारों गुना श्रेष्ठ हैं। केवल कथा बाँचने (बोलने) से ही भक्ति नहीं हो जाती और न ही यह उसका (भक्ति का) लक्षण है।”

नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन।
यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम्॥
-कठोपनिषत् (1.2.23)

[इस परमात्म वस्तु को तर्क, मेधा या पाण्डित्य द्वारा नहीं जाना जा सकता। जब जीवात्मा भगवान् के प्रति सेवोन्मुख होकर परमात्मा की कृपायाचना करता है, तब उसी के निकट वे परमात्मा अपना ‘स्वयंप्रकाश श्रीविग्रह’ प्रकट करते हैं।] GVP

ये तो बहुत पाठ कर रहे हैं। यहाँ तक कि शुकदेव गोस्वामी ने भी भागवत की कथा सुनायी, जिसे लाखों लोगों ने सुना—बड़े-बड़े महात्माओं ने, नारद आदि ने भी सुना। [तो क्या वे] यशोदा मैयाजी से बड़े हो जायेंगे या नहीं? इतनी कथा सुनाते हैं—[तो क्या वे] नन्दबाबा से बड़े हो जायेंगे? जिनकी ऐसी धारणा है [कि भगवान् और उनके भक्तों का आदर किये बिना केवलमात्र कथा बोलने से ही भक्ति हो जायेगी तो,] उनको भक्ति एकदम नहीं हुई। शुक[देव गोस्वामी] हजारों जन्मों में भी यशोदा मैया की पदधूलि, नन्दबाबा की पदधूलि और व्रजवासियों की पदधूलि की समता नहीं करेंगे—इस वस्तु को समझना चाहिये।

वहाँ शौनकादि ऋषिगण [तत्त्वज्ञ होते हुए भी श्रोता बने हुए] थे और उन्होंने दीनतावश ही भगवान् की कथाएँ सुनने के लिए रोमहर्षण सूत से निवेदन किया और उन्हें सुनकर बड़ा आनन्द हुआ। कैसे? जैसे अपने छोटे बच्चे की तोतली बात सुनकर मैया को आनन्द होता है, [वैसे ही] उन्‍हें कृष्ण की कथाओं में आनन्द होता है। इसलिये उन्होंने उसे [रोमहर्षण सूत को] कहा। उसकी स्मरणशक्ति है [और वह कथा] कह रहा है। जैसे अग्नि अपने को [राख से] ढककर रखती है वैसे ही वे [शौनकादि ऋषिगण] अपने प्रभाव को ढककर रखते हैं जिससे साधारण लोग उन्हें पहचान न सकें। यदि ‘यदृच्छया क्रम’ से शुकदेव गोस्वामी उस सभा में नहीं आते और कथा नहीं कहते, तो कौन जनता कि वे रसिक और तत्वज्ञ हैं? कोई जानता? कोई नहीं।

इसलिये यहाँ पर हम लोगों की सभा में भी बहुत से ऐसे व्यक्ति होंगे जो अपने को छिपाकर रखते हैं। महिलाओं में भी अधिकांश ऐसी होंगी, जिनके [विषय में] हम समझते हैं कि वे कुछ नहीं जानतीं। ममता से विद्वता का क्या सम्बन्ध है? कृष्ण से ममता हो, वह ममता किस वस्तु से आयेगी? प्रवचन से आयेगी? या बहुत सुनने से आयेगी? या रुपये-पैसे से आयेगी? या ज्ञान और विज्ञान होने पर ही [किसी को] ममता होगी? कृष्ण के प्रति ममता कहाँ से आयेगी? तो ऐसे बहुत से लोग हो सकते हैं जिन्‍हें हम जानते नहीं हैं, [किन्‍तु] जिनकी कृष्ण के प्रति इतनी ममता है जिसकी हम धारणा नहीं कर सकते।

एक बार हम लोग एक स्थान पर चौबेजी के घर पर प्रवचन करने के लिए गये थे। [उनका] लड़का बहुत भक्तिमान था, उसके घर पर हम लोग गये। [जाते समय हम सोच रहे थे कि] कहाँ जा रहे हैं, हम लोग कुछ झिझक भी रहे थे। वह हमें ऊपर कहाँ-कहाँ लेकर जा रहा था। एक तो पतली (सँकरी) गली और फिर ऊपर में इधर-उधर करके [जा रहे थे।] हमने कहा— “भाई, ये कहाँ ले जा रहा है।” जब हम वहाँ उसके घर पहुँचे, तो देखा कि वहाँ बहुत से लोग [उपस्थित] थे, विशेषकर उसके पारिवारिक [लोग थे।] जब उन महिलाओं ने कीर्तन करना आरम्भ किया, [विशेषरूप से] उसकी मैया, बहन और स्त्री ने [कीर्तन किया,] तो उनकी आँखों से आँसू झरने लगे। [उन्हें देखकर मेरे मन में भाव आया—] “मैं तो इनके चरणों की धूलि [के समान] भी नहीं हूँ।” वे हमारा आदर कर रहे थे किन्तु मैं समझ गया। मैंने मन ही मन उनको हजारों बार प्रणाम किया।

ऐसे कितने स्थल (उदाहरण) हो सकते हैं। इसलिये हम लोगों में विद्या का गौरव नहीं आना चाहिये। गुरुजी से दो-चार उपदेश सुन लेने पर अपने को ऐसा (बड़ा भक्त) नहीं समझना चाहिये। बहुत से लोग ऐसे हैं जो अपने को छिपाकर रखते हैं, किन्तु उनकी कृष्ण के प्रति ममता हमसे कोटि गुणा अधिक हो सकती है। इसलिये [वक्ता को] पहले श्रोताओं को प्रणाम कर लेना चाहिये, तब अपने [आसन पर] बैठना चाहिये। गुरुवर्ग भी बिठा देते हैं। हम लोगों को गुरुवर्ग को प्रणाम करके, दीनहीन होकर तब व्यासासन पर बैठना चाहिये।

ब्रह्मचारी लोग भी [इस विषय में विशेष] सावधान रहें—अपने को कहीं बड़ा न समझ लें। [कहीं ऐसा न समझ बैठें] कि “हम बहुत बड़े त्यागी हो गये हैं, हमने सब कुछ त्याग दिया है।” गृहस्थ में रहकर भी ऐसे बहुत लोग हैं जिन्होंने सर्वस्व त्याग किया है, किन्‍तु ऊपर से गृहस्थ बने हुए हैं। इस बात को समझना। वे अपने घर का सर्वस्व लगाकर हमें देते हैं, और हम उसका भोग करते हैं। इसलिये बहुत सावधानी से रहकर भगवान् का भजन [करना चाहिये। भजन] करने के लिए ही हम सब लोग आये हैं। ऐसा अभिमान न आये कि [हम बड़े त्यागी हो गये हैं।]

इसलिये बलदेव प्रभुजी ने कहा— “देखो तो, यह [कितना] अभिमानी है! कहाँ यह व्यासदेवजी का शिष्य, [किन्तु अपने आचरण से] व्यासजी को भी कलंकित कर रहा है। यदि जगत् में रहेगा, तो बहुत अनर्थ होगा। ऐसे लोगों को जगत् में रहने की आवश्यकता नहीं है।” [इतना कहकर उन्होंने] एक कुश उठाया और [उससे रोमहर्षण सूत का] गला ही काट दिया।

कुछ लोग जो जाननेवाले नहीं थे, अतत्त्वज्ञ थे, उन्‍होंने हाहाकार करना आरम्भ किया। जब हाहाकार करना आरम्भ किया, तो [बलदेव प्रभुजी ने] कहा— “क्या चाहते हो? इसको [पुनः] जीवित कर दूँ?” उनमें जीवित करने का भी सामर्थ्य है। [जैसे] मारने का सामर्थ्य है, [वैसे ही] जीवित करने का भी सामर्थ्य है। “जीवित कर दूँ?”

[तो उन ऋषियों ने कहा—] “नहीं-नहीं प्रभो! अब हम लोग समझ गये। हमारा अपराध क्षमा करें। आपने जैसा किया, वह उचित है।”

[बलदेव प्रभुजी ने कहा—] “ठीक है तो, अब क्या चाहते हो?”

[उन्होंने निवेदन किया—] “हम चाहते हैं कि हमें कोई कथा सुनाये।”

[बलदेव प्रभुजी ने कहा—] “ठीक है।”

[रोमहर्षण सूत का] पाँच वर्ष से भी छोटा बच्चा था। [बलदेवजी ने] उसे स्पर्श किया और [उसमें अपनी] शक्ति सञ्‍चरित की। फिर उसे उठाकर व्यासगद्दी पर बैठा दिया। जैसे कोई यन्त्र या टेप-रिकॉर्डर लगा दिया और बोलने लगता है न, [वह भी] एकदम टेप-रिकॉर्डर जैसा [बोलने लगा।] सब कुछ उसके भीतर सञ्‍चरित कर दिया। वह छोटा-सा बालक अद्भुत [रीति से] भगवान् की कथाओं का वर्णन करने लगा। आगे चलकर वही शुकदेव गोस्वामी और परीक्षित् महाराज की सभा में गये, वहाँ पर [भागवत कथा] श्रवण की। जैसे व्यासजी ने कृपा करके शुकदेव गोस्वामी को अपना शिष्य बनाया था, [उसी प्रकार] उन्होंने भी उनको (शुकदेव गोस्वामी को) अपने गुरु के रूप में वरण करके उनसे सब कुछ लिया। ये सब होना चाहिये। भागवत कथा सुनने का यह सब तात्पर्य है।

यदि [भागवत] सुनकर ऐसी भावना हमारे हृदय में आये, तब तो हमने वास्तव में भागवत सुनी है; अन्यथा नहीं सुनी। यदि भागवत सुनकर भी प्रतिदिन घर में लड़ाई होती है, [तो क्या भागवत सुनना हुआ?] यदि एक ही घर में दस व्यक्ति वैष्णव हैं और उनमें प्रतिदिन लड़ाई होती है—केवल गुत्थम-गुत्थी (मारपीट) ही शेष रह जाये, तो क्या भागवत सुनना हुआ?

अरे! एक कुल में यदि एक वैष्णव या वैष्णवी का जन्म हो जाये, तो उसके कितने ही पूर्वजों का उद्धार हो जाता है। परन्तु यदि एक ही स्थान पर दस वैष्णव-वैष्णवी [मिलकर शान्ति से] नहीं रह सकते, तो यह गुरुजी के नाम पर कलंक होगा। हम अपने को तो कलंकित कर ही रहे हैं, [साथ में अपने गुरुजी के नाम को भी कलंकित कर रहे हैं।] लोग कहेंगे— “अरे! क्या यह व्यासजी का शिष्य है?” ऐसा कहेंगे। इसलिये वैष्णवों को बहुत सहिष्णु होना चाहिये। जो सहिष्णु नहीं है, उसका भागवत सुनना व्यर्थ है।

[वैष्णवों को] तृणादपि सुनीच, तरोरपि सहिष्णु, अमानी और मानद होना चाहिये। [#1] ये वैष्णवों के भूषण हैं। यहाँ भागवत सुन रहे हैं, यहाँ से [घर] गये और एक लकड़ी उठायी, पत्नी पर दो लात मार दी, बहन से झगड़ा कर लिया, पिताजी की बात नहीं मानी, मैया की बात नहीं मानी, [तो क्या] यह भागवत सुनना है? घर में झगड़ा किया, [क्या] भागवत नहीं सुनी? बस मारा-मारी कर दी, विष खा लिया, घरवालों से विरोध कर दिया कि हम घर में ही नहीं रहेंगे। बहुत अच्छा, घर में नहीं रहेंगे, [क्या] यह भजन का तरीका है। [उचित रूप से] भजन करना चाहिये। [भागवत की शिक्षाओं] को ग्रहण करना चाहिये।

[हमें] प्रह्लाद [महाराज की भाँति सहिष्णु बनना चाहिये।] उन पर कितने ही अत्याचार हुए किन्‍तु उन्होंने कभी विरोध नहीं किया। [वे सदैव यही मानते थे कि जो हो रहा है सब] ठीक है [और वह प्रभु की इच्छा से ही हो रहा है।] हरिदास ठाकुर को बाईस बाज़ारों में मारा, किन्‍तु क्या उन्होंने कभी कहा कि “मुझे क्यों मारा?” [क्योंकि] वे भागवत सुनते थे। क्या प्रह्लाद महाराज ने कोई आपत्ति की? [क्या वे] घर छोड़कर चले गये? यदि [हमारे भीतर] इतनी सहिष्णुता नहीं है, तो क्या भागवत श्रवण की? भागवत की इन शिक्षाओं को लेना चाहिये। [एक कान से] सुना [और दूसरे कान से] ऐसे निकाल दिया—[यह भागवत सुनना नहीं है।]

विक्रमादित्य के दरबार में [एक बार] कहीं से एक औघड़-सा [व्यक्ति एक सूखी खोपड़ी लेकर] आया। उसने कहा— “देखो, यहाँ पर इतने बड़े-बड़े विद्वान और नवरत्न [उपस्थित] हैं, [उनमें से] कोई यह बतला दे कि यह [खोपड़ी जिस व्यक्ति की थी, वह बुद्धिमान था या मूर्ख?”]

उसने वह सूखी हुई खोपड़ी सबके सामने रख दी। उसके दाँत बाहर निकले हुए थे, आँखें तो हैं नहीं, गड्ढे देखने में ही डर लग रहा था। उसने वह खोपड़ी सबके सामने रख दी और [कहा—] “यह बतलाओ कि यह व्यक्ति मूर्ख था या विद्वान था? या कैसा था?”

[सबने] कहा— “यह कैसे पता लगेगा?” उस समय महाराज विक्रमादित्य और उनके अन्य सब लोग [उपस्थित] थे, किन्‍तु कालिदास वहाँ नहीं थे। अन्य नवरत्न उपस्थित थे, उन्होंने कहा— “यह तो मरे [हुए व्यक्ति की] सूखी खोपड़ी है। यह [व्यक्ति] बुद्धिमान था या कैसा था, यह कैसे पता लगेगा?” कोई भी उत्तर न दे सका।

[तब वह औघड़ कहने लगा—] “क्या यही राजसभा है! ऐसी सभा को धिक्कार है!” यह कहकर वह जाने लगा। इतने में कालिदास वहाँ आ गये। महाराज ने [उस व्यक्ति से] कहा— “महाराज! दो मिनट और बैठ जाइये, थोड़ा समय और दीजिये।”

[उसने] कहा— “अच्छा, ठीक है।”

तब कालिदास आये, तो उनसे कहा गया। उनसे भी [वही प्रश्न] पूछा गया।

[कालिदास ने] कहा— “एक सेकण्ड [रुकिये।] एक नारियल का झाड़ू ले आओ तो।”

[किसी ने कालिदास से पूछा—] “झाड़ू का क्या करेंगे?”

[कालिदास ने कहा—] “अरे, उसमें से एक सींक की आवश्यकता है।” [कालिदास ने] बस एक सींक ले ली और उस खोपड़ी के एक कान में डाली, तो देखा कि सीधी चली गयी [अर्थात् वह सीधी दूसरे कान से निकल गयी।]

[तब कालिदास ने] कहा— “क्या सब समझ गये?”

[लोगों ने पूछा—] “क्या समझें?”

[कालिदास ने कहा—] “अरे, यह [व्यक्ति] एक नम्बर का मूर्ख था। इसके इस [कान में सींक] डाली तो दूसरे से निकल गयी अर्थात् कोई भी बात इसके एक कान से प्रवेश करती थी, वह दूसरे कान से निकल जाती थी; भीतर में नहीं जाती थी। यदि यह [दूसरे कान से न निकलकर] भीतर में आ जाती, तब मैं कहता कि यह बुद्धिमान व्यक्ति था।”

ऐसे ही [यदि हम] भागवत की कथा सुन रहे हैं, प्रणामी भी दे रहे हैं, [केवल] दूध पीकर [व्रत भी करते] हैं, सब कुछ [नियम पालन] करते हैं, निराहार रहकर सुनते भी हैं, किन्‍तु यहाँ से जाते ही [सारी बातें] दूसरे कान से निकाल देते हैं, तो वह भागवत सुनना क्या हुआ? उनके उपदेशों को धारण करना है। कृष्ण की लीलाओं को कर्ण-भूषण बनाना है। उनकी कथाओं को सब समय स्मरण करना है।

ये दस दिनों की कथा हुई। नहीं, [आप लोगों को] दस वर्षों के लिए चाबी दे दी गयी है, जिससे [साधन-भजन की] घड़ी अपने आप चलती रहे। आप लोगों ने जो भागवत-कथाएँ सुनी हैं, उनका आपके हृदय में निरन्तर चिन्तन हो, दूसरों के साथ उन्हीं का कीर्तन हो, उन्हीं का स्मरण हो—तब तो [वास्तविक भागवत-श्रवण माना जायेगा।] इसलिये आप लोग ऐसा करेंगे। ये दस दिन नहीं, बल्कि जीवनभर के लिए आपको थोड़ी-सी चाबी दे दी गयी। किसी से लड़ाई-झगड़ा नही करेंगे, सहिष्णु होकर रहेंगे, दीनहीन होकर रहेंगे। शिष्य माने जो शासन को स्वीकार करे। [हम ऐसे शासन को स्वीकार करनेवाले शिष्य] बनकर रहेंगे। जिन गुणों [का वर्णन] भागवत में आया है, [उन्हें अपने जीवन में धारण करने का प्रयास करेंगे और] निरन्तर भगवान् के चरणों में शरणागत होकर रहेंगे।

अब डरना नहीं है कि “मैं मर जाऊँगा” या “क्या होगा?” या “मेरा अपमान कर रहे हैं या क्या कर रहे हैं?” क्या करना है? भगवान् का भजन करने के लिए प्रह्लाद महाराज की भाँति हिरण्यकशिपु के जितने भी अत्याचार हैं, उनको भी सहेंगे। तब तो समझा जायेगा कि भगवान् की भक्ति हो रही है।

तब [ऋषियों] के कहने से बलदेवजी ने बल्वल इत्यादि को मारा। [#2] ये सब तो कथाएँ बाद में आती हैं।

अभी आप लोगों ने जल्दीबाजी के कारण नृग महाराज की कथा [नहीं सुनी।] उन्होंने नाम तो बतला दिया। वे (कथावाचक) संक्षेप में कहकर चले गये क्योंकि समय नहीं है।

नृग महाराज परम धार्मिक थे। एक-दो करोड़ नहीं, बल्कि लाखों-करोड़ों गायों का दान कर चुके थे और प्रतिदिन अनगिनत गायों का दान करते रहते थे। [किन्तु केवल] दान करने से चित्त शुद्ध नहीं होता; बल्कि उससे अभिमान [उत्पन्न] होने की भी सम्भावना रहती है। इसलिये विशेषकर कलियुग में इसका महत्व नहीं है।

[यदि] है तो दान करो, किन्तु आँखें नीची रखकर। किसको दे रहा हूँ, क्या [दे रहा हूँ]—यह मत देखो। और “मैं देनेवाला हूँ” ऐसा [भाव] नहीं [होना चाहिये।] ऐसा समझो कि भगवान् की वस्तुएँ भगवान् के लोगों को, उनके सेवकों को दे रहा हूँ। “मैं देनेवाला हूँ” [यह नहीं। यहाँ तक कि] एक हाथ दे, तो दूसरे हाथ को भी पता न चले—तब यह दान है। [राजा] हरिश्चन्द्र जैसे दानी होने की भी आवश्यकता नहीं। वे न तो दान के विषय में हमारे आदर्श हैं और न भक्ति में। विश्वामित्रजी ने उनपर कृपा करके उनका यह अभिमान छुड़ाया था क्योंकि वे परम भक्त हैं।

नृग महाराज ने इतना दान किया था कि आकाश के तारे गिने जा सकते हैं, किन्तु उन्होंने जितनी गायों का दान किया था, उनकी संख्या नहीं गिनी जा सकती। पृथ्वी के धूलकण भी गिने जा सकते हैं, यह सम्भव है। किन्‍तु गायों की संख्या नहीं गिनी जा सकती—इतना दान किया था!

एक दिन एक गाय के लिए विवाद हो गया। एक ब्राह्मण कह रहा है— “यह गाय तो मुझे पहले ही दान में मिल चुकी है।” और दूसरा कहता है— “[नहीं,] यह गाय आज मुझे दान में मिली है।” वह कहता है— “गाय मेरी है।” यह कहता है— “गाय मेरी है।”

वे दोनों राजा के पास शिकायत लेकर पहुँचे। राजा ने कहा— “भाई! यह कौनसी बड़ी भारी बात है? इस एक गाय के बदले मैं तुम्हें दस गाय देता हूँ, बीस गाय देता हूँ, एक लाख गाय देता हूँ, करोड़ गाय देता हूँ। तुम जाओ।”

[किन्तु एक ब्राह्मण ने] कहा— “करोड़ क्या, असंख्य गाय मिलने पर भी मैं यही गाय लूँगा, दूसरी नहीं।”

[राजा ने] दूसरे से बड़ी विनम्रता के साथ में कहा— “महाराज! आप तो मान जाइये। यह मेरी ही तो दी हुई गाय है। इसके बदले आप जितनी गायें चाहें ले लीजिये।”

किन्तु उसने कहा— “महाराज! आप गिरगिट की तरह रङ्ग बदलते हैं—कभी लाल, कभी पीला, कभी [कुछ।] गिरगिट [की भाँति] दोनों बातें एक साथ में करते हो। इसलिये आपकी बातों पर विश्वास नहीं है।”

अन्त में दोनों ने मिलकर कहा— “यह गिरगिट है। कभी कहता है कि हाँ और फिर कहता है कि नहीं। इसलिये इसको शाप देते हैं कि जाओ, गिरगिट बन जाओ।”

अब राजा नृग गिरगिट बन गये। देखते-देखते विराट [शरीर हो गया और उन्हें] कहा— “हजारों वर्षों तक अपने इस [कर्म का फल] भोगो। तुमने वञ्‍चना की है।”

[नृग महाराज] बोले— “महाराज! मेरा क्या दोष है? मैं तो एक गाय के बदले लाखों गाय दे रहा हूँ और वह गाय भी मेरी ही दी हुई थी। आप इसमें सन्‍तुष्ट नहीं हो सके?”

अच्छा, यहाँ विचार किया जाये तो दोष किसका है? इसमें राजा का क्या दोष है? किन्तु नहीं, इन सब पुण्य के कामों में, दान के कामों में ऐसा ही कुछ अनर्थ रहता है। आप सबको प्रसन्न नहीं कर सकते। मान लीजिये कि एक व्यक्ति को आपने एक लाख रुपये दे दिये, तो दूसरा कहेगा— “अरे! देखो तो मुझको नहीं दिया, इसको दे दिया?” उसका मन खराब हो जायेगा। उससे [देनेवाले से] भी ईर्ष्या, [और जिसको रुपये दिए हैं] उससे भी ईर्ष्या। ये दान और पुण्य के सब काम ही ऐसे हैं। ये कर्म हैं न—इनसे चित्त शुद्धि नहीं होती।

अन्त में [नृग महाराज] गिरगिट बनकर एक कुएँ में गिर पड़े और हजारों वर्षों तक ऐसे ही रहे। हजारों वर्ष रहने के बाद हमारे द्वारका के राजकुमार लोग—कृष्ण के पुत्र-प्रपौत्र इत्यादि—गेंद खेलने के लिए, खेल खेलने के लिए उद्यान में गये हुए हैं। [खेलते-खेलते] उन्हें प्यास लगी और वे पानी पीने के लिए कुएँ के पास में आये। उन्‍होंने देखा कि एक भरा हुआ कुआँ और उसमें एक जानवर पड़ा हुआ है। उन्होंने उसे निकालने की बहुत चेष्टा की, किन्‍तु नहीं निकला। अन्त में वे कृष्ण के पास में गये। कृष्ण कौतुहल देखने के लिए आये। वे तो सब कुछ जानते हैं तो भी बच्चों को शिक्षा देने के लिए वहाँ पर उपस्थित हुए। उन्होंने देखा कि वह बाहर नहीं निकल पा रहा है। तब उन्‍होंने अपना पैर थोड़ा-सा नीचे लटका दिया और उसके सिर पर थोड़ा-सा स्पर्श हो गया। [चरण-स्पर्शमात्र से वह गिरगिट] झट ऊपर आ गया। उसने देवताओं के समान परम सुन्दर दिव्य रूप धारण कर लिया, कृष्ण की परिक्रमा की और उनकी स्तव-स्तुति करने लगा।

[कृष्ण ने पूछा—] “आप कौन हैं?”

बच्चे भी बड़े कौतूहल से देख रहे हैं। बड़ा सुन्दर सुकान्‍त! बच्चे सुन रहे हैं।

कृष्ण ने पूछा— “आप कौन हैं? आपकी यह दुर्गति कैसे हुई?”

[उन्‍होंने उत्तर दिया—] “आपके ही वंश में [उत्पन्न] पहले मेरा नाम नृग महाराज है, जिसको कौन नहीं जानता था? मैं कितना बड़ा भारी दानी था, किन्तु थोड़ी-सी त्रुटि के कारण ब्राह्मणों ने शाप दे दिया और मैं गिरगिट बन गया। मैं नहीं जानता कि किस पुण्य के बल से, किस तपस्या के बल से, किस आराधना के बल से, न जाने किस सौभाग्य से आज आपका स्पर्श [मुझे प्राप्त] हो गया, मैं कुएँ से निकल आया और मेरा उद्धार हो गया।”

कृष्ण ने कहा— “तुम्हें तो याद नहीं होगा, किन्‍तु हमें तो याद है। इन गायों के दान करने पर एक दिन कोई ब्राह्मण तुम्हारे यहाँ आया और कहा— “महाराज! मुझे श्रीमद्भागवत की एक पोथी चाहिये।” तब तुमने एक वैष्णव से भागवत की पोथी लिखवा दी और लिखकर उसको दान दिया। इसलिये वही तुम्हारी सुकृति हो गयी और उसी सुकृति [के प्रभाव] से आज तुम्हें मेरा स्पर्श प्राप्त हुआ और [तुम्हारा उद्धार हुआ।”]

देखो, श्रीमद्भागवत की एक पोथी दान करने का इतना मूल्य (माहात्म्य) है। और यदि सेवा-बुद्धि से किसी वैष्णव को सेवा के रूप में दिया जाये, तो उसका कितना फल होगा! और जो भागवत के विचारों को लेकर, विचारों को ग्रहण करते हुए दूसरों को भागवत की पोथी देते हैं, भागवत के विचारों को सुनाकर उपदेश देते हैं, तो उससे जगत् का कितना कल्याण होगा! इससे [बढ़कर] और कोई कल्याण नहीं। देखो, उसकी कैसी सद्‍गति हो गयी।

[तब श्रीकृष्ण ने] बच्चों को सुनाया—“देखो! ब्राह्मण, वैष्णव और गुरु की एक कौड़ी (छद्दाम) भी वञ्‍चना करके भोग मत करना। गुरु के नाम पर, वैष्णवों के नाम पर, भक्तों के नाम पर, भगवान् के नाम पर कोई वस्तु लेकर उन्‍हें वञ्‍चित करके ठाकुरजी को न देकर, वैष्णवों को न देकर, अपने भोग करने की स्पृहा रहेगी, तो तुम्हारी न जाने क्या दुर्गति होगी? इसकी (नृग महाराज की तो) भोग की लालसा भी नहीं थी, बस एक थोड़ी-सी गलती के कारण कि वह ब्राह्मणों को उनकी [अभिलषित] वस्तु नहीं दे सका, तो उसकी ऐसी दुर्गति हुई और वहाँ अनुमति की भी कोई आवश्यकता नहीं थी। और जो लोग भगवान् के नाम पर ऐसा व्यापार (business) करते हैं, जो भगवान् को नहीं देते, भगवान् के घर में ही शालिग्राम के द्वारा बादाम को तोड़कर खाते हैं, तो उनकी क्या दुर्गति होगी? इसलिये बच्चों! ब्राह्मणों और सन्‍तों [के साथ] कभी भी ऐसा [व्यवहार] मत करना, नहीं तो तुम्हारी इससे भी बढ़कर दुर्गति होगी। अपने वचन का पालन करना तथा अत्यन्‍त नम्रता और विनय के साथ में रहना।”

इस प्रकार से [कृष्ण ने] शिक्षा दी। इन सब शिक्षाओं को हम लोगों को भी [अपने जीवन में] ग्रहण करने की आवश्यकता है।

अन्‍त में सुदामा विप्रजी की कथा आयी। सुदामाजी की पत्नी कौन थीं? वे वसुदेवजी के पुरोहित, गर्गाचार्यजी की बेटी थीं। तो वह बेटी कैसी होगी? [इस वस्तु को] समझो। कैसी बेटी होगी? वह भागवत ही होगी—बड़ी सदाचारिणी, परमभक्त, सब प्रकार से आदर्श, परमसुन्दरी और विदुषी। गर्गाचार्यजी ने उन्हें ज्योतिष तथा अन्य शास्त्र सुनाये होंगे या नहीं? अवश्य ही सब सुनाये होंगे। इसलिये वे परम विदुषी महिला थीं। वे विद्वान भी थीं और भक्त भी थीं। इसलिये कृष्ण के अनुरोध से गर्गाचार्यजी ने अपनी लड़की [का विवाह] सुदामा विप्र [के साथ कर] दिया। सुदामाजी [सान्‍दीपनि मुनि के आश्रम से अध्ययन कर] घर लौट आये हैं। कृष्ण ने सुदामाजी को यह पता नहीं चलने दिया कि मैं अपने पुरोहितजी की लड़की से उनका विवाह करा रहा हूँ। कृष्ण ने चालाकी-चतुराई से उनको पता नहीं चलने दिया।

सुदामाजी कभी किसी से कुछ नहीं माँगते थे। दिन-रात भगवद्भजन में लगे रहते थे। किसी प्रकार जीविका निर्वाह करते हुए भजन करना ही उनके जीवन का उद्देश्य था। विवाह करके गृहस्थी रचाने की भी उनकी लालसा नहीं थी। वे परम निस्पृह, निष्किञ्‍चन और अकिञ्‍चन वैष्णव थे। किन्तु न जाने क्यों कृष्ण ने अपने सखा को भी अपने जैसा [गृहस्थ] बना दिया और उनका विवाह करा दिया।

मैं समझता हूँ कि सुदामाजी [की पत्नी] भक्ति में उनसे भी दो अंगुल बड़ी थीं—वह सुदामाजी से भी बड़ी थीं। सुदामाजी को तो लोग जानते हैं, [किन्तु उनकी पत्नी की महिमा भी कम नहीं थी।] जैसे मथुरा के बड़े-बड़े विद्वान पुरुष यज्ञ में ‘स्वाहा, स्वाहा’ कर रहे हैं और एक बेला (समय) खाते हैं या निर्जला रहकर [कठोर नियम पालन कर रहे हैं] और उनकी पत्नियाँ निरक्षर, पढ़ी-लिखी नहीं किन्तु कृष्ण के प्रति ममता किनकी हैं? यह तो विचार करो। वे समझते हैं कि हम बहुत बड़े भारी विद्वान हैं, जबकि हमारी स्त्रियाँ अपवित्र रहती हैं, इनकी दीक्षा नहीं होती, ये वेद नहीं पढ़ सकतीं, ॐकार का उच्चारण नहीं कर सकतीं—इसलिये हम लोग परम पवित्र और बड़े हैं। किन्तु यज्ञ-पत्नियाँ उनसे लाखों गुणा बड़ी हैं। [इसी प्रकार सुदामाजी की पत्नी भी भक्ति में उनसे आगे हैं।] अब इनको देखिये।

सुदामाजी भगवान् का भजन करते रहते। कभी-कभी वे भिक्षा भी ले आते हैं, [क्योंकि] ब्राह्मण हैं न, उनको अधिकार है। और कभी-कभी यदि वे [भिक्षा] नहीं लाते हैं, तो उनकी पत्‍नी आसपास से कुछ भिक्षा ले आती हैं। वे देखती हैं कि इनको बड़ा कष्ट है। तो जो कुछ मिल जाता, कभी चिउड़ा मिल जाता, तो ऐसे ही पानी में भिगोकर खा लेते। कभी चना मिल जाता, तो उसे ऐसे ही चबा लेते। जो कुछ लाते, उसी में ये दोनों बड़े सन्तुष्ट रहते। और यदि नहीं मिलता, तो ये कभी किसी से माँग लातीं।

अब ये (ब्राह्मणी) देख रही थीं कि मैं जो कुछ भी रसोई बनाती हूँ, ठाकुरजी को भोग लगने के बाद में सब कुछ इनको (सुदामाजी को) दे देती हूँ; किन्‍तु ये बेचारे [स्वयं पूरा] खाते नहीं। वे सोचते हैं कि मेरी ब्राह्मणी क्या खायेगी? सब समय उनको मेरी चिन्ता लगी रहती है। इसलिये वे थोड़ा-सा ले लेते और कह देते— “आज स्वास्थ्य ठीक नहीं है, मैं इतना ही लूँगा।” किन्तु वह समझ जाती थीं कि केवल मेरे लिए ही ये [पूरा भोजन] नहीं लेते। [यह देखकर] उन्हें बड़ा दुःख होता।

सुदामाजी तो सूखकर दुबले-पतले हो गये, उनकी हड्डियाँ [दिखायी] देने लगीं। आधी उम्र में ही वे बूढ़े हो गये। कृष्ण तो एक सौ पच्चीस वर्ष तक कैसे रहे? नवकिशोर जैसे रहे। उनकी रुक्मिणी, सत्यभामा [इत्यादि महिषियाँ] भी वैसी ही बनी रहीं। किन्तु यह ब्राह्मण कुछ दिनों में ही बूढ़ा हो गया—गाल पिचक गये, [शरीर] सूख गया, केश पक गये, पैरों में दरारें पड़ गयीं, हाड़-ठरठरिया लग गयी [अर्थात् हड्डियों तक कंपकपी लगना,] और कपड़े भी मैले-कुचैले।

और ब्राह्मणी का क्या हुआ? वे भी पति को ऐसा ही देखकर कम तपस्विनी और भक्त नहीं। [वे भी] निष्किञ्‍चन से निष्किञ्‍चन थीं। बस पति की सेवा के लिए सब कुछ करती थीं। और सोचती थीं कि इनको कैसे खिलाऊँ? इसलिये उन्‍होंने सोचा कि यदि हमारे घर में कुछ धन आ जायेगा, तो मैं इनकी सेवा कर सकती हूँ। ये परम भगवद्भक्त हैं और कृष्ण के सखा हैं। इसी लालसा से उन्होंने [एक दिन सुदामाजी से] कहा— “आप द्वारका चले जाइये। आपके सखा [श्रीकृष्ण वहाँ] हैं। उनसे कुछ थोड़ी-सी भेंट कर आइये।”

[सुदामाजी बोले—] “मैं वहाँ नहीं जाऊँगा।”

[ब्राह्मणी ने पूछा—] “क्यों?”

[सुदामाजी ने कहा—] “मैं किसी के सामने हाथ नहीं पसार सकता।”

[तब ब्राह्मणी बोलीं—] “आपको हाथ पसारने की [आवश्यकता ही क्या है?] कृष्ण तो ब्रह्मण्यदेव हैं—

नमो ब्रह्मण्यदेवाय गोब्राह्मणहिताय च।
जगद्धिताय कृष्णाय गोविन्दाय नमो नमः॥
-श्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला (13.77)

[ब्रह्मण्यदेव, गो-ब्राह्मण के हितस्वरूप, जगत् के मङ्गलस्वरूप, श्रीकृष्णस्वरूप और श्रीगोविन्दस्वरूप, उन परमतत्त्व को मैं प्रणाम करता हूँ।] IGVP

“तो कृष्ण ब्रह्मण्यदेव हैं। ब्रह्मण्यदेव माने क्या? ब्राह्मणों की सेवा करनेवाले ये प्रभु हैं और ब्राह्मणों का तो अत्यन्‍त आदर करते हैं, गायों का आदर करते हैं। [आपको कुछ] माँगना नहीं पड़ेगा। आप [केवल उनसे भेंट करने] चले जाइये। जो कुछ करना होगा, वह प्रभु [स्वयं] कर लेंगे।”

जब वे बहुत हठ करने लगीं, तो सुदामा जी ने कहा— “जो भगवान् की इच्छा। हमारे प्रभु के दर्शन तो मिल जायेंगे, यही हमारे लिए लाभ है। मैं उनसे कुछ नहीं माँगूँगा, किन्तु प्रभु का दर्शन हो जायेगा।” इसलिये सुदामाजी [द्वारका] गये।

जब [सुदामाजी] जाने लगे, तब उनके घर में तो कुछ भी नहीं था। [उनकी पत्नी] स्वयं दूसरे के घर से थोड़ा-सा चिउड़ा या चावल (टूटे हुए चावल) माँगकर ले आयीं और उसे एक फटी-[पुरानी] पोटली में बाँधकर उन्‍हें दे दिया। सुदामाजी ने उसे अपनी बगल में दबा लिया। बगल भी कैसी हो गयी थी—गड्ढा [पड़ गया था।] उसी में दबा दिया और वे लेकर गये।

अन्त में [द्वारका पहुँचने पर] कृष्ण ने जो उनकी सेवा और सत्कार किया, वह आप लोगों को विदित ही है। [अन्त में कृष्ण ने मुस्कुराकर] पूछा— “हमारी भाभी ने [हमारे लिए] कुछ दिया है?” तो वे कुछ नहीं [बोले।] क्यों? लज्जा के मारे। जब उन्‍होंने वहाँ का वैभव देखा तो वे आश्चर्यचकित हो गये। उन्हें वह [छोटी-सी] पोटली देने में बड़ी लज्जा अनुभव हो रही थी। तो वे अभी आनाकानी कर रहे थे। तब तक प्रभु ने क्या किया? [उन्‍होंने कहा—] “अरे! तुम्हारी बगल में यह क्या झूल रहा है?” और जबरदस्ती [वह पोटली] निकाल दी। अहो प्रभु! कैसे ये दयाल!

[वहाँ पर कृष्ण की] स्त्रियाँ और सब लोग हैं, उनके सामने देखते-देखते ही [कृष्ण ने] एक मुट्ठी [चिउड़ा] निकाला और अपने मुख में दे दिया। सूखे! चिउड़े भी सूखे! उसमें क्या रस होगा? उसमें पानी दो, तो [कुछ] रस होगा; नहीं तो उसमें रस कहाँ? कृष्ण ने [अपने जीवन में] कभी ऐसी कठिन (रूखी) और नीरस वस्तु नहीं खायी थी। किन्तु मुख में देकर बोले— “अहो! क्या अपूर्व! तुम लोगों के बनाये हुए पदार्थों में भी उतना आनन्द, उतना रस और उतना माधुर्य नहीं है, जितना आज इस चिउड़े में है।” ऐसा कहकर उन्होंने और एक मुट्ठी लिया। जैसे लिया, तभी रुक्मिणीजी ने हाथ पकड़ लिया।

[उन्होंने कहा—] “प्रभु! सब कुछ तो इन्हें दे ही दिया। यदि हमें भी दे दोगे, तो हम कहाँ रहेंगी?”

[यह सुनकर] कृष्ण मुस्कुराने लगे और ये सुदामाजी बड़े लज्जित हो गये। दूसरे दिन [सुदामाजी] ने कहा— “प्रभु! अब मैं चलूँ?”

[कृष्ण ने कहा—] “हाँ-हाँ, बहुत आनन्द से जाइये, क्योंकि हमारी भाभी आपके लिए चिन्ता कर रही होंगी।” [उन्होंने] यह भी नहीं किया कि एक पीली धोती में दो रुपये गाँठ बाँधकर ही दे दें। कुछ भी नहीं दिया। [उन्‍होंने] कहा— “चलो, चलो। मैं आपको [गाँव की सीमा तक छोड़] आऊँ। हमारी भाभी बड़ी चिन्ता कर रही होंगी।” यह कहकर गाँव की सीमा तक बड़े प्रेम के साथ गये। प्रभु ने उनको प्रणाम इत्यादि किया।

वहाँ से जब लौटकर आये तब सुदामाजी सोच रहे हैं— “देखो, [प्रभु ने] हमको कुछ भी नहीं दिया। एक प्रकार से बड़ा अच्छा किया। किन्‍तु ब्राह्मणी के पास में जाऊँगा, तो वह पूछेगी तो मैं क्या उत्तर दूँगा? किन्तु अच्छा हुआ कि उन्होंने कुछ नहीं दिया। यदि वैभव दे देते, तो उसमें मैं रह जाता और उनका भजन नहीं होता। अकिञ्‍चन और निष्किञ्‍चन हुए बिना भगवद्‍भजन कभी भी सम्भव नहीं है। “यह मेरा है, यह मेरा है” —ऐसा नहीं [होना चाहिये।]

शुकदेव गोस्वामी अकिञ्‍चन हैं, नारदजी अकिञ्‍चन हैं, हरिदास ठाकुरजी अकिञ्‍चन हैं। महाप्रभु के परिकर लोग [भी ऐसे ही थे।] प्रतापरुद्र महाराज जैसे बड़े-बड़े राजा भी अकिञ्‍चन हैं। पुण्डरीक [विद्यानिधि का] राजा [के समान वैभव होने पर] भी वे अकिञ्‍चन हैं। रघुनाथदास गोस्वामी राजकुमार होते हुए भी दीनहीन और अकिञ्‍चन थे। रूप गोस्वामी और सनातन गोस्वामी इतने वैभव के स्वामी होते हुए भी दीन और अकिञ्‍चन हैं। [उनका एक ही भाव था—] “केवल कृष्ण ही मेरे हैं, और कुछ मेरा नहीं।”

ऐसा होगा, तो भाई भजन होगा और यह भागवत सुनना होगा। भगवान् का भजन ऐसे ही नहीं हो जाता; [उसके लिए इस प्रकार की निष्किञ्‍चनता और शरणागति आवश्यक है।]

तो [सुदामाजी] चलते जा रहे हैं और [मन-ही-मन] सोच रहे हैं— “बहुत अच्छा हुआ [कि प्रभु ने मुझे कुछ नहीं दिया,] नहीं तो मैं उनको विस्मरण कर बैठता।” और जब वे अपनी कुटी के पास पहुँचे, [तब क्या देखा?] आप लोगों ने क्या [कथा] सुनी? उन्होंने देखा कि सोलह हजार एक सौ आठ सखियों के साथ में कोई राजकुमारी, नवकिशोरी उनकी ओर माला लेती हुई आरती उतारने के लिए आ रही हैं। शंख और नगाड़े सब बज रहे हैं।

[सुदामाजी आश्चर्य में पड़ गये—] “अरे! हमारी गाय कहाँ गयी? हमारी वह [छोटी-सी] कुटी कहाँ गयी? सब कहाँ चला गया?” वे यह चिन्‍ता कर रहे हैं। इतने में वे आगे आ गयीं। [सुदामाजी सोचने लगे कि ये] हमारी ओर क्यों [आ रहे हैं?] वे सकुचाकर थोड़ा पीछे हट गये। [तभी उनकी पत्नी] मुस्कुराती हुई आगे बढ़ीं, उन्होंने उनके गले में माला पहनायी और आरती उतारी। उनके स्पर्श से सुदामाजी भी राजकुमार के समान परम सुन्दर और एकदम नवयुवक वैष्णव बन गये।

[सुदामाजी] सोचने लगे— “प्रभु ने यह सब क्यों दिया? कैसे दिया?”

प्रभु [विचार कर रहे थे—] “इस ब्राह्मण के अपने घर में कुछ नहीं था, कहीं से माँगकर [इसने पूर्ण प्रेम के साथ सब कुछ मुझे दे] दिया और मेरे पास तो कितना अनन्त वैभव है। यदि मैं अपनी द्वारका का सब वैभव भी इसे दे दूँ, [तो मेरी ओर से वह ‘सब कुछ देना’ नहीं होगा।]

तो [इस प्रकार] हमारे अनन्त वैभव के भी सामने ये [इसकी भेंट का] कितना [अधिक] वैभव है! [यदि मैं द्वारका का समस्त वैभव भी इसे दे दूँ किन्तु] उसके प्रेम के सामने उसका क्या मूल्य है?”

प्रभु रात में वर्षा देते हैं। कृषक लोग सो रहे हैं और उस समय बड़ी ज़ोर से वर्षा हुई। खेत पानी से भर गये और जब सवेरा हुआ तो देखा कि पानी बन्द हो गया। खेतों में एकदम सब पानी लहलहा रहा है, सब बढ़ रहा है, आनन्द से उनका हृदय [भर जाता है। प्रभु] दिखाकर नहीं देते। ऐसे जो भगवद्भक्त होते हैं, वे किसी को दिखलाकर कोई वस्तु नहीं देते हैं। इसलिये उनके जो आराध्य भगवान् हैं, वे क्या दिखला करके देंगे? [इसलिये उसी समय] नहीं दिया।

[दूसरी बात,] यदि उसी समय उनकी रानियाँ एक-एक गाय दे देतीं, तो कितनी हो गयीं? एक-एक लोटिया दे देंती, एक-एक स्वर्णासन दे देतीं, तो ये कैसे ले जाते? यदि उस समय उनकी स्त्रियाँ, एक-एक महिला एक-एक सोने का हार [पहना] देतीं, तो वे क्या करते? वे गिर पड़ते, इसलिये उस समय नहीं दिया। [उस समय वे वह सब ग्रहण करने में] असमर्थ थे। इसलिये [कृष्ण ने] ये सब छिपा करके दिया। यहाँ पर कृष्ण चिन्ता कर रहे हैं और [वैभव कि समस्त वस्तुएँ] वहाँ पर पहुँच गयीं।

जब सुदामाजी वहाँ पहुँचे [और यह सब देखा,] तब हाथ जोड़कर [कहने लगे—] “प्रभु! आप ऐसे दयालु हैं। मैं [यह सब वैभव] नहीं चाहता था, अब हमारा भजन नष्ट हो जायेगा।”

तब आकाशवाणी हुई या प्रभु ने अन्तर में प्रेरणा दी— “तुमको कोई भय नहीं है। मेरा वरदहस्त तुम्हारे ऊपर है। समस्त भोगों [और वैभव के] बीच रहकर भी भोग और माया तुम्हारा कुछ भी नहीं बिगाड़ सकते हैं—‘कभु न बाधिबे तोमार विषय-तरङ्ग।’ [#3]” महाप्रभुजी ने भी ऐसा कहा था।

इसलिये जो चाहते हैं भगवान् उनका सर्वस्व नष्ट कर देते हैं— ‘हरिष्ये तद्धनं शनैः।’ [#4] क्योंकि इससे भगवान् के भजन में बाधा होती है। इसलिये जो चाहते हैं कि और धन आ जाये और भगवान् की कृपा होगी, तो उनका सब कुछ हरण कर लेते हैं। और इस पर भी यदि वे प्रभु को नहीं छोड़ते हैं, तो क्या करते हैं? सब कुछ छप्पड़ फाड़ करके दे देते हैं।

इसलिये [भगवान्] ने समझा कि सुदामाजी योग्य हैं इसलिये उनको [वैभव] दे दिया। प्रह्लाद योग्य हैं, इसलिये उनको दे दिया। साधारण लोगों को नहीं देंगे, क्योंकि वह उसमें रहकर मर जायेगा।

इसलिये इन सब शिक्षाओं को ग्रहण करते हुए आगे की कथा सुनें। और जो कथाएँ हम लोगों ने सुनी हैं, उनके उपदेशों को अपने हृदय में धारण करें। सब समय भागवत की कथाओं का स्मरण, चिन्तन और गुणगान—बस यही हमारा और आप लोगों का भागवत सुनना होगा और यही हमारे लिए दक्षिणा होगी। पैसा हमारी दक्षिणा नहीं है, कपड़ा हमारी दक्षिणा नहीं है, और न ही संसार का कोई वैभव [हमारी दक्षिणा है।] ये सब तो ये बच्चे लोग भी छोड़कर आये हैं। [इन वस्तुओं] की हमें चिन्ता नहीं है।

आप लोग हमारी इस [भागवतरूपी] सम्पत्ति को ग्रहण कर सकें, [तो हमें बड़ी प्रसन्नता होगी।] जैसे शुकदेव गोस्वामी की सम्पत्ति को परीक्षित् महाराज ने ग्रहण किया, तो वे बड़े प्रसन्न हो गये। और [शुकदेव गोस्वामी] कैसे गये? जब कथा समाप्त हो गयी, तो वे कैसे गये? सब बटोर करके ले गये या कैसे गये? जैसे आये थे, [वैसे ही] प्रभु का स्मरण करते हुए चले गये। इसलिये आप लोग इस भागवतरूपी सम्पत्ति को अपनाकर अपने जीवन को कृतार्थ करें।

एक छोटा-सा कीर्तन [कर दीजिये।]

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समाप्ति-नोट्स (Endnotes)

#1
तृणादपि सुनीचेन तरोरपि सहिष्णुना।
अमानिना मानदेन कीर्तनीयः सदा हरिः॥
-श्रीशिक्षाष्टक (3)

[सर्वपद-दलित अत्यन्त तुच्छ तृण से भी अपने को दीनहीन नीच समझकर, वृक्ष से भी अधिक सहनशील बनकर, स्वयं अमानी होकर, दूसरों को यथायोग्य मान देनेवाला बनकर सदा सर्वदा—निरन्तर श्रीहरिनाम संकीर्तन करता रहे।] GVP

#2
इस प्रसङ्ग का विवरण श्रीमद्भागवत के अठहत्तरवें अध्याय में उपलब्ध है।

#3
कभु ना बाधिबे तोमार विषय-तरङ्ग।
पुनरपि एइ ठाञि पाबे मोर सङ्ग॥
-श्रीचैतन्यचरितामृत मध्य्लीला (7.129)

महाप्रभुजी ने कूर्म नामक ब्राह्मण से कहा— घर में रहते हुए भी सांसारिक विषय कभी तुम्हारी भक्ति में बाधा नहीं देंगे और यहीं तुम्हें पुनः मेरा सङ्ग प्राप्त होगा। (IGVP)

#4
यस्याहमनुगृह्णामि हरिष्ये तद्धनं शनैः।
ततोऽधनं त्यजन्त्यस्य स्वजना दुःखदुःखितम्॥
-श्रीमद्भागवतम् (10.88.8)

भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा— हे राजन्! मैं जिनपर अनुग्रह करता हूँ, धीरे-धीरे उनका समस्त धन छीन लेता हूँ। जब वह निर्धन हो जाता है, तब उसके पुत्र, सगे सम्बन्धी दुःखी के समान प्रतीत होनेवाले उस निर्धन व्यक्ति को छोड़ देते हैं। युधिष्ठिर! जो व्यक्ति विषयों के परित्याग की इच्छा करता है, पर किसी प्रसङ्गवश उनमें लिप्त होकर क्लेशग्रस्त रहता है, तो मैं उन विषयों का भी हरण कर लेता हूँ। इन विषयों का हरण ही मेरा अनुग्रह है। (GVP)

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