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Srimad Bhagavatam Series- #25- Return of Devaki's Sons, Story of Daksa Prajapati

11:15
#5867
Mathura
Lecture
Hindi
Srila Gurudeva 100%
Good

This audio is included in the following series of lectures:

Topics

  • Return of six Devaki’s sons by Sri Krsna from Sutala-loka.
  • Previous karmas of these six brothers of Krsna and how they got salvation.
  • Story of Bhrgu Rsi examining Trideva’s (Brahma, Visnu and Siva)
  • Destruction of the Yadu dynasty by Krsna.
  • Daksa Prajapati's sons got siksa from Narada Rsi.
  • Daksa curses Narada Rsi.

Transcript

श्रीमद्भागवत शृंखला – भाग 25 : देवकी के छः पुत्रों का उद्धार तथा दक्ष प्रजापति की कथा

[श्रील भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराज ने 6 मई 1994 को मथुरा में यह हरिकथा कही थी।
नोट: इस प्रतिलेखन में निम्‍नलिखित सम्पादकीय योगदान हैं: कुछ स्थानों पर भाषा को थोड़ा सम्‍पादित किया गया है, समाप्ति-नोट्स (endnotes) जोड़े गये हैं और विषय-वस्तु के प्रवाह और बोधगम्यता को सुविधाजनक बनाने के लिए वर्गाकार कोष्ठकों (square brackets) में अतिरिक्त पाठ सम्मिलित किया गया है। इसका शाब्दिक-प्रतिलेखन शीघ्र ही उपलब्ध होगा।

यदि आप प्रतिलेखन-सेवा में भाग लेने के लिए प्रेरित हैं, तो कृपया https://www.audioseva.com/register पर पञ्‍जीकरण करें।]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: हम लोगों की कथा का आज समापन दिवस है। आज इन्द्रदेव भी प्रसन्न हो रहे हैं। कथा की सफलता [का एक लक्षण यह] वर्षा भी है। आज दो-एक बूँदें भी पड़ रही हैं, हवा भी चल रही है। अब तो आप लोग शान्त हो जाइये। बोलिये तो—

[1:23-2:35 तक श्रील गुरुदेव के द्वारा कीर्तन…]

श्रील नारायण गोस्वामी महाराज: अभी सवेरे हम लोगों की कथा में दशम स्कन्ध सम्पूर्ण हुआ। उसमें भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रजी ने वसुदेवजी के द्वारा यज्ञ करवाया। साधारण लोगों को, बाहरी लोगों को—जिनका बाह्यज्ञान अर्थात् जड़ीयज्ञान है—उनके लिए ऐसा दिखाया गया मानो वे वसुदेवजी को ब्रह्मज्ञान का उपदेश दे रहे हों। [परन्तु] यह ब्रह्मज्ञान का उपदेश नहीं था। जिनको [स्वयं] कृष्ण पुत्ररूप में प्राप्त हुए हैं, उन वसुदेवजी को ब्रह्मज्ञान की क्या आवश्यकता है?

देवकीजी ने कृष्ण से प्रार्थना की— “आप गुरुपुत्रों को [वापस] ले आये थे। हमारे भी छह पुत्र कंस द्वारा मारे गये हैं। आप कृपा करके उन्हें भी हमारे पास ले आइये।”

तब कृष्ण [और बलराम] सुतललोक में बलि महाराजजी के यहाँ गये। बलि महाराजजी उन पुत्रों को लाये। उन पुत्रों को लेकर कृष्ण-बलदेवजी द्वारका लौटे और देवकी मैया को [सौंप] दिया।

देवकी मैया के स्तन से [दूध चुचुआने लगा।] उस समय उनकी उम्र लगभग 125 वर्ष, या उससे भी अधिक होगी। कृष्ण की ही उम्र इतनी है और कृष्ण तो उनके आठवें पुत्र हैं, तो इससे समझो। देवकीजी के स्तन तब तक सूख गये हैं, [किन्तु उन पुत्रों को देखकर] उनमें पुनः दूध का प्रवाह हो गया और दूध चुचुआने लगा। उन्होंने उन छहों बच्चों को गोदी में लेकर ज्योंहि स्तन का स्पर्श कराया, [उन्‍होंने] दिव्य देवताओं का रूप धारण कर लिया।

कृष्ण ने कहा— “ये पहले मरीचिजी के पुत्र थे। इन्होंने ब्रह्माजी के चरणों में अपराध किया था। ये ब्रह्माजी की भाव-भङ्गिमा को समझ नहीं सके और उनके [विषय में यह] समझ बैठे कि वे अपनी ही पुत्री पर कुदृष्टि डाल रहे हैं। [इस अपराध पर] ब्रह्माजी ने इन्हें अभिसम्‍पात दिया।”

ब्रह्माजी के अभिसम्‍पात से ये कालनेमि के छह पुत्र हुए। इसके बाद [इन्‍हें भगवद्‍-उपासना में रत देखकर कालनेमि भी क्रुद्ध हो गया और उसने इन्हें शाप दिया कि] इनकी मृत्यु इनके पिता [के हाथों] ही होगी। फिर ये देवकी के गर्भ में आये। पुनः वही कालनेमि कंस हुआ और कंस ने उनको मारा। [कंस के हाथों मरने के पश्चात् कालनेमि के शाप से मुक्त होकर] ये सुतललोक में निवास कर रहे थे। भगवान उन्‍हें वहाँ से ले आये। ये षड्‍गर्भा हैं। [भगवान् का उच्छिष्ट—देवकी के स्तन का दूध पान करने से] उनका उस कुयोनि से उद्धार हो गया और ब्रह्माजी का शाप भी समाप्त हो गया, और कृष्ण के दर्शन तथा उनका जूठा दूध पीने से उनका कल्याण हो गया। इस [प्रसङ्ग] में और भी बहुत-सी बातें हैं, किन्तु समय नहीं है।

विशेषकर जब भृगुजी भगवान् की परीक्षा करने चले— ब्रह्मा, विष्णु और महेश में [कौन श्रेष्ठ हैं;] देवताओं को तो छोड़ ही दीजिये। वे शंकरजी के पास गये। उन्होंने उन्हें प्रणाम नहीं किया, तो [शंकरजी] बिगड़ गये। फिर अपने पिताजी ब्रह्माजी के पास गये। उन्हें भी प्रणाम नहीं किया। ब्रह्माजी भी क्रोध से भरकर उन्हें अभिसम्पात देने [के लिए उद्यत हो गये। इसके बाद वे] क्षीरसमुद्र में भगवान् विष्णु के पास पहुँचे। [उस समय] लक्ष्मीजी उनके पैरों को पलोट रही थीं। भृगुजी ने आव देखा न ताव और विष्णु के वक्ष:स्थल पर बायें पैर से एक लात मारी।

प्रभु [तुरन्त] उठकर खड़े हो गये और बोले— “आपके अत्यन्त सुकोमल चरणों में कष्ट हुआ होगा। आपको ही यह कष्ट हुआ, चोट लगी होगी।”

[ऐसा कहकर वे उनके चरण] सहलाने लगे। उलटे प्रभु [स्वयं ही] उनसे क्षमा माँगने लगे। यह देखकर भृगु महाराज उनके चरणों में गिर पड़े और बोले— “समस्त देवताओं और ईश्वरों में यही श्रेष्ठ हैं।”

यदि इन तीनों देवताओं में विष्णु ही श्रेष्ठ हैं, तो उनके मूल अंशी श्रीकृष्ण की तो बात ही क्या है! इस प्रकार उन्होंने सिद्ध किया कि यदि भगवद्‍-उपासना करनी है, तो कृष्ण की उपासना से ही सबकी उपासना हो जाती है। पृथक रूप से किसी [अन्य की] उपासना करने की आवश्यकता नहीं रहती।

गणेशजी ने राम का नाम या कृष्ण का नाम लिख करके केवलमात्र तीन बार परिक्रमा की और [अग्रपूजा के अधिकारी बन गये, जबकि] देवता लोग पृथ्वी की परिक्रमा करके भी अग्रपूजा प्राप्त न कर सके। देखो तो, जब उनके नाम की इतनी महिमा है, तो उन भगवान् कृष्ण की कितनी महिमा होगी! इसलिये निःसंकोच चित्त होकर भगवान् कृष्ण और श्रीमति राधिका [का भजन कीजिये।] उनकी ही उपासना सर्वश्रेष्ठ है। विशेषकर मथुरापुरी में कृष्ण आये, [यहाँ] उनकी लीलाएँ हुई हैं। इसलिये आप लोग राधा-कृष्ण की ही उपासना करेंगे।

इस प्रकार आज हम लोगों का दशम स्कन्ध एक प्रकार से समाप्त हुआ। अब एकादश स्कन्ध आरम्भ करेंगे। इसमें [वर्णन आयेगा कि] किस प्रकार कृष्ण ने भूभार हरण किया, कौरव-पाण्डवों की सेनाओं का संहार किया, और उनके इष्ट-मित्र तथा बन्धु-बान्धवों की सेनाओं का भी संहार कर दिया। अन्त में [कृष्ण] ने सोचा कि हमारे वंश में देवता लोग आये हैं, और मेरे अवतार (प्रद्युम्न, अनिरुद्ध आदि) भी आये हैं; अब इन्हें छल-बल-कल से उनके [निज] स्थान पर भेज देना चाहिये।

उस समय में कृष्ण काल के रूप में बैठ गये। जैसे काँटे से काँटा निकालते हैं, वैसे ही उन्होंने [एक] काँटे से [दूसरे] काँटे को निकालकर भूभार हरण किया और वह काँटा जिससे निकाला था, वह काँटा क्या है?— यदुवंश। किन्तु ऐसा मत समझना कि [यदुवंशी आपस में लड़कर मर गये।] यदुवंश में तो देवता, भक्त और [भगवान्] के अवतार हैं। [कृष्ण ने] इसी ब्रह्मशाप के बहाने उन्‍हें उनके स्थान भेज दिया। बाहरी लोग, जिनको [तत्त्व]ज्ञान नहीं है, वे यही समझेंगे कि [आपस में] लड़-कटकर मर गये, किन्तु [ऐसा] नहीं है। यह भगवान् की एक लीला है। [कृष्ण ने] इसी बहाने उन लोगों को यथास्थान भेज दिया। लोगों ने इस प्रकार से समझा [कि वे आपस में लड़कर मर गये।]

इसके पहले भगवान् कृष्ण ने उद्धवजी को ज्ञान इत्यादि दिया था, उसका भी वर्णन किया जायेगा। और उससे पहले नारद ऋषि वहाँ आये। उस समय वे [समस्त] विश्व में भगवन्-नाम का प्रचार [करते हुए विचरण] करते थे। वे एक स्थान पर [अधिक देर तक] खड़े नहीं रह सकते थे—बस गो-दोहन काल तक ही एक स्थान पर रहते थे। क्यों? क्योंकि दक्ष प्रजापति का उन्हें अभिसम्पात था।

दक्ष प्रजापति के जो पहले लड़के हुए, वे हजारों [की संख्या में थे।] दक्ष प्रजापति ने उन सबको नारदजी के पास भेज दिया [और कहा—] “आप इन्‍हें शिक्षा दें। आप इन्हें उचित और कल्याणकारी शिक्षा देंगे।”

[नारदजी ने] उन्हें समझाया— “यह संसार सत्य है, किन्‍तु क्षणिक और नश्वर है। यह शरीर ‘मैं’ नहीं हूँ। हम सभी भगवान् के दास-दासी हैं। भगवान को भूलकर ही हम यहाँ [संसार में] आये हैं। कर्मों के अनुसार अनन्त काल से हम संसार में भटक रहे हैं। इसलिये इस जन्म में आकर एकमात्र कर्तव्य भगवद्‍-भजन करना है।” बच्चों का स्वभाव [अत्यन्‍त] कोमल था। वे सभी बच्चे वन में चले गये और भगवान् का भजन करने लगे।

जब दक्ष प्रजापति को यह ज्ञात हुआ कि नारदजी ने हमारे बच्चों को [संसार से विरक्त कर] भजन में लगा लिया, तब वे हाथ जोड़कर बोले— “महाराज, ऐसा मत कीजिये। हमने बड़ी आशा से इन बच्चों को पैदा किया था कि ये माता-पिता की सेवा करेंगे और संसार की वृद्धि करेंगे। आपने [तो इन्हें] भजन के लिए भेज दिया। अब ऐसा मत कीजियेगा।”

अब फिर दक्ष प्रजापति के बच्चे हुए, फिर [नारदजी ने] भेज दिया, फिर बच्चे हुए फिर भेज दिया। नारदजी ने उन्हें भी वही शिक्षा दी और उन सभी को भगवद्‍-भजन में लगा दिया। अन्त में क्रुद्ध होकर [दक्ष प्रजापति] बोला— “तुमने हमारे बच्चों की बुद्धि बिगाड़ दी। अब आज से तुम कहीं भी अधिक समय तक नहीं रह सकोगे। तुम [निरन्तर] स्थान-स्थान पर घूमते रहोगे।”

नारदजी ने कहा— “बहुत अच्छा हुआ! विषयी के पल्ले से मुझे छुट्टी मिल गयी। अब मैं विश्व में सर्वत्र भ्रमण करते हुए भगवान् के नाम का प्रचार करूँगा और सबको यही उपदेश दूँगा।”

तब जब-जब उनकी स्थिरचित्त से भगवद्‍-उपासना करने के लिए इच्छा होती, तो वे द्वारका में उपस्थित हो जाते।

गोविन्‍दभुजगुप्तायां द्वारवत्यां कुरूद्वह।
अवात्सीन्नारदोऽभीक्ष्णं कृष्णोपासनलालसः॥
-श्रीमद्भागवतम् (11.2.1)

[श्रीशुकदेव गोस्वामीजी ने कहा—हे कुरुश्रेष्ठ! देवर्षि नारदजी को मन-ही-मन भगवान् श्रीकृष्ण के समीप रहने की बड़ी लालसा थी, इसलिये वे श्रीकृष्ण की भुजाओं से सुरक्षित द्वारका में—जहाँ दक्ष आदि के शाप का कोई प्रभाव नहीं हो सकता था—विदा करनेपर भी पुनः-पुन: आ जाते थे तथा श्रीकृष्ण के समीप वहीं द्वारका में निरन्तर वास करते थे।] GVP

[जब-जब उन्हें] कृष्ण के दर्शन और उपासना की लालसा होती, वे द्वारका पहुँच जाते; क्योंकि भगवान् की भुजाओं के द्वारा द्वारकापुरी रक्षित थी।

इस प्रकार वहाँ आकर [उन्होंने] कौन-कौन से उपदेश दिये और किस प्रकार दिये— अब शुभानन्द ब्रह्मचारीजी आप लोगों को भागवत के एकादश और द्वादश स्कन्ध की कथाएँ सुनायेंगे।

गौर प्रेमानन्दे!

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